भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 680 में से

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पृष्ठ 328

२६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा— एवंवादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी । लीलाकमलपत्राणि गणयामास केवलम् ॥ अत्र हि लीलाकमलपत्रगणनमुपसर्जनीकृतस्वरूपं शब्दव्यापारं विनैवार्थान्तरं व्यभिचारिभावलक्षणं प्रकाशयति । न चायमलक्ष्यक्रम- व्यङ्ग्यस्यैव ध्वनेर्विषयः । यतो यत्र साक्षाच्छब्दनिवेदितेभ्यो विभा- वानुभावव्यभिचारिभ्यो रसादीनां प्रतीतिः, स तस्य केवलस्य मार्गः । यथा कुमारसम्भवे मधुप्रसङ्गे वसन्तपुष्पाभरणं वहन्त्या देव्या आगम- इस प्रकार देवर्षि ( मण्डल ) कह रहे थे और पिता की बगल में ( बैठी ) नीचे मुंह किए पार्वती लीलाकमल के पत्तों की गणना करने लगी । यहां लीला कमल के पत्तों का गगन ( यह अर्थ ) अपने स्वरूप को गुणीभूत करने शब्दव्यापार के बिना ही व्यभिचारी भाव रूप अर्थान्तर को प्रकाशित करता है। यह अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ही ध्वनि का विषय नहीं है। क्यों कि जहां साक्षात् शब्द द्वारा निवेदित विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों से रस आदि की प्रतीति होती है वह केवल उसका मार्ग है। जैसे 'कुमारसम्भव' में वसन्त के फूलों का आभरण धारण किए देवी ( पार्वती ) का आगमन आदि वर्णन और कामदेव के शर-सन्धान लोचनम् शब्दः स्वशब्देन व्याख्यातः । उक्तिं विनेति व्याचष्टे—शब्दव्यापारं विनैवेति । उदाहरति—यथा एवमिति । अर्थान्तरमिति लज्जात्मकम् । साक्षादिति । व्यभि- चारिणां यत्रालक्ष्यक्रमतया व्यवधिवन्ध्यैव प्रतिपत्तिः स्वविभावादिबलात्तत्र साक्षाच्छब्दनिवेदितत्वं विवक्षितमिति न पूर्वापरविरोधः । पूर्वं ह्युक्तं व्यभि- चारिणामपि भावत्वान्न स्वशब्दतः प्रतिपत्तिरित्यादि विस्तरतः । एतदुक्तं भवति—यद्यपि रसभावादिरर्थो ध्वन्यमान एव भवति न वाच्यः कदाचिदपि, व्याख्या की है। 'उक्ति के बिना' इसकी व्याख्या करते हैं—शब्दव्यापार के बिना ही—। उदाहरण देते हैं—जैसे, इस प्रकार०—। अर्थान्तर लज्जारूप अर्थान्तर । साक्षात्—। व्यभिचारी भावों की जहां अलक्ष्यक्रम रूप से व्यवधानरहित ही प्रतीति अपने विभाव के बल से होती है वहाँ साक्षात् शब्द द्वारा निवेदितत्व विवक्षित है अतः पूर्वापरविरोध नहीं है। क्यों कि पहले विस्तार से कहा है कि व्यभिचारी भावों की भी भाव होने के कारण स्वशब्द से प्रतीति नहीं होती है, इत्यादि । यह कहा गया—यद्यपि रस, भाव आदि अर्थ ध्वन्यमान ही होता है, कभी भी वाच्य नहीं होता है, तथापि