भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 680 में से

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पृष्ठ 329

: द्वितीय उद्योतः २६९ ध्वन्यालोकः नादिवर्णनं मनोभवशरसन्धानपर्यन्तं शम्भोश्च परिवृत्तधैर्यस्य चेष्टा- विशेषवर्णनादि साक्षाच्छब्दनिवेदितम् । इह तु सामर्थ्याक्षिप्तव्यभिचारि- मुखेन रसप्रतीतिः । तस्मादयमन्यो ध्वनेः प्रकारः । पर्यन्त समाप्त धैर्य वाले शङ्कर के चेष्टा विशेष के वर्णन आदि साक्षात् शब्द द्वारा निवेदन किया है। यहाँ सामर्थ्य से आक्षिप्त व्यभिचारी के द्वारा रस की प्रतीति होती है । इस लिए यह ध्वनि का अन्य प्रकार है । लोचनम् तथापि न सर्वोऽलदयक्रमस्य विषयः । यत्र हि विभावातुभावेभ्यः स्थायिग- तेभ्यो व्यभिचारिगतेभ्यश्च पूर्णेभ्यो झटित्येव रसव्यक्तिस्तत्रास्त्वलदयक्रमः । यथा— निर्वाणभूयिष्ठमथास्य वीर्यं सन्धुक्षयन्तीव वपुर्गुणेन । अनुप्रयाता वनदेवताभिरदृश्यत स्थावरराजकन्या ॥ इत्यादौ सम्पूर्णालम्बनोद्दीपनविभावतायोग्यस्वभाववर्णनम् । प्रतिग्रहीतुं प्रणयिप्रियत्वात्त्रिलोचनस्तामुपचक्रमे च । संमोहनं नाम च पुष्पधन्वा धनुष्यमोघं समधत्त बाणम् ॥ इत्यनेन विभावतोपयोग उक्तः । हरस्तु किञ्चित्परिवृत्तधैर्यश्चन्द्रोदयारम्भ इवाम्बुराशिः । उमामुखे बिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि ॥ अत्र हि भगवत्याः प्रथममेव तत्प्रवणत्वात्तस्य चेदानीं तदुन्मुखीभूतत्वात् सब (रस, भावादि) अलक्ष्यक्रम का विषय नहीं होता है । जहाँ स्थायिगत और व्यभिचारिगत पूर्ण विभावों और अनुभावों से झटिति रस की अभिव्यक्ति हो जाती है वहाँ अलक्ष्यक्रम होता है । जैसे— 'तदनन्तर इनके (शिव जी) के निर्वाण-प्रधान वीर्य को अपने शरीर के गुण से मानों विनष्ट करती हुई, वनदेवताओं द्वारा अनुसरण की जाती हुई, स्थावरराज (हिमालय) की कन्या (पार्वती) दिखाई पड़ीं।' इत्यादि में सम्पूर्ण आलम्बन-उद्दीपन विभाव रूप के योग्य स्वभाव का वर्णन है। 'अपने भक्त के प्रेमी होने के कारण त्रिलोचन (शिव जी) ने उस (माला) को ग्रहण करने के लिए उपक्रम किया और पुष्पों के धनुषवाले कामदेव ने संमोहन नाम का अमोघ बाण धनुष पर रखा ।' इसके द्वारा विभाव रूप का उपयोग कहा । 'चन्द्रोदय के आरम्भ में समुद्र की भाँति कुछ विचलित धैर्य वाले शिवजी ने बिम्बफल की भाँति अधरोष्ठ वाले पार्वती के मुख में अपने नेत्रों को व्यापारित किया।' यहाँ भगवती (पार्वती) के पहले से ही शिव में आसक्त होने के कारण और अब