ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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२६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
ध्वनेर्विषयः । अन्येऽपि चालङ्काराः शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपव्यङ्ग्ये
ध्वनौ सम्भवन्त्येव । तथा हि विरोधोऽपि शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपो
दृश्यते । यथा स्थाण्वीश्वराख्यजनपदवर्णने भट्टबाणस्य—
'यत्र च मातङ्गगामिन्यः शीलवत्यश्च गौर्यो विभववताश्च श्यामाः
पद्मरागिण्यश्च धवलद्विजशुचिवदना मदिरामोदिश्वसनाश्च प्रमदाः' ।
है । और भी अन्य अलङ्कार शब्दशक्तिमूल-अनुस्वानरूप-व्यङ्ग्य ध्वनि में हो सकते
ही हैं । जैसा कि विरोध भी शब्दशक्तिमूल-अनुस्वानरूप देखा जाता है । जैसे, 'स्था-
ण्वीश्वर' नाम के जनपद के वर्णन में भट्टबाण का—
'जहां गज की चाल चलने वाली और शीलवती ( 'मातङ्ग' अर्थात् चाण्डाल,
मातङ्गगामिनी अर्थात् चाण्डाल का गमन करने वाली और शीलवती यह विरोध है,
'गजगामिनी' इस अर्थ से उस विरोध का परिहार हो जाता है ), गौरवर्ण और विभव
में रत अर्थात् ऐश्वर्यसम्पन्न ( विरोध यह कि जो गौरी अर्थात् पार्वती है वह विभव
अर्थात् शिव-भिन्न में रत अर्थात् अनुरागयुक्त कैसे होगी ), श्यामा (जवान ) और
पद्मराग वाली ( श्याम वर्ण और कमल के समान राग वाली यह विरोध है ), निर्मल
द्विजों अर्थात् दांतों से युक्त पवित्र मुख वाली ( विरोध में निर्मल द्विजों अर्थात् ब्राह्मणों
के समान पवित्र मुख वाली ) और मदिरा की गन्ध से युक्त श्वास वाली ( विरोध
यह कि जो निर्मल ब्राह्मण के समान पवित्र मुख वाली है वह मदिरा की गन्ध से युक्त
श्वास वाली कैसे है ? ) स्त्रियां हैं ।
लोचनम्
मातङ्गेति । मातङ्गवद्गच्छन्ति तान् शबरांश्च गच्छन्तीति विरोधः । विभवेषु
रताः विगतमहादेवे स्थाने च रताः । पद्मरागरत्नयुक्ताः पद्मसदृशलौहित्ययु-
क्ताश्च । धवलैर्द्विजैर्दन्तैः शुचि निर्मलं वदनं यासां धवलद्विजवदुत्कृष्टविप्र-
मातङ्ग— । मातङ्ग के समान गमन करती हैं और उन शबरों अर्थात् चाण्डालों
का गमन करती हैं यह विरोध है । विभवों में रत और विगतमहादेव स्थान में रत ।
पद्मरागरत्न से युक्त और पद्म के सदृश लौहित्य से युक्त । धवल द्विज अर्थात् दांतों से
शुचि अर्थात् निर्मल मुख है जिनका और धवल द्विज के समान अर्थात् उत्कृष्ट विप्र के
यह हैं कि दोनों अर्थों को वहां व्यापार रूप उपमेयभाव ही आस्वादप्रतीति के प्रधान विश्रा- न्तिस्थान हैं, न कि उपमेय आदि हैं जैसा कि 'उपमा' में उपमेय आस्वाद प्रतीति का विश्रान्ति स्थान होता है । उपमा के रूप में व्यतिरेचन ( जो 'व्यतिरेक' अलङ्कार में व्यापार है ) और निह्नव ( जो 'अपह्नुति अलङ्कार में व्यापार है ) आदि भी आस्वादप्रतीति के चरम विश्रान्ति स्थान हैं । अलङ्कारध्वनि में सर्वत्र यही प्रकार है ।