भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

द्वितीय उद्योतः २१७ ध्वन्यालोकः वत्। वाच्यवाचकलक्षणान्यङ्गानि ये पुनस्तदाश्रितास्तेऽलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ ६ ॥ तथा च— शृङ्गार एव मधुरः परः प्रह्लादनो रसः। तन्मयं काव्यमाश्रित्य माधुर्यं प्रतितिष्ठति ॥ ७ ॥ ‘गुण’ हैं। और जो वाच्य-वाचक रूप अङ्गों पर आश्रित होते हैं, वे कटक आदि की भाँति ‘अलङ्कार’ माने जाने चाहिए। और उस प्रकार—शृङ्गार ही मधुर एवं परम आह्लादकारी रस है, तन्मय (शृङ्गारमय) काव्य को आश्रयण करके 'माधुर्य' प्रतिष्ठित होता है ॥ ७ ॥ लोचनम् योज्या। केवलं प्रथमाभिप्राये प्रथमं कारिकार्धं दृष्टान्ताभिप्रायेण व्याख्येयम्। एवं वृत्तिग्रन्थोऽपि योज्यः ॥ ६ ॥ ननु शब्दार्थयोर्माधुर्यादयो गुणाः, तत्कथमुक्तं रसादिकमङ्गिनं गुणा आश्रिता इत्याशङ्क्याह—तथा चेत्यादि। तेन वक्ष्यमाणेन बुद्धिस्थेन परिहार- प्रकारेणोपपद्यते चैतदित्यर्थः। शृङ्गार एवेति। मधुर इत्यत्र हेतुमाह—परः प्रह्लादन इति। रतौ हि समस्तदेवतिर्यङ्नरादिजातिष्वविच्छिन्नैव वासनास्त इति न कश्चित्तत्र तादृग्यो न हृदयसंवादमयः, यतेरपि हि तच्चमत्कारोऽस्त्येव। अत एव मधुर इत्युक्तम्। मधुरो हि शर्करादिरसो विवेकिनोऽविवेकिनो वा स्वस्थस्यातुरस्य वा झटिति रसनानिपतितस्तावदभिलषणीय एव भवति। तन्मयमिति। स शृङ्गार आत्मत्वेन प्रकृतो यत्र व्यङ्ग्यतया। काव्यमिति कारिकार्ध भाग को दृष्टान्त के अभिप्राय से व्याख्या करनी चाहिए। इसी प्रकार वृत्तिग्रन्थ को भी लगाना चाहिए ॥ ६ ॥ जब कि माधुर्य आदि गुण शब्द और अर्थ दोनों के हैं, तब कैसे कहा कि अङ्गी रसादि पर गुण आश्रित होते हैं ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और उस प्रकार—। अर्थात् अभी जो बुद्धि में स्थित परिहार का प्रकार कहने वाले हैं, उससे यह उपपन्न हो जायगा। शृङ्गार ही—। 'मधुर' होने का कारण कहते हैं—परम आह्लादकारी—। क्योंकि रति ( शृङ्गार रस का स्थायी भाव) के सम्बन्ध में सारे देवता, पक्षी, मनुष्य आदि जातियों में वासना अविच्छिन्न रूप से विद्यमान रहती है; इस प्रकार कोई वैसा नहीं जो हृदयसंवाद धारण नहीं करता, क्योंकि यति (साधु-संन्यासी) को भी उस (रति) में चमत्कार (हृदयसंवाद) होता ही है। इसीलिए 'मधुर' यह कहा है। शक्कर आदि का मधुर रस विवेकी अथवा अविवेकी, स्वस्थ और रोगी की जीभ पर पड़ते ही अभिलषणीय हो जाता है। तन्मय—। वह 'शृङ्गार' व्यंग्य होने से आत्मा