भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 680 में से

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पृष्ठ 330

२७० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यत्र च शब्दव्यापारसहायोऽर्थोऽर्थान्तरस्य व्यञ्जकत्वेनोपादीयते स नास्य ध्वनेर्विषयः । यथा— सङ्केतकालमनसं विटं ज्ञात्वा विदग्धया । और जहाँ शब्दव्यापार की सहायता से अर्थ अर्थान्तर के व्यञ्जक रूप से उपादान किया जाता है वह इस ध्वनि का विषय नहीं है । जैसे— विदग्धा ( नायिका ) ने यह जान कर कि विट संकेत (के स्थान पर पहुँचने का) लोचनम् प्रणयिप्रियतया च पक्षपातस्य सूचितस्य गाढीभावादृत्यात्मनः स्थायिभाव- स्यौत्सुक्यावेगचापल्यहर्षादेश्च व्यभिचारिणः साधारणीभूतोऽनुभाववर्गः प्रका- शित इति विभावानुभावचर्वणैव व्यभिचारिचर्वणायां पर्यवस्यति । व्यभिचा- रिणां पारतन्त्र्यादेव स्रक्सूत्रकल्पस्थायिचर्वणाविश्रान्तेरलक्ष्यक्रमत्वम् । इह तु पद्मद्लगणनमधोमुखत्वं चान्यथापि कुमारीणां सम्भाव्यत इति झटिति न लज्जायां विश्रमयति हृदयं, अपि तु प्राग्वृत्ततपश्चर्यादिवृत्तान्तानुस्मरणेन तत्र प्रतिपत्तिं करोतीति क्रमव्यङ्ग्यतैव । रसस्त्वत्रापि दूरत एव व्यभिचारिस्वरूपे पर्यालोच्यमाने भातीति तदपेक्षयाऽलक्ष्यक्रमतैव । लज्जापेक्षया तु तत्र लक्ष्यक्र- मत्त्वम् । अमुमेव भावमेवंशब्दः केवलशब्दश्च सूचयति । 'उक्तिं विने'ति यदुक्तं तद्व्यवच्छेद्यं दर्शयितुमुपक्रमते—यत्र चेति । चशब्द- स्तुशब्दस्यार्थे । अस्येति । अलक्ष्यक्रमस्तु तत्रापि स्यादेवेति भावः । उदाहरति- सङ्केतेति । उन ( शिवजी ) के इन ( पार्वती ) के प्रति उन्मुख होने के कारण और भक्त के प्रेमी होने के कारण सूचित पक्षपात के गाढ़ होने से रति रूप स्थायी भाव का और औत्सुक्य, वेग, चापल्य, हर्ष आदि व्यभिचारी का साधारणीभूत अनुभाव वर्ग को प्रकाशित किया है, इस प्रकार विभाव-अनुभाव की चर्वणा ही व्यभिचारी की चर्वणा में पर्यवसित होती है । व्यभिचारी भावों के परतन्त्र होने के कारण ही माला के सूत्र के समान स्थायी की चर्वणा में विश्रान्ति होने से अलक्ष्यक्रमत्व है । परन्तु यहाँ कमल के पत्तों को गिनना और नीचे मुख करना कुमारियों के अन्यथा भी सम्भव हैं, इस प्रकार झटिति हृदय को लज्जा में विश्राम नहीं मिलता है, अपितु ( हृदय ) पहले सम्पन्न हुए तपश्चर्या आदि वृत्तान्त के अनुस्मरण से उस ( लज्जा ) में प्रतिपत्ति करता है, इस प्रकार क्रमव्यङ्ग्यता ही है । किन्तु रस यहाँ भी दूर पर व्यभिचारी के स्वरूप के पर्यालोचन करने पर प्रतीत होता है, इस लिए उसकी अपेक्षा से अलक्ष्यक्रमत्व ही है । लज्जा की अपेक्षा से लक्ष्यक्रमत्व है । इसी भाव को 'इस प्रकार' और 'केवल' शब्द सूचित करते हैं । 'उक्ति के बिना' यह जो कहा है उसका व्यवच्छेद्य दिखाने के लिए उपक्रम करते हैं—और जहाँ—। 'और' शब्द 'परन्तु' शब्द के अर्थ में है । इस (ध्वनि) का—। भाव यह कि अलक्ष्यक्रम तो वहाँ पर भी होगा ही । उदाहरण देते हैं—सङ्केत ०—।