ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २७३ ध्वन्यालोकः प्रत्याख्यानं सुराणामिति भयशमनच्छद्मना कारयित्वा यस्मै लक्ष्मीमदाद्धः स दहतु दुरितं मन्थमूढां पयोधिः ॥ अर्थशक्त्या यथा— अम्बा शेतेऽत्र वृद्धा परिणतवयसामग्रणीरत्र तातो व्याज से देवताओं को निराकरण करा के 'इनके (विष्णु के) पास गमन कर' इस प्रकार (कह कर) समुद्र ने मन्थन से डरी हुई लक्ष्मी को जिसे (विष्णु को) अर्पित किया वह (विष्णु भगवान्) आप लोगों के दुरित नाश करें । अर्थशक्ति से, जैसे— यहाँ बूढ़ी माँ सोती है, बूढ़ों में भी बूढ़ा बाप यहाँ सोता है, और घर के सारे लोचनम् जृम्भितं च गात्रसंमर्दनात्मकं बलं भिनत्ति आयासकारित्वात् । प्रत्याख्यान- मिति वचसैवात्र द्वितीयोऽर्थोऽभिधीयत इति निवेदितम् । कारयित्वेति । सा हि कमला पुण्डरीकाक्षमेव हृदये निधायोत्थितेति स्वयमेव देवान्तराणां प्रत्याख्यानं करोति । स्वभावसुकुमारतया तु मन्दरान्दोलितजलधितरङ्गभङ्गप- र्याकुलीकृतां तेन प्रतिबोधयता तत्समर्थाचरणमन्यत्र दोषोद्घाटनेन अत्र याहीति चाभिनयविशेषेण सकलगुणादरदर्शकेन कृतम् । अत एव मन्थमूढामित्याह । इत्युक्तप्रकारेण भयनिवारणव्याजेन सुराणां प्रत्याख्यानं मन्थमूढां लक्ष्मीं कार- यित्वा पयोधिर्यस्मै तामदात्स वो युष्माकं दुरितं दहत्विति सम्बन्धः । अम्बेति । अत्रैकैकस्य पदस्य व्यञ्जकत्वं सहृदयैः सुकल्प्यमिति स्वकण्ठेन नोक्तम् । व्याजशब्दोऽत्र स्वोक्तिः । एवमुपसंहारव्याजेन प्रकारद्वयं सोदाहरणं होने के कारण बल तोड़ देती है । 'निराकरण' ('प्रत्याख्यान') इसके द्वारा वचन से ही दूसरा अर्थ अभिधान किया है, यह निवेदन किया । करा के—। क्यों कि वह कमला (लक्ष्मी) पुण्डरीकाक्ष (विष्णु) को ही हृदय में रख कर निकली है, अतः स्वयमेव वह इतर देवताओं का प्रत्याख्यान करती है । स्वभावतः सुकुमार होने के कारण मन्दरपर्वत से आन्दोलित समुद्र के तरङ्ग-भङ्गों से पर्याकुल हुई (लक्ष्मी) को शिक्षा देते हुए और अन्यत्र दोष के उद्घाटन द्वारा 'यहाँ (अर्थात् विष्णु में) गमन करो' इस समग्र गुणों के प्रति आदर दिखाने वाले अभिनय विशेष से उसके समर्थ आचरण किया है । इसी लिए 'मन्थमूढा' अर्थात् (समुद्र के) 'मन्थन से डरी हुई' यह कहा है । सम्बन्ध यह है कि इस उक्त प्रकार से भय-निवारण के व्याज से देवताओं का प्रत्याख्यान मन्थन से डरी हुई लक्ष्मी के करा के समुद्र ने जिसके लिए उसे अर्पित किया वह (विष्णु) आपलोगों के दुरित का नाश करें । यहां बूढ़ी—। यहाँ एक-एक पद का व्यञ्जकत्व सहृदयों द्वारा सहज ही कल्पनीय है, इस लिए अपने कण्ठ से नहीं कहा है । 'व्याज' शब्द यहाँ (कवि की) अपनी उक्ति १८ ध्व०