भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 680 में से

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पृष्ठ 308

२४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्यामास्वङ्गं चकितहरिणीप्रेक्षणे दृष्टिपातं गण्डच्छायां शशिनि शिखिनां बर्हभारेषु केशान् । उत्पश्यामि प्रतनुषु नदीवीचिषु भ्रूविलासान् हन्तैकस्थं क्वचिदपि न ते भीरु सादृश्यमस्ति ॥ इत्यादौ । स एवमुपनिबध्यमानोऽलङ्कारो रसाभिव्यक्तिहेतुः कवेर्भवति । उक्तप्रकारातिक्रमे तु नियमेनैव रसभङ्गहेतुः सम्पद्यते । लक्ष्यं च हे भीरु, श्यामा लताओं में तेरे अङ्ग को, चकचिहाई हिरनी की निगाह में तेरे दृष्टिपात को, चन्द्र में तेरे गालों की कान्ति को, मयूरों के पुच्छभार में तेरे बालों को और नदी की पतली तरङ्गों में तेरे भ्रूविलासों को देखता फिरता हूँ, हन्त तेरा सादृश्य कहीं एक जगह नहीं है। इत्यादि में । वह इस प्रकार कवि का उपनिबध्यमान अलङ्कार रसाभिव्यक्ति का हेतु होता है, उक्त प्रकारों के अतिक्रमण करने पर, नियमतः रसभङ्ग का हेतु हो जाता है । उस लोचनम् श्यामासु सुगन्धिप्रियङ्गुलतासु पाण्डिम्ना तनिम्ना कण्टकितत्वेन च योगात् । शशिनीति पाण्डुरत्वात् । उत्पश्यामीति यत्नेनोत्प्रेक्षे । जीवितसन्धारणायेत्यर्थः । हन्तेति कष्टम्, एकस्थसादृश्याभावे हि दोलायमानोऽहं सर्वत्र स्थितो न कुत्रचिदेकत्र धृतिं लभ इति भावः । भीर्विति । यो हि कातरहृदयो भवति नासौ सर्वस्वमेकस्थं धारयतीत्यर्थः । अत्र ह्युत्प्रेक्षायास्तद्भावाध्यारोपरूपाया अनुप्राणकं सादृश्यं यथोपक्रान्तं, तथा निर्वाहिरतमपि विप्रलम्भरसपोषकमेव जातम् । तत्तु लक्ष्यं न दर्शितमिति सम्बन्धः । प्रत्युदाहरणे ह्यदर्शितेऽप्युदाहरणानुशीलनदिशा श्यामा अर्थात् शोभन गन्ध वाली प्रियङ्गु लताओं में, पाण्डुता, कृशता और कण्टकित- भाव के योग के कारण । शशी में पाण्डुर होने के कारण । देखता फिरता हूँ, यत्नपूर्वक उत्प्रेक्षण करता हूँ, अर्थात् जीवन धारण के लिए । 'हन्त' अर्थात् कष्टम् । भाव यह कि एक जगह सादृश्य के न मिलने से दोलायमान मैं सब जगह जाता हूँ, कहीं एक जगह मुझे धीरज नहीं मिलता है। भीरु—। अर्थात् जो कातर हृदय वाला होता है वह सब कुछ एक जगह नहीं रखता है ( क्योंकि कोई चुरा न ले जाय ) । यहां तद्भावाध्यारोप रूप ( अर्थात् जिसमें जो न हो उसका आहार्य आरोप रूप, जैसे श्यामा अर्थात् प्रियङ्गु लताओं में अङ्ग का अध्यारोप ) उत्प्रेक्षा को अनुप्राणित करने वाला सादृश्य जैसे उपक्रान्त है, निर्वाह किया गया भी विप्रलम्भरस का पोषक ही बना है । 'वह तो अर्थात् लक्ष्य नहीं दिखाया है' यह सम्बन्ध है । प्रत्युदाहरण के न दिखाने पर भी उदाहरण के अनुशीलन