भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

२५० सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
क्रमेण प्रतिभात्यात्मा योऽस्यानुस्वानसन्निभः ।
शब्दार्थशक्तिमूलत्वात्सोऽपि द्वेधा व्यवस्थितः ॥ २० ॥
अस्य विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनेः संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यत्त्वादनुर-
णनप्रख्यो य आत्मा सोऽपि शब्दशक्तिमूलोऽर्थशक्तिमूलश्चेति द्विप्रकारः ॥
ननु शब्दशक्त्या यत्रार्थान्तरं प्रकाशते स यदि ध्वनेः प्रकार
इसका जो आत्मा ( स्वरूप ) अनुस्वान ( घंटा के अनुरणन ) के सदृश क्रम से
प्रतीत होता है वह शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल होने के कारण दो प्रकार से
व्यवस्थित है ॥ २० ॥
इस विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि का संलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य होने के कारण ( क्रम से
व्यङ्ग्य के संलक्षित होने के कारण ) अनुरणन रूप जो आत्मा ( स्वरूप ) है वह भी
दो प्रकार का होता है—शब्दशक्तिमूल और अर्थशक्तिमूल ।
( शङ्का करते हैं कि ) जहां शब्दशक्ति से अर्थान्तर प्रकाशित होता है उसे यदि
लोचनम्
एवं विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनेः प्रथमं भेदमलक्ष्यक्रमं विचार्य द्वितीयं भेदं
विभक्तुमाह—क्रमेणेत्यादि । प्रथमपादोऽनुवादभागो हेतुत्वेनोपात्तः । घण्टाया
अनुरणनमभिघातजशब्दापेक्षया क्रमेणैव भाति । सोऽपीति । न केवलं मूलतो
ध्वनिद्विविधः । नापि केवलं विवक्षितान्यपरवाच्यो द्विविधः । अयमपि द्विविध
एवेत्यपिशब्दार्थः ॥ २० ॥
इस प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि के प्रथम भेद अलक्ष्यक्रम का विचार
करके दूसरे भेद को विभाजनार्थ कहते हैं—इसका जो० इत्यादि । प्रथम पाद अनुवाद
भाग हेतु रूप में उपात्त है । ( अर्थात् जिस कारण क्रम से प्रतीत होता है, उसी कारण
'अनुस्वान के सदृश' है ) घण्टा का अनुरणन अभिघातजनित शब्द की अपेक्षा से क्रम से
ही प्रतीत होता है । वह भी—। 'भी' शब्द का अर्थ है कि न केवल मूलतः ध्वनि दो
प्रकार का है, और न केवल विवक्षितान्यपरवाच्य दो प्रकार का है, यह ( संलक्ष्यक्रम-
व्यङ्ग्य ध्वनि )१ भी दो प्रकार का ही है ॥ २० ॥
किया और 'प्राणों को क्यों' इत्यादि से त्याग कर दिया, फिर 'अगर' इत्यादि से उपादान किया;
इसी प्रकार 'प्रियया' इत्यादि से निदर्शना का उपादान किया और 'क्यों मूर्च्छित हो जाता हूँ'
से त्याग किया, फिर 'क्या गति है' इत्यादि से उसका पुनः उपादान किया । अथवा 'सन्तप्त करती
हैं' इससे रूपक का, 'हर लेती हैं' इससे सन्देह का और 'मूर्च्छित हो जाता हूँ' इससे निदर्शना का
त्याग है और 'समझ में नहीं आता' इत्यादि से उनका उपादान है । यह टिप्पणी 'लोचन' की
'बालप्रिया' में निर्दिष्ट है ।
१. ध्वनि पहले दो प्रकार का बताया जा चुका अविवक्षित वाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य ।