भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 331

द्वितीय उद्योतः २७१ ध्वन्यालोकः हसन्नेत्रार्पिताकूतं लीलापद्मं निमीलितम् ॥ अत्र लीलाकमलनिमीलनस्य व्यञ्जकत्वमुक्त्यैव निवेदितम् । तथा च- शब्दार्थशक्त्या क्षिप्तोऽपि व्यङ्ग्योऽर्थः कविना पुनः । समय जानना चाहता है, हँसते हुए नेत्र द्वारा अभिप्राय प्रकट करते हुए (अपने हाथ में स्थित) लीलाकमल को निमीलित कर दिया । यहाँ लीलाकमल के निमीलन का व्यञ्जकत्व उक्ति द्वारा ही निवेदन किया गया है । और उस प्रकार— शब्दार्थ की शक्ति से आक्षिप्त भी व्यङ्ग्य अर्थ जहाँ कवि के द्वारा पुनः अपनी उक्ति से आविष्कृत किया जाता है, वह ध्वनि का अन्य ही अलङ्कार है ! लोचनम् व्यञ्जकत्वमिति । प्रदोषसमयं प्रतीति शेषः । उक्त्यैवेति । आद्यपादत्रयेणे- त्यर्थः । यद्यपि चात्र शब्दान्तरसन्निधानेऽपि प्रदोषार्थं प्रति न कस्यचिद्- भिधाशक्तिः पदस्येति व्यञ्जकत्वं न विघटितं, तथापि शब्देनैवोक्तमयमर्थोऽर्था- न्तरस्य व्यञ्जक इति । ततश्च ध्वनेर्यद्गोप्यमानतोदितचारुत्वात्मकं प्राणितं तदपहस्तितम् । यथा कश्चिदाह—'गम्भीरोऽहं न मे कृत्यं कोऽपि वेद न सूचितम् । किञ्चिद् ब्रवीमि' इति । तेन गाम्भीर्यसूचनार्थः प्रत्युत आविष्कृत एव । अत एवाह—व्यञ्जकत्वमिति उक्त्यैवेति च ॥ २२ ॥ प्रक्रान्तप्रकारद्वयोपसंहारं तृतीयप्रकारसूचनं चैकेनैव यत्नेन करोमीत्याश- येन साधारणमवतरणपदं प्रक्षिपति वृत्तिकृत्—तथा चेति । तेन चोक्तप्रकार- व्यञ्जकत्व—। प्रदोषसमय अर्थात् सन्ध्याकाल के प्रति व्यञ्जकत्व । उक्तिद्वारा ही—। अर्थात् पहले के तीनों पादों से । यद्यपि यहाँ शब्दान्तर के सन्निधान होने पर भी किसी पद का 'प्रदोष' (या सन्ध्याकाल) इस अर्थ के प्रति अभिधाशक्ति नहीं है, इस कारण व्यञ्जकत्व विघटित नहीं होता है तथापि 'यह अर्थ अर्थान्तर का व्यञ्जक है' यह बात शब्द से ही कही गई है । इस कारण ध्वनि का जो 'गोप्यमानता से उत्पन्न चारुत्वरूप प्राण है, उसका निराकरण कर दिया है। जैसा कि कोई कहता है—'मैं गम्भीर हूँ, बिना बताए मेरा काम कोई भी नहीं जानता, (इस लिए) कुछ कहता हूँ' । इस (कथन) से गाम्भीर्य-सूचन का अर्थ प्रत्युत प्रकट कर दिया है । इसी लिए कहा है— 'व्यञ्जकत्व' और 'उक्ति से ही' । प्रक्रान्त दोनों प्रकारों का उपसंहार और तीसरे प्रकार का सूचन एक ही यत्न से करता हूँ, इस आशय से वृत्तिकार साधारण अवतरण पद को देते हैं—और उस प्रकार—। अर्थात् उन उक्त दोनों प्रकारों (शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल ध्वनि) के