ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २६७ ध्वन्यालोकः स्याक्रामन्त्युभयेऽपि ते दिनपतेः पादाः श्रिये सन्तु वः ॥ एवमन्येऽपि शब्दशक्तिमूलानुरवानरूपव्यङ्ग्यध्वनिप्रकाराः सन्ति ते सहृदयैः स्वयमनुसर्तव्याः । इह तु ग्रन्थविस्तरभयान्न तत्प्रपञ्चः कृतः । अर्थशक्त्युद्भवस्त्वन्यो यत्रार्थः स प्रकाशते । यस्तात्पर्येण वस्त्वन्यद्व्यनक्त्युक्तिं विना स्वतः ॥ २२ ॥ यत्रार्थः स्वसामर्थ्यादर्थान्तरमभिव्यनक्ति शब्दव्यापारं विनैव सोऽर्थशक्त्युद्भवो नामानुरवानोपमव्यङ्ग्यो ध्वनिः । करते हैं अथवा ) राजाओं के सिर पर अवभासित होते हैं और जो ( चरणरूप पाद देवताओं के भी शिरों पर आक्रमण करते हैं, इस प्रकार सूर्य के दोनों पाद ( किरणरूप और चरणरूप ) आप लोगों का कल्याण करें । इस प्रकार शब्दशक्तिमूल अनुरवानरूपव्यङ्ग्य ध्वनि के दूसरे भी प्रकार हैं, उन्हें सहृदय लोग स्वयं अनुसरण करें । यहां ग्रन्थ के विस्तार के भय से उनका प्रपञ्च नहीं किया है। अर्थशक्त्युद्भव अन्य ( ध्वनि ) है, जहां वह अर्थ प्रकाशित होता है जो उक्ति के बिना तात्पर्य रूप से स्वतः अन्य वस्तु को प्रकाशित करता है ॥ २२ ॥ जहां अर्थ शब्द व्यापार के बिना ही अपने सामर्थ्य से अर्थान्तर को अभिव्यक्त करता है, वह ‘अर्थशक्त्युद्भव’ नाम का अनुरवानोपमव्यङ्ग्य ध्वनि है। जैसे— लोचनम् स्फुटं नोच्यते केनचिदिति भावः । नखैरुद्भासन्ते येऽवश्यं खे गगने न उद्भा- सन्ते । उभये रश्म्यात्मानोऽङ्गुलीपाष्र्ण्यवयवविरूपाश्चेत्यर्थः ॥ २१ ॥ एवं शब्दशक्त्युद्भवं ध्वनिमुक्त्वाऽर्थशक्त्युद्भवं दर्शयति—अर्थेति । अन्य इति शब्दशक्त्युद्भवात् । स्वतस्तात्पर्येणेत्यभिधाव्यापारनिराकरणपरमिदं पदं ध्वन- नव्यापारमाह न तु तात्पर्यशक्तिम् । सा हि वाच्यार्थप्रतीतावेवोपक्षीणेत्युक्तं प्राक् । अनेनैवाशयेन वृत्तौ व्याचष्टे—यत्रार्थः स्वसामर्थ्यादिति । स्वत इति आकाश में उद्भासित नहीं हैं । दोनों ( पाद ) अर्थात् किरणरूप और अङ्गुलि, पार्ष्णि आदि अवयवों वाले ॥ २१ ॥ इस प्रकार शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि को कह कर अर्थशक्त्युद्भव ध्वनि को दर्शाते हैं—अर्थ०—। अन्य अर्थात् शब्दशक्त्युद्भव से ( अन्य ) । ‘स्वतः तात्पर्यंरूप से’ इस अभिधाव्यापार के निराकरण में तात्पर्य वाला यह पद ध्वननव्यापार को कहता है न कि तात्पर्यशक्ति को । क्यों कि वह ( तात्पर्यशक्ति ) वाच्यार्थ की प्रतीति में ही उपक्षीण हो जाती है, यह पहले कह चुके हैं । इसी अभिप्राय से वृत्ति में व्याख्यान करते हैं— जहां अर्थ अपनी सामर्थ्य से—। ‘स्वतः’ इस शब्द की ‘अपनी’ ( ‘स्व’ ) शब्द से