भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

द्वितीय उद्योतः २५३ ध्वन्यालोकः नन्वलङ्कारान्तरप्रतिभायामपि श्लेषव्यपदेशो भवतीति दर्शितं भट्टोद्भटेन, तत्पुनरपि शब्दशक्तिमूलो ध्वनिर्निरवकाश इत्याशङ्क्येदमुक्तम् ‘आक्षिप्तः’ इति । तदयमर्थः—यत्र शब्दशक्त्या साक्षादलङ्कारान्तरं वाच्यं सत्प्रतिभासते स सर्वः श्लेषविषयः । यत्र तु शब्दशक्त्या सामर्थ्याक्षिप्तं वाच्यव्यतिरिक्तं व्यङ्ग्यमेवालङ्कारान्तरं प्रकाशते स ध्वनेर्विषयः । शब्दशक्त्या साक्षादलङ्कारान्तरप्रतिभा यथा— तस्या विनापि हारेण निसर्गादेव हारिणौ । जनयामासतुः कस्य विस्मयं न पयोधरौ ॥ ( शङ्का करते हैं कि ) यह उद्भट ने दिखाया है कि अलङ्कारान्तर की प्रतिभा में भी ‘श्लेष’ का ही व्यपदेश होता है, तब तो फिर शब्दशक्तिमूल ध्वनि का कोई स्थान नहीं रह गया ! यह आशङ्का करके यह कहा है ‘आक्षिप्त’ ( अर्थात् आक्षेप- सामर्थ्य से प्राप्त ) । तो यह अर्थ है—जहां शब्दशक्ति से साक्षात् अलङ्कारान्तर वाच्य होता हुआ प्रतीत होता है, वह सब श्लेष का विषय है । और जहां शब्दशक्ति द्वारा सामर्थ्य से आक्षिप्त और वाच्य से अतिरिक्त व्यङ्ग्य ही अलङ्कारान्तर प्रकाशित होता है, वह ध्वनि का विषय है। शब्दशक्ति द्वारा साक्षात् अलङ्कारान्तर की प्रतिभा; जैसे— उसके दोनों पयोधर हार के बिना भी स्वभाव से ही हारी ( हार धारण करने वाले, परिहार यह कि मनोहर ) किसके विस्मय को उत्पन्न नहीं किए ? लोचनम् कृतः शरत्वं नीतः। उद्द्वृत्ता भुजङ्गा एव हारा वलयाश्च यस्य, मन्दाकिनीं च योऽधारयत् , यस्य च ऋषयः शशिमच्छन्द्रयुक्तं शिर आहुः, हर इति च यस्य नाम स्तुत्याहुः, स भगवान्स्वयमेवान्धकासुरस्य विनाशकारी त्वां सर्वदा सर्वकालमुमाया धवो वल्लभः पायादिति । अत्र वस्तुमात्रं द्वितीयं प्रतीतं नालङ्कार इति श्लेषस्यैव विषयः । आक्षिप्तशब्दस्य कारिकागतस्य व्यव- च्छेद्यं दर्शयितुं चोद्येनोपक्रमते—नन्वलङ्कारेत्यादिना । तस्या विनापीति । अपिशब्दोऽयं विरोधमाचक्षाणोऽर्थद्वयेऽप्यभिधाशक्तिं अर्थात् बाण बनाया, उद्द्वृत्त ( लिपटे हुए ) भुजङ्ग ही हैं हार और वलय जिसके, मन्दा- किनी को जिसने धारण किया, ऋषिलोग जिसके सिर को ‘चन्द्रयुक्त’ बतलाते हैं और ‘हर’ यह जिसका स्तुत्य नाम उच्चारण करते हैं, वह भगवान् स्वयमेव अन्धक असुर के विनाशकारी, उमा के प्रिय सर्वदा तुम्हारी रक्षा करें।’ यहां दूसरा प्रतीत वस्तुमात्र अलङ्कार नहीं है, श्लेष का ही विषय है । कारिका में आए हुए ‘आक्षिप्त’ शब्द व्यवच्छेद्य दिखलाने के लिए पहले से उपक्रम करते हैं—शङ्का करते हैं—इत्यादि से । उसके दोनों०—। यह ‘भी’ शब्द विरोध का अभिधान करता हुआ दोनों अर्थों में