भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 680 में से

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पृष्ठ 279

द्वितीय उद्योतः २१९ ध्वन्यालोकः विप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोस्तु माधुर्यमेव प्रकर्षवत् । सहृदयहृदया- वर्जनातिशयनिमित्तत्वादिति ॥ ८ ॥ रौद्रादयो रसा दीप्त्या लक्ष्यन्ते काव्यवर्तिनः । तद्व्यक्तिहेतू शब्दार्थावाश्रित्यौजो व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥ रौद्रादयो हि रसाः परां दीप्तिमुज्ज्वलतां जनयन्तीति लक्षणया विप्रलम्भ शृङ्गार और करुण में माधुर्य ही प्रकर्षयुक्त होता है, क्योंकि ( वह माधुर्य ) सहृदय के हृदय को खींचने का अतिशय ( उत्कृष्ट ) निमित्त है ॥ ८ ॥ काव्य में रहनेवाले रौद्र आदि रस दीप्ति के कारण लक्षित होते हैं, उस दीप्ति के व्यञ्जक शब्द और अर्थ को आश्रयण करके ओजस् गुण व्यवस्थित है ॥ ९ ॥ रौद्र आदि रस अत्यन्त दीप्ति या उज्ज्वलता को उत्पन्न करते हैं, इसलिए लोचनम् शृङ्गार इत्यादि । करुणे चेति चशब्दः क्रममाह । प्रकर्षवदिति । उत्तरोत्तरं तरतमयोगेनेति भावः । आर्द्रतामिति । सहृदयस्य चेतः स्वाभाविकमनाविष्ट- त्वात्मकं काठिन्यं क्रोधादिदीप्तरूपत्वं विस्मयहासादिरागित्वं च त्यजतीत्यर्थः । अधिकमिति । क्रमेणेत्याशयः । तेन करुणेऽपि सर्वथैव चित्तं द्रवतीत्युक्तं भवति । ननु करुणेऽपि यदि मधुरिमास्ति, तर्हि पूर्वकारिकायां शृङ्गार एवे- त्येवकारः किमर्थः । उच्यते—नानेन रसान्तरं व्यवच्छिद्यते; अपि त्वात्म- भूतस्य रसस्यैव परमार्थतो गुणा माधुर्यादयः, उपचारेण तु शब्दार्थयोरित्येव- कारेण द्योत्यते । वृत्त्यार्थमाह—विप्रलम्भेति ॥ ८ ॥ रौद्रेत्यादि । आदिशब्दः प्रकारे । तेन वीराद्भुतयोरपि ग्रहणम् । दीप्तिः है, इस अभिप्राय से कहते हैं—विप्रलम्भ शृङ्गार०—इत्यादि । और करुण में यहाँ 'और' शब्द क्रम को बताता है । प्रकर्षयुक्त--। भाव यह कि उत्तरोत्तर ज्यादा और ज्यादातर के होने से । आर्द्रभाव--। अर्थात् सहृदय का चित्त स्वाभाविक अनावेश- युक्तता रूप काठिन्य को, क्रोध आदि के कारण दीप्तरूपता को और विस्मय और हास के कारण विक्षेप की स्थिति को छोड़ देता है । अधिक--। 'क्रम से' यह आशय है । इससे यह कहा गया कि करुण में भी सर्वथा ही चित्त पिघल पड़ता है । ( शङ्का करते हैं कि ) यदि करुण में भी मधुरिमा है, तो पहली कारिका में 'शृङ्गार ही' यह 'एव' ( 'ही' ) का प्रयोग किस लिए ? उत्तर में कहते हैं—इस 'एव' के प्रयोग से दूसरे रस का व्यवच्छेद या निराकरण नहीं किया गया है, बल्कि 'एव'कार से द्योतित होता है कि 'माधुर्य' आदि परमार्थ रूप से आत्मभूत रस के ही गुण हैं, केवल उपचार ( आरोप ) से शब्द और अर्थ के भी गुण हो जाते हैं । वृत्ति से अर्थ कहते हैं— विप्रलम्भ० ॥ ८ ॥ रौद्र०—इत्यादि । 'आदि' शब्द 'प्रकार' ( सादृश्य ) के अर्थ में है । इससे वीर