ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शृङ्गार एव रसान्तरापेक्षया मधुरः प्रह्लादहेतुत्वात् । तत्प्रकाशन- परशब्दार्थतया काव्यस्य स माधुर्यलक्षणो गुणः । श्रव्यत्वं पुनरोज- सोऽपि साधारणमिति ॥ ७ ॥ शृङ्गारे विप्रलम्भाख्ये करुणे च प्रकर्षवत् । माधुर्यमार्द्रतां याति यतस्तत्राधिकं मनः ॥ ८ ॥ शृङ्गार ही दूसरे रसों की अपेक्षा आह्लादक होने के कारण मधुर है । शब्द और अर्थ शृङ्गाररस के प्रकाशन में तत्पर होते हैं अतः (शब्दार्थमय) काव्य का वह 'माधुर्य' रूप गुण है । श्रव्यत्व ओजस् का भी साधारण लक्षण है ॥ ७ ॥ विप्रलम्भ नाम के शृङ्गार में और करुण में माधुर्य प्रकर्षयुक्त होता है, क्योंकि वहाँ मन अधिक आर्द्रभाव प्राप्त करता है ॥ ८ ॥ लोचनम् शब्दार्थावित्यर्थः । प्रतितिष्ठतीति । प्रतिष्ठां गच्छतीति यावत् । एतदुक्तं भवति—वस्तुतो माधुर्यं नाम शृङ्गारादे रसस्यैव गुणः । तन्मधुररसाभिव्यञ्ज- कयोः शब्दार्थयोरुपचरितं मधुरशृङ्गाररसाभिव्यक्तिसामर्थ्यता शब्दार्थयोर्माधुर्य- मिति हि लक्षणम् । तस्माद्युक्तमुक्तं 'तमर्थमि'त्यादि । कारिकार्थं वृत्त्याह— शृङ्गार इति । ननु 'श्रव्यं नातिसमस्तार्थशब्दं मधुरमिष्यते' इति माधुर्यस्य लक्षणम् । नेत्याह—श्रव्यत्वमिति । सर्वं लक्षणमुपलक्षितम् । ओजसोऽपीति । 'यो यः शस्त्रम्' इत्यत्र हि श्रव्यत्वमसमस्तत्वं चास्त्येवेति भावः ॥ ७ ॥ सम्भोगशृङ्गारान्मधुरतरो विप्रलम्भः, ततोऽपि मधुरतमः करुण इति तदभिव्यञ्जनकौशलं शब्दार्थयोर्मधुरतरत्वं मधुरतमत्वं चेत्यभिप्रायेणाह— रूप से जहाँ हो रहा हो । काव्य अर्थात् शब्द और अर्थ । प्रतिष्ठित होता है—प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है । बात यह कही गई—वास्तव में 'माधुर्य' शृङ्गार आदि रस का ही गुण है । वह (माधुर्य) मधुररस के अभिव्यञ्जक शब्द और अर्थ में उपचरित (आरोपित) होता है, फलतः 'शब्द और अर्थ की जो मधुर शृङ्गाररस की अभि- व्यक्ति की सामर्थ्य है, वही माधुर्य है' यह लक्षण है । इसलिए ठीक कहा है 'उस अर्थ को०' इत्यादि । कारिका के अर्थ को वृत्ति से कहते हैं—शृङ्गार—। शङ्का— जैसा कि (भामह ने) 'माधुर्य' का लक्षण किया है 'श्रवणीय और जिसमें शब्द अधिक समासयुक्त अर्थ वाले न हों, वह मधुर' कहलाता है'; यह 'नहीं' यह कहते हैं— श्रव्यत्व—। (इतने से 'मधुर' का) पूरा लक्षण उपलक्षित कर लिया है । ओजस् का भी—। भाव यह है कि 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति०' इस (ओजस् के) स्थल में श्रव्यत्व और असमस्तत्व दोनों ही हैं ॥ ७ ॥ सम्भोग शृङ्गार से मधुरतर विप्रलम्भ शृङ्गार है, उससे भी मधुरतम करुण है, उस रस के अभिव्यञ्जन का कौशल शब्द-अर्थ का मधुरतरत्व और दूसरे का मधुरतमत्व