ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः लङ्कारवर्गश्च रूपकादिर्यावानुक्तो वक्ष्यते च कैश्चित् , अलङ्काराणा- मनन्तत्वात् । स सर्वोऽपि यदि समीक्ष्य विनिवेश्यते तदलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेरङ्गिनः सर्वस्यैव चारुत्वहेतुर्निष्पद्यते ॥ १७ ॥ एषा चास्य विनिवेशने समीक्षा— विवक्षा तत्परत्वेन नाङ्गित्त्वेन कदाचन । जाता है, वाच्यालङ्कारों (अर्थालङ्कारों) का वर्ग रूपक आदि जितना कहा गया है और कुछ लोग कहेंगे, क्योंकि अलङ्कार अनन्त हैं । वह सभी को यदि समीक्षा करके विनिवेशित किया जाय तो सभी अङ्गी अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि का चारुत्वहेतु ( शोभाधायक ) होंगे ॥ १७ ॥ उसके विनिवेशन में यह समीक्षा है— रूपक आदि की विवक्षा तत्परत्वेन (अर्थात् रसपरत्वेन) हो, कभी अङ्गो (प्रधान) लोचनम् अलङ्काराणामनन्तत्वादिति । प्रतिभानन्त्यात् अन्यैरपि भाविभिः कैश्चिदित्यर्थः ॥ समीक्ष्येति । समीक्ष्येत्यनेन शब्देन कारिकायामुक्तेति भावः । श्लोकपादेषु चतुर्षु श्लोकार्थे चाङ्गत्त्वसाधनमिदम्; रूपकादिरिति प्रत्येकं सम्बन्धः । यमल- ङ्कारं तदङ्गतया विवक्षति नाङ्गित्त्वेन, यमवसरे गृह्णाति, यमवसरे त्यजति, यं नात्यन्तं निर्वोढुमिच्छति, यं यत्नादङ्गत्वेन प्रत्यवेक्षते, स एवमुपनिबध्यमानो रसाभिव्यक्तिहेतुर्भवतीति विततं महावाक्यम् । तन्महावाक्यमध्ये चोदाहरणा- वकाशमुदाहरणस्वरूपं तद्योजनं तत्समर्थनं च निरूपयितुं ग्रन्थन्तरमिति वृत्ति- ग्रन्थस्य सम्बन्धः ॥ १७ ॥ कहेंगे' इसमें हेतु बताते हैं—क्यों कि अलङ्कार अनन्त होते हैं—। अर्थात् प्रतिभा के अनन्त होने के कारण अन्य उत्पन्न होने वाले कुछ लोग । समीक्ष्य—। भाव यह कि 'समीक्षा करने' ( 'समीक्ष्य' ) इस शब्द से कारिका में कही गई। श्लोक के चारों पादों में और श्लोकार्थ में यह अङ्गत्व का साधन ( निर्दिष्ट ) है; 'रूपक आदि' का प्रत्येक से सम्बन्ध है। विस्तृत महावाक्य यह हुआ कि जिस अलङ्कार को उसके ( रस के ) अङ्ग के रूप से विवक्षा करता है, अङ्गी के रूप से नहीं, जिसको अवसर में ग्रहण करता है, जिसको अवसर में त्याग करता है, जिसे अत्यन्त निर्वाह करने की इच्छा नहीं करता और जिसे यत्नपूर्वक अङ्ग रूप से देखता है, वह इस प्रकार उपनिबध्यमान होकर रस की अभिव्यक्ति का हेतु होता है । उस महावाक्य के बीच में उदाहरणों के अवकाश का, उनके स्वरूप का, उनकी सङ्गति का और उनके समर्थन का निरूपण करने के लिए शेष ग्रन्थ है, यह वृत्तिग्रन्थ का सम्बन्ध है ॥ १७ ॥