ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 307, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २४७ ध्वन्यालोकः कोपात्कोमललोलबाहुलतिकापाशेन बद्ध्वा दृढं नीत्वा वासनिकेतनं दयितया सायं सखीनां पुरः । भूयो नैवमिति स्खलत्कलगिरा संसूच्य दुश्चेष्टितं धन्यो हन्यत एव निह्नुतिपरः प्रेयान्रुदत्या हसन् ॥ अत्र हि रूपकमाक्षिप्तमनिर्व्यूढं च परं रसपुष्टये । निर्वोढुमिष्टमपि यं यत्नादङ्गत्वेन प्रत्यवेक्षते यथा- कोप के कारण अपनी कोमल और चंचल बाहुलता के पाश में जोर से बांध कर, सखियों के सामने वासगृह में ले जाकर, (उस नायक के परस्त्रीगमन आदि) दुश्चेष्टित को सूचित करके 'फिर ऐसा नहीं' यह लड़खड़ाती अव्यक्त आवाज में कहते हुए रुदन करती हुई नायिका के द्वारा अपने नखक्षत आदि को छिपाने में संलग्न हंसता हुआ धन्य प्रियतम मार खाता है। यहां रूपक आक्षिप्त एवं पूरा निर्वाह नहीं किया गया है, फिर भी रस का पोष करता है। निर्वाह के इष्ट भी जिसे यत्न से अङ्ग के रूप में देखता है। जैसे- लोचनम् मनौचित्यं स्यात् । सखीनां पुर इति । भवत्योऽनवरतं ब्रुवते नायमेवं करो- तीति तत्पश्यन्त्विदानीमिति भावः । स्खलन्ती कोपावेशेन कला मधुरा च गीर्यस्याः सा । कासौ गीरित्याह-भूयो नैवमित्येवंरूपा । एवमिति यदुक्तं तत्किमित्याह-दुश्चेष्टितं नखपदादि संसूच्य अङ्गुल्यादिनिर्देशेन । हन्यत एवेति । न तु सख्यादिकृतोऽनुनयोऽनुरुध्यते । यतोऽसौ हसनं निमित्तीकृत्य निह्नुतिपरः प्रियतमश्च तदीयं व्यलीकं का सोढुं समर्थेति । निर्वोढुमिति । निःशेषेण परिसमापयितुमित्यर्थः । अनौचित्य हो जाता । सखियों के सामने-। भाव यह है कि तुम सब हमेशा कहती हो 'यह ऐसा नहीं करता' तो अब देखो। स्खलित होती हुई कोपावेश से लड़खड़ाती हुई और कल अर्थात् मधुर वाणी है जिसकी। कौन वह वाणी है-'फिर ऐसा नहीं' इस प्रकार कि । 'इस प्रकार' जो यह कहा है वह क्या है, कहते हैं-नखक्षतादि दुश्चेष्टित को संसूचन अर्थात् अङ्गुलि आदि से निर्देश करके। ताड़न किया जाता ही है-। न कि सखी आदि का किया हुआ अनुनय (कि इसे छोड़ दो, अब ऐसा अपराध नहीं करेगा आदि) मानती है, क्यों कि वह हंसी को निमित्त करके (अपना दुश्चेष्टित) छिपा रहा है, और प्रियतम है, उसके व्यलीक को कौन सहन करने के लिए समर्थ है ? निर्वाह के०-। अर्थात् पूर्ण रूप से परिसमाप्त करने के लिए।