ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः अत्र शृङ्गारव्यभिचारी विस्मयाख्यो भावः साक्षाद्विरोधालङ्कारश्च प्रतिभासत इति विरोधच्छायानुग्राहिणः श्लेषस्यायं विषयः, न त्वनुस्वा- नोपमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य तु ध्वनेर्वाच्येन श्लेषेण विरोधेन वा व्यञ्जितस्य विषय एव । यथा ममैव — श्लाघ्याशेषतनुं सुदर्शनकरः सर्वाङ्गलीलाजित- त्रैलोक्यां चरणारविन्दललितेनाक्रान्तलोको हरिः । यहां शृङ्गार का व्यभिचारी विस्मय नाम का भाव और साक्षात् विरोध अलङ्कार प्रतिभासित हो रहे हैं, इस प्रकार विरोध की छाया के अनुग्राहक श्लेष का यह विषय है, न कि अनुस्वानसदृशव्यङ्ग्यरूप ध्वनि का। वाच्य श्लेष अथवा विरोध से व्यञ्जित अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का तो विषय ही है। जैसे, मेरा ही— जिनका केवल हाथ ही देखने में सुन्दर है ( अथवा हाथ में सुदर्शन चक्र धारण करने वाले ), जिन्होंने अपने चरणारविन्द से (अथवा चरण के विक्षेप से) तीन लोकों लोचनम् नियच्छति हरतो हृदयमवश्यमिति हारिणौ । हारो विद्यते ययोस्तौ हारिणा- विति । अत एव विस्मयशब्दोऽस्यैवार्थस्योपोलकः । अपिशब्दाभावे तु न तत एवार्थद्वयस्याभिधा स्यात् , स्वसौन्दर्यादेव स्तनयोर्विस्मयहेतुत्वोपपत्तेः । विस्मयाख्यो भाव इति दृष्टान्ताभिप्रायेणोपात्तम् । यथा विस्मयः शब्देन प्रतिभाति विस्मय इत्यनेन शब्देन तथा विरोधोऽपि प्रतिभात्यपीत्यनेन शब्देन । ननु किं सर्वथात्र ध्वनिनीस्तीत्याशङ्क्याह—अलक्ष्येति । विरोधेन वेति । वाग्रहणेन श्लेषविरोधसङ्करालङ्कारोऽयमिति दर्शयति, अनुग्रहयोगादेक- तरत्यागग्रहणनिमित्ताभावो हि वाशब्देन सूच्यते । सुदर्शनं चक्रं करे यस्य । भी अभिधाशक्ति को अर्पित करता है, हृदय को अवश्य हरण करते हैं, इसलिए हारी हैं और जिन दोनों के हार है अतएव हारी । इसी लिए 'विस्मय' शब्द इसी अर्थ का उपोद्वलक है । 'भी' शब्द के अभाव में तो उसीसे दोनों अर्थों का अभिधान नहीं होता, बल्कि स्वगत सौन्दर्य से ही स्तनों का विस्मयहेतुत्व उपपन्न हो जाता । 'विस्मय नाम का भाव' यह दृष्टान्त के अभिप्राय से उपादान किया है। जैसे विस्मय 'विस्मय' शब्द से प्रतीत होता है, 'उस प्रकार विरोध भी' 'भी' ( 'अपि' ) इस शब्द से प्रतीत होता है । क्या सर्वथा यहाँ ध्वनि नहीं है ? यह आशङ्का करके कहते हैं— अलक्ष्य०— । अथवा विरोध से— । 'अथवा' ( वा' ) ग्रहण से 'यह श्लेष और विरोध का सङ्कर अलङ्कार' है, यह दिखाते हैं, अनुग्रह के योग से ( अर्थात् अनुग्राह्यानुग्राहकभाव के कारण ) किसी एक के त्याग और ग्रहण के निमित्त का अभाव 'वा' शब्द से सूचित किया है । सुदर्शन चक्र जिसके हाथ में है । व्यतिरेक-पक्ष में सुदर्शन अर्थात् श्लाघ्य