भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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द्वितीय उद्योतः २५१ ध्वन्यालोकः उच्यते तदिदानीं श्लेषस्य विषय एवापहृतः स्यात्, नापहृत इत्याह— आक्षिप्त एवालङ्कारः शब्दशक्त्या प्रकाशते । यस्मिन्ननुक्तः शब्देन शब्दशक्त्युद्भवो हि सः ॥ २१ ॥ यस्मादलङ्कारो न वस्तुमात्रं यस्मिन् काव्ये शब्दशक्त्या प्रकाशते स शब्दशक्त्युद्भवो ध्वनिरित्यस्माकं विवक्षितम् । वस्तुद्वये च शब्द- शक्त्या प्रकाश्यमाने श्लेषः । यथा— ध्वनि का प्रकार कहते हैं तब तो अब श्लेष का विषय ही अपहृत हो जायगा । इस पर कहते हैं कि अपहृत न होगा— क्योंकि, जहां शब्द से अनुक्त ( साक्षात् संकेतित नहीं ) अलङ्कार आक्षेप-सामर्थ्य से ही शब्दशक्ति द्वारा प्रकाशित होता है, वह 'शब्द-शक्त्युद्भव ध्वनि' है ॥ २१ ॥ क्योंकि, अलङ्कार, न कि वस्तुमात्र, जिस काव्य में शब्दशक्ति से प्रकाशित होता है वह 'शब्दशक्त्युद्भव ध्वनि' है, यह हमारा विवक्षित है । और दो वस्तुओं के शब्दशक्ति द्वारा प्रकाशित होने पर 'श्लेष' होता है । जैसे— लोचनम् कारिकागतं हिशब्दं व्याचष्टे—यस्मादिति । अलङ्कारशब्दस्य व्यवच्छेद्यं दर्शयति—न वस्तुमात्रमिति । वस्तुद्वये चेति । चशब्दस्तुशब्दस्यार्थे । येनेति । येन ध्वस्तं बालक्रीडायामनः शकटम् । अभवेनाजेन सता । बलिनो दान- कारिका में आए 'क्योंकि' ( हि ) शब्द की व्याख्या करते हैं—क्योंकि—। 'अलङ्कार' शब्द का व्यवच्छेद्य दिखलाते हैं—न कि वस्तुमात्र—। और दो वस्तुओं के—। 'और' का अर्थ 'तो' है । जिसने— । जिसने बचपन के खेल में शकट ( नाम के असुर ) का नाश किया । अभव अर्थात् अज या अजन्मा रूप में विद्यमान । बली दानवों को जो जीतने वाला है, अविवक्षितवाच्य को लक्षणामूल ध्वनि और विवक्षितान्यपरवाच्य को अभिधामूल ध्वनि भी कहते हैं । अविवक्षितवाच्य ध्वनि के भी दो भेद हैं—अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य । फिर विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के भी दो भेद निर्दिष्ट होते हैं—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्ति- मूल । बहुत लोगों ने उभयशक्तिमूल भी एक और भेद माना है। वस्तु और अलङ्कार ध्वनि के भेद से शब्दशक्तिमूल के भी दो भाग हैं। अर्थशक्तिमूल के १२ भेद आगे निर्दिष्ट होंगे । इस प्रकार संलक्ष्यक्रम के १५ भेद और असंलक्ष्य क्रम व्यङ्ग्य के एक भेद को मिला कर विवक्षितान्यपरवाच्य या अभिधामूल ध्वनि के १६ भेद होते हैं और उपर्युक्त दो भेद अविवक्षितवाच्य या लक्षणामूल ध्वनि के हैं। इस प्रकार सब मिल कर १८ भेद हैं जो आगे और भी विस्तृत होते हैं । प्रस्तुत में संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य के शब्दशक्तिमूल ध्वनि और श्लेष अलङ्कार के विषय-भेद का विचार करते हैं ।