ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २४९ ध्वन्यालोकः तथाविधं महाकविप्रबन्धेष्वपि दृश्यते बहुशः । तत्तु सूक्तिसहस्रद्योति- तात्मनां महात्मनां दोषोद्घोषणमात्मन एव दूषणं भवतीति न विभज्य दर्शितम् । किं तु रूपकादेरलङ्कारवर्गस्य येयं व्यञ्जकत्वे रसादिविषये लक्षणदिग्दर्शिता तामनुसरन् स्वयं चान्यल्लक्षणमुत्प्रेक्षमाणो यद्यलक्ष्य- क्रमप्रतिभमनन्तरोक्तेनेमं ध्वनेरात्मानमुपनिबध्नाति सुकविः समाहित- चेतास्तदा तस्यात्मलाभो भवति महीयानिति ॥ १८-१९ ॥ प्रकार का लक्ष्य महाकवियों के प्रबन्धों में भी बहुत देखा जाता है । परन्तु वह हजारों सूक्तियों से उद्योतित महात्मा जनों का दोष प्रकटन अपना ही दूषण होगा । इसलिए विभाग करके नहीं दिखाया । किन्तु रूपक आदि अलङ्कारों का जो कि यह रसादि विषय के व्यञ्जकत्व में लक्षण का प्रकार दिखाया है उसका अनुसरण करता हुआ और स्वयं अन्य लक्षण का उत्प्रेक्षण करता हुआ, समाहितचित्त सुकवि यदि पूर्वोक्त अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्यसदृश ध्वनि के आत्मा का उपनिबन्धन करता है तो उसे बड़ा आत्मलाभ होता है ॥ १८-१९ ॥ लोचनम् कृतकृत्यतेति दर्शयति - किं त्विति । अन्यल्लक्षणमिति । परीक्षाप्रकारमित्यर्थः । तद्यथावसरे त्यक्तस्यापि पुनर्ग्रहणमित्यादि । यथा ममैव— शीतांशोरमृतच्छटा यदि कराः कस्मान्मनो मे भृशं संप्लुष्यन्त्यथ कालकूटपटलीसंवाससंदूषिताः । किं प्राणान्न हरन्त्युत प्रियतमासङ्कल्पमन्त्राक्षरै- रक्ष्यन्ते किमु मोहमेमि हहहा नो वेद्मि केयं गतिः ॥ इत्यत्र हि रूपकसन्देहनिदर्शनास्त्यक्त्वा पुनरुपात्ता रसपरिपोषायेत्यलम् ॥ की दिशा से अपनी कृतकृत्यता दिखाते हैं—किन्तु— । अन्य लक्षण— । अर्थात् परीक्षा का प्रकार । जैसे अवसर में छोड़े गए का भी फिर से ग्रहण, इत्यादि । जैसा मेरा ही— यदि चन्द्र की किरणें अमृतरूप हैं तो किस कारण मेरे मन को अत्यन्त सन्तप्त करती हैं ? यदि ये किरणें विषसमूह के साथ रहने से दूषित हो गई हैं तो प्राणों को क्यों नहीं हर लेती हैं ? अगर प्रियतमा के साथ बातचीत रूप मन्त्राक्षरों से प्राणों की रक्षा हो जाती है तो फिर क्यों मूर्च्छित हो जाता हूँ ? हा, हा, समझ में नहीं आता, यह कौन गति है ! यहां रूपक, सन्देह और निदर्शना अलङ्कारों को छोड़ कर पुनः उपादान किया गया १ है । अधिक कहना आवश्यक नहीं ॥ १८–१९ ॥ १. 'चन्द्र की किरणें अमृत रूप हैं' यहां रूपक का ग्रहण किया और 'किस कारण' इत्यादि से त्याग किया, 'यदि' इत्यादि से पुनः रूपक का उपादान किया; विषसमूह से दूषितत्व का 'संदेह'