भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 680 में से

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२७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ःध्वन्यालोकः यत्राविष्क्रियते स्वोक्त्या सान्यैवालङ्कृतिर्ध्वनेः ॥ २३ ॥ शब्दशक्त्यार्थशक्त्या शब्दार्थशक्त्या वाक्षिप्तोऽपि व्यङ्ग्योऽर्थः कविना पुनर्यत्र स्वोक्त्या प्रकाशीक्रियते सोऽस्मादनुस्वानोपमव्यङ्ग्याद्- ध्वनेरन्य एवालङ्कारः । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य वा ध्वनेः सति सम्भवे स तादृगन्योऽलङ्कारः । तत्र शब्दशक्त्या यथा— वत्से मा गा विषादं श्वसनमुरुजवं सन्त्यजोर्ध्वप्रवृत्तं कम्पः को वा गुरुस्ते भवतु बलभिदा जृम्भितेनात्र याहि । शब्दशक्ति, अर्थशक्ति अथवा शब्दार्थशक्ति से आक्षिप्त भी व्यङ्ग्य अर्थ कवि के द्वारा पुनः जहाँ अपनी उक्ति से प्रकाशित किया जाता है वह इस अनुस्वानोपम- व्यङ्ग्य ध्वनि से अन्य ही अलङ्कार है । अथवा अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य ध्वनि के सम्भव होने पर वह उस प्रकार का अन्य अलङ्कार है । उनमें शब्दशक्ति से, जैसे— वत्से, विषाद् मत अनुभव कर ( विषाद् अर्थात् विष भक्षण करने वाले शिव के पास न जा ), वेग से ऊपर की दीर्घ श्वास न ले ( वायु और अग्नि को छोड़ ), अधिक कम्पित क्यों है ? ( जलपति वरुण अथवा ब्रह्मा तेरे गुरु हैं ) बल तोड़ देने वाले जृम्भित को रोक ( ऐश्वर्य-मदमत्त इन्द्र को जाने दे ), इस प्रकार भय-शमन के लोचनम् द्वयेनायमपि तृतीयः प्रकारो मन्तव्य इत्यर्थः । शब्दश्चार्थश्च शब्दार्थौ चेत्येक- शेषः । सान्यैवेति । न ध्वनिरसौ, अपि तु श्लेषादिरलङ्कार इत्यर्थः । अथवा ध्वनिशब्देनालक्ष्यक्रमः तस्यालङ्कार्यस्याङ्गिनः स व्यङ्ग्योऽर्थोऽन्यो वाच्यमात्रा- लङ्कारापेक्षया द्वितीयो लोकोत्तरश्चालङ्कार इत्यर्थः । एवमेव वृत्तौ द्विधा व्याख्या- स्यति । विषमत्तीति विषादः । ऊर्ध्वप्रवृत्तमग्निमित्यत्र चार्थो मन्तव्यः । कम्पोऽपा- म्पतिः को ब्रह्मा वा तव गुरुः । बलभिदा इन्द्रेण जृम्भितेन ऐश्वर्यमदमत्तेनेत्यर्थः । साथ यह तीसरा प्रकार भी मानना चाहिए । शब्द, अर्थ, और शब्दार्थ, यह 'एकशेष' है । वह अन्य ही—। अर्थात् वह ध्वनि नहीं है, अपितु श्लेष आदि अलङ्कार है । अथवा, ध्वनि शब्द से अलक्ष्यक्रम ( उक्त ), है, उस अलङ्कार्य का वह व्यङ्ग्य अर्थ अन्य अर्थात् वाच्य अलङ्कार की अपेक्षा दूसरा वह लोकोत्तर अलङ्कार है । इसी प्रकार 'वृत्ति में दो प्रकार से व्याख्या करेंगे । विष भक्षण करते हैं, ( विषमत्ति ) विषाद ( अर्थात् शिव ) । ऊर्ध्वप्रवृत्त ( ऊपर की ओर बढ़ा हुआ ), यहाँ 'अग्नि' अर्थ मन्तव्य है । कम्प अर्थात् अपांपति ( जलपति वरुण ), अथवा क अर्थात् ब्रह्मा तुम्हारे गुरु हैं । बलभिद् अर्थात् इन्द्र, जृम्भित अर्थात् ऐश्वर्यमदमत्त । और अङ्गों की ऐंठन रूप जम्भाई आयासकारी

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