भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 680 में से

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पृष्ठ 326

२६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा ममैव— सर्वैकशरणमक्षयमधीशमीशं धियां हरिं कृष्णम् । चतुरात्मानं निष्क्रियमरिमथनं नमत चक्रधरम् ॥ अत्र हि शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपो विरोधः स्फुटमेव प्रतीयते । एवंविधो व्यतिरेकोऽपि दृश्यते । यथा ममैव— खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति लूनतमसो ये वा नखोद्भासिनो ये पुष्णन्ति सरोरुहश्रीमपि क्षिप्ताब्जभासश्च ये । ये मूर्धस्ववभासिनः क्षितिभृतां ये चामराणां शिरां- अथवा जैसे, मेरा ही— सब का एक मात्र शरण, अविनाशी ( 'शरण' और 'क्षय' दोनों गृहवाची हैं, अतः विरोध यह है कि जो सबका एक मात्र शरण अर्थात् गृह है वह क्षय अर्थात् गृह से रहित कैसे है ? ), अधीश, बुद्धियों के ईश ( विरोध यह है कि जो बुद्धियों के ईश अर्थात् धीश है वह अधीश अर्थात् बुद्धियों के ईश अर्थात् स्वामी नहीं कैसे हैं ? ) हरि ( विष्णु ) कृष्ण ( विरोध यह है जो हरि अर्थात् हरित वर्ण के हैं वह कृष्ण वर्ण के कैसे हैं ? ) सर्वज्ञस्वरूप, निष्क्रिय ( चतुरात्मा अर्थात् पराक्रमयुक्त हैं और निष्क्रिय कैसे हैं ? यह विरोध है ) और अरियों के मथन करने वाले, चक्रधारी ( विरोध यह जो अर वालों अर्थात् चक्रवालों का मथन करने वाले हैं वह चक्रधारी कैसे हैं ? ) हैं । यहां शब्दशक्तिमूल अनुस्वान रूप विरोध स्पष्ट ही प्रतीत होता है । इस प्रकार का 'व्यतिरेक' ( अलङ्कार ) भी देखा जाता है । जैसे मेरा ही— ( सूर्य के ) जो अन्धकार का नाश करने वाले ( किरणरूप ) पाद आकाश को उज्ज्वल करते हैं और जो ( चरणरूप ) पादनखों से शोभित ( व्यतिरेक यह कि आकाश को उद्भासित या उज्ज्वल नहीं करते हैं ), जो ( किरणरूप पाद ) कमलों की शोभा बढ़ाते हैं और जो ( चरणरूप पाद ) कमलों की शोभा को तिरस्कृत करते हैं, जो ( किरणरूप पाद ) क्षितिभृत् अर्थात् ( पर्वतों के शिखरों पर आक्रमण लोचनम् धीशः स कथं धियामीशः । यो हरिः कपिलः स कथं कृष्णः । चतुरः पराक्रम- युक्तो यस्यात्मा स कथं निष्क्रियः । अरीणामरयुक्तानां यो नाशयिता स कथं चक्रं बहुमानेन धारयति । विरोध इति । विरोधनमित्यर्थः । प्रतीयत इति । अर्थात् कपिल है वह कृष्ण कैसे ? चतुर अर्थात् पराक्रमयुक्त जिसकी आत्मा है वह निष्क्रिय कैसे है ? अरियों अर्थात् अर ( चक्र )—युक्तों का जो नाश करने वाला है वह कैसे चक्र को बहुमानपूर्वक धारण करता है ? विरोध अर्थात् विरोधन । प्रतीत होता है—। भाव यह कि कोई स्पष्ट नहीं कहता है । नखों से उद्भासित हैं, जो ख अर्थात्