ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २१५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः इत्येवमादौ विषयेऽचेतनानां वाक्यार्थीभावेऽपि चेतनवस्तुवृत्ता- न्तयोजनास्त्येव । अथ यत्र चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनास्ति तत्र रसादि- रलंकारः । तदेवं सत्युपमादयो निर्विषयाः प्रविरलविषया वा स्युः । यस्मान्नास्त्येवासावचेतनवस्तुवृत्तान्तो यत्र चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजना नास्त्यन्ततो विभावत्वेन । तस्मादङ्गत्वेन च रसादीनामलङ्कारता । यः पुनरङ्गी रसो भावो वा सर्वाकारमलङ्कार्यः स ध्वनेरात्मेति ॥ ५ ॥ इत्यादि प्रकार के विषय में अचेतन पदार्थों के वाक्यार्थ (प्रधान) होने पर भी चेतन वस्तु या पदार्थ की योजना है ही। और जहाँ चेतन वस्तु के वृत्तान्त की योजना है वहाँ रसादि अलङ्कार है । ऐसी स्थिति में उपमा आदि अलङ्कारों का कहीं कोई विषय न रह जायगा, अथवा वे कहीं-कहीं पर ही होंगे (सर्वत्र नहीं) । क्योंकि कोई ऐसा अचेतन वस्तु का वृत्तान्त नहीं ही है जहाँ चेतन वस्तु के वृत्तान्त की योजना नहीं है, अन्ततः विभाव रूप में (उसकी योजना बन ही जायगी) । इस लिए अङ्ग होने के कारण रसादि का अलङ्कारत्व माना गया है। जो फिर अङ्गीरस अथवा भाव है, वह सब प्रकार अलङ्कार्य एवं 'ध्वनि' का आत्मा है ॥ ५ ॥ लोचनम् इति । वाक्यार्थस्यात्र कर्मत्वम् । अधुना जरठीभवन्तीति । मयि तु सन्निहितेऽन- वरतकथितोपयोगान्नेमे जराजीर्णताखिलीकारं कदाचिदवाप्नुवन्तीति भावः । विगलन्ती नीला त्विड्येषामित्यनेन कतिपयकालप्रोषितस्याप्यौत्सुक्यनिर्भरत्वं ध्वनितम् । एवमात्मगतेयमुक्तिर्यदि वा गोपं प्रत्येव संप्रधारणोक्तिः । बहुभिरु- दाहरणैर्महतो भूयसः प्रबन्धस्येति यदुक्तं तत्सूचितम् । अथेत्यादि । नीरसत्व- मत्र मा भूदित्यभिप्रायेणेति शेषः । ननु यत्र चेतनवृत्तस्य सर्वथा नानुप्रवेशः स उपमादेर्विषयो भविष्यतीत्याशङ्कयाह-यस्मादित्यादि । अन्तत इति । गोपियों के) परस्पर अनुराग के निश्चय से गर्भित इस प्रकार कहते हैं—वे मैं जानता हूँ—यहाँ वाक्यार्थ का कर्मत्व है। अब झूर हो गए होंगे—। भाव यह कि मेरे सन्निहित रहने पर निरन्तर कहे हुए (तोड़ने के पूर्वोक्त) उपयोग के कारण कभी भी ये पल्लव जर्जर होने से जीर्ण हो जाने की विद्रूपता को कभी भी प्राप्त नहीं करते हैं। विगलित या अपक्रान्त हो रही है नील कान्ति जिनकी, इससे कुछ ही समय से प्रोषित (बाहर गए) उन भगवान् का अतिशय औत्सुक्य ध्वनित होता है । इस प्रकार यह उक्ति अपने प्रति अथवा गोप के प्रति सम्प्रधारणोक्ति है। बहुत उदाहरणों से कि 'महान् या भूयान् प्रबन्ध का' यह कहा है, उसे सूचित किया है । और—इत्यादि । इस अभिप्राय से, कि यहाँ नीरसत्व न हो । यह आशङ्का करके कि जहाँ चेतन-वृत्तान्त का सर्वथा अनुप्रवेश नहीं वह उपमा आदि का विषय होगा, कहते हैं—क्योंकि— इत्यादि । अन्ततः—। जब कि अचेतन भी वर्ण्यभाव स्तम्भ, पुलक आदि अनुभाव के