भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

२१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः किञ्च— तमर्थमवलम्बन्ते येऽङ्गिनं ते गुणाः स्मृताः । अङ्गाश्रितास्त्वलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ ६ ॥ ये तमर्थं रसादिलक्षणमङ्गिनं सन्तमवलम्बन्ते ते गुणाः शौर्यादि- और भी, जो उस अङ्गीरूप अर्थ को अवलम्बन करते हैं, वह 'गुण' कहलाते हैं और कटक आदि की भाँति अङ्गों पर आश्रित रहनेवालों को 'अलङ्कार' मानना चाहिए। जो रसादि रूप उस अङ्गी अर्थ को अवलम्बन करते हैं शौर्य आदि की भाँति वे लोचनम् स्तम्भपुलकाद्यचेतनमपि वर्ण्यमानमनुभावत्वाच्चेतनमाक्षिप्रत्येव तावत्, किमत्रोच्यते । अतिजडोऽपि चन्द्रोद्यानप्रभृतिः स्वविश्रान्तोऽपि वर्ण्यमानोऽ- वश्यं चित्तवृत्तिविभावतां त्यक्त्वा काव्येऽनाख्येय एव स्यात्; शास्त्रेतिहासयो- रपि वा । एवं परमतं दूषयित्वा स्वमतमेव प्रत्याम्नायेनोपसंहरति—तस्मा- दिति । यतः परोक्तो विषयविभागो न युक्त इत्यर्थः । भावो वेति वाग्रहणात्तदा- भासतत्प्रशमादयः । सर्वाकारमिति क्रियाविशेषणम् । तेन सर्वप्रकारमित्यर्थः । अलङ्कार्य इति । अत एव नालङ्कार इति भावः ॥ ५ ॥ अलङ्कार्यव्यतिरिक्तश्चालङ्कारोऽभ्युपगन्तव्यः, लोके तथा सिद्धत्वात्, यथा गुणिद्व्यतिरिक्तो गुणः । गुणालङ्कारव्यवहारश्च गुणिन्यलङ्कार्ये च सति युक्तः । स चास्मत्पक्ष एवोपपन्न इत्यभिप्रायद्वयेनाह—किञ्चेत्यादि । न केवलमेतावद्- युक्तिजातं रसस्याङ्गित्त्वे, यावदन्यदपीति समुच्चयार्थः । कारिकाप्यभिप्रायद्वयेनैव होने के कारण चेतन का आक्षेप कर लेंगे, ऐसी स्थिति में आप क्या उत्तर देंगे ? चन्द्र, उद्यान प्रभृति अत्यन्त जड़ होकर एवं अपने आप में पर्यवसित होकर भी चित्तवृत्ति के विभाव ( उद्दीपक विभाव ) के वैशिष्ट्य को छोड़ कर काव्य में कहने योग्य नहीं ही होगा, शास्त्र और इतिहास में भी यही स्थिति है। इस प्रकार परमत में दोष देकर स्वमत का ही पुनरुक्ति द्वारा उपसंहार करते हैं—इसलिए—। अर्थात् जो कि दूसरे लोगों ने विषय-विभाग किया है, वह ठीक नहीं। अथवा भाव 'अथवा' के ग्रहण से भावाभास, भावप्रशम आदि संगृहीत हैं। 'सर्वाकार' ( सब प्रकार ) यह क्रिया विशेषण है। अर्थात् सब प्रकार । अलङ्कार्य—। भाव यह कि अलङ्कार नहीं ॥ ५ ॥ अलङ्कार को अलङ्कार्य से पृथक् मानना चाहिए, क्योंकि लोक में उस प्रकार सिद्ध है, जैसे गुणी से पृथक् गुण को माना जाता है। गुण और अलङ्कार का व्यवहार भी गुणी अलङ्कार्य के रहने पर ही ठीक है। और वह ( बात ) हमारे पक्ष में ही उपपन्न होती है, इन दोनों अभिप्रायों से कहते हैं—और भी—। ये ही युक्तियां केवल रस के अङ्गी होने में ही नहीं; बल्कि और दूसरी भी सम्भव है; यह समुच्चयार्थ है। कारिका को भी इन दोनों अभिप्रायों से लगाना चाहिए। केवल पहले अभिप्राय में प्रथम