ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा— तेषां गोपवधूविलाससुहृदां राधारहःसाक्षिणां क्षेमं भद्र कलिन्दशैलतनयातीरे लतावेश्मनाम् । विच्छिन्ने स्मरतल्पकल्पनमृदुच्छेदोपयोगेऽधुना ते जाने जरठीभवन्ति विगलन्नीलत्विषः पल्लवाः ॥ अथवा, जैसे— हे भद्र, गोपियों के विलास-सुहृद् और राधा के एकान्त के साक्षी उन यमुना-तट के लतागृहों का कल्याण तो है ! अथवा, अब तो काम-शय्या के निर्माण के लिए कोमल किसलयों के तोड़ने का प्रयोजन न रहने के कारण वे पल्लव श्यामल कान्ति से रहित होकर झर हो जाते होंगे । लोचनम् तेषामिति । हे भद्र ! तेषामिति ये ममैव हृदये स्थितास्तेषाम् । गोपवधूनां गोपीनां ये विलाससुहृदो नर्मसचिवास्तेषाम् । प्रच्छन्नानुरागिणीनां हि नान्यो नर्मसुहृद्भवति । राधायाश्च सातिशयं प्रेमस्थानमित्याह—राधासम्भोगानां ये साक्षाद् द्रष्टारः, कलिन्दशैलतनया यमुना तस्यास्तीरे लतागृहाणां क्षेमं कुशल- मिति काका प्रश्नः । एवं तं पृष्ट्वा गोपदर्शनप्रबुद्धसंस्कार आलम्बनोद्दीपनविभा- वस्मरणात्प्रबुद्धरतिभावमात्मगतमौत्सुक्यगर्भमाह द्वारकागतो भगवान् कृष्णः— स्मरतल्पस्य मदनशय्यायाः कल्पनार्थं मृदु सुकुमारं कृत्वा यश्छेदस्त्रोटनं स एवोपयोगः साफल्यम् । अथ च स्मरतल्पे यत्कल्पनं कॢप्तिः स एव मृदुः सुकुमार उत्कृष्टश्छेदोपयोगस्त्रोटनफलं तस्मिन्र्विच्छिन्ने । मय्यनासीने का स्मरतल्पकल्पनेति भावः । अत एव परस्परानुरागनिश्चयगर्भमेवाह—ते जान हे भद्र—। उन (लतागृहों) का जो मेरे ही हृदय में स्थित हैं, उनका। गोप- बन्धुओं अर्थात् गोपियों के जो विलास-सुहृद् अर्थात् नर्मसचिव, उनका । प्रच्छन्न (लुक-छिप कर) अनुराग करने वालियों का नर्मसुहृद कोई दूसरा नहीं होता । राधा का प्रेम बढ़कर है, अतः कहते हैं—राधा के सम्भोगों को जो साक्षात् देखने वाले हैं, कलिन्दशैलतनया अर्थात् यमुना, उसके तीर पर लतागृहों का क्षेम या कुशल है, यह काकु द्वारा प्रश्न है। इस प्रकार उस (उद्धव) से पूछ कर द्वारका में पहुंचे एवं गोपों के देखने से प्रबुद्ध संस्कारवाले भगवान् कृष्ण ने आलम्बन और उद्दीपन विभाव के स्मरण से अपने में उत्पन्न औत्सुक्य से युक्त प्रबुद्ध रतिभाव को प्रकट करते हैं—स्मरतल्प अर्थात् मदनशय्या का जो कल्पन या निर्माण वही है मृदु या सुकुमार अर्थात् उत्कृष्ट छेदोपयोग अर्थात् तोड़ना रूप फल, उसके विच्छिन्न होने पर । भाव यह कि मेरे न रहते स्मरतल्प का निर्माण कैसा ? अतएव (अपने और