ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २६५ ध्वन्यालोकः अत्र हि वाच्यो विरोधस्तच्छायानुग्राही वा श्लेषोऽयमिति न शक्यं वक्तुम् । साक्षाच्छब्देन विरोधादलङ्कारस्याप्रकाशितत्वात् । यत्र हि साक्षाच्छब्दावेदितो विरोधादलङ्कारस्तत्र हि श्लिष्टोक्तौ वाच्यालङ्कारस्य विरोधस्य श्लेषस्य वा विषयत्वम् । यथा तत्रैव— 'समवाय इव विरोधिनां पदार्थानाम् । तथाहि—सन्निहितबाला- न्धकारापि भास्वन्मूर्तिः' इत्यादौ । यहाँ विरोध वाच्य है और अथवा यह श्लेष उसकी छाया का अनुग्राहक है, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि साक्षात् शब्द द्वारा विरोध-अलङ्कार प्रकाशित नहीं है। जहां विरोध-अलङ्कार साक्षात् शब्द से आवेदित होता है, वहां श्लिष्ट उक्ति में वाच्यालङ्कार विरोध अथवा श्लेष का विषय होता है। जैसे, वहीं पर— 'विरोधी पदार्थों के समवाय की भांति, जैसे कि सन्निहित है बाल रूप अन्धकार जिसके ऐसी सूर्य की मूर्ति (यह विरोध हुआ) अन्धकार रूप काले बालों से युक्त भी चमकती हुई मूर्तिवाले थे।' लोचनम् वच्छुचि वदनं च यासाम् । यत्र हीति । यस्यां श्लेषोक्तौ काव्यरूपायां, तत्र यो विरोधः श्लेषो वेति सङ्करः तस्य विषयत्वम् । स विषयो भवतीत्यर्थः । कस्य ? वाच्यालङ्कारस्य वाच्यालङ्कृतेः वाच्यालङ्कृतित्वस्येत्यर्थः । तत्रैव विरोधे श्लेषे वा वाच्यालङ्कारत्वं सुवचमिति यावत् । बालेषु केशेष्वन्धकारः कार्ण्यं, बालः प्रत्यग्रश्चान्धकारस्तमः । ननु मातङ्गेत्यादावपि धर्मद्वये यश्चकारः स विरोधद्योतक एव । अन्यथा प्रतिधर्मं सर्वधर्मान्ते वा न कश्चिद्वा चकारः स्यात् यदि समुच्चयार्थः स्यादित्य- भिपायेणोदाहरणान्तरमाह—यथेति । शरणं गृहमक्षयरूपमगृहं कथम् । यो न समान शुचि मुख है जिनका । जिस काव्यरूप श्लेषोक्ति में, वहाँ विरोध अथवा श्लेष का सङ्कर है उसका विषय है, अर्थात् वह विषय होता है। किसका ? वाच्यालङ्कार का अर्थात् वाच्यालङ्कृति का, वाच्यालङ्कृतित्व का । वहीं विरोध में अथवा श्लेष में वाच्यालङ्कारत्व सुतरां कहा जा सकता है। बालों अर्थात् केशों के कारण अन्धकार अर्थात् कृष्णमा और प्रत्यग्र अन्धकार अर्थात् तमस् । मातङ्ग०—। इत्यादि स्थल में भी जो दो धर्मों में 'और' (चकार) है वह विरोध का द्योतक ही है, यदि ऐसा नहीं तो प्रति धर्म में अथवा सभी धर्मों के अन्त में अथवा कहीं भी 'और' (चकार) नहीं होता, यदि समुच्चय के अर्थ में होता, इस अभिप्राय से दूसरा उदाहरण कहते हैं—जैसे—। शरण अर्थात् गृह अक्षय रूप अगृह कैसे ? जो धीश (बुद्धियों का स्वामी) नहीं, वह बुद्धियों का स्वामी (धियामीश) कैसे ? जो हरि