ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः २१३ ध्वन्यालोकः यथा वा— तन्वी मेघजलार्द्रपल्लवतया धौताधरेवाश्रुभिः शून्येवाभरणैः स्वकालविरहाद्विश्रान्तपुष्पोद्गमा । चिन्ता मौनमिवाश्रिता मधुकृतां शब्दैर्विना लक्ष्यते चण्डी मामवधूय पादपतितं जातानुतापेव सा ॥ अथवा जैसे— कोपनशीला वह तन्वी (उर्वशी) पैरों पर गिरे हुए मुझे झटककर मानों उत्पन्न पश्चात्ताप के मारे मेघ के जल से गीले पल्लव के रूप में आँसुओं से धुले अधरवाली, अपने समय के विगत हो जाने पर फूलों का खिलना बन्द हो जाने के रूप में अपने आभरणों से शून्य की भाँति और भौरों के शब्दों के अभाव के रूप में चिन्ता के कारण मौनभाव को प्राप्त-जैसी (लता के समान) प्रतीत होती है। लोचनम् यन्ती । वसनमंशुकम् । प्रियतमावलम्बननिषेधायेति भावः । बहुशो यत्स्खलितं येऽपराधास्तानभिसन्धाय हृदयैनैकीकृत्यासहमाना मानिनीत्यर्थः । अथ च मद्वियोगपश्चात्तापासहिष्णुस्तापशान्तये नदीभावं गतेति । तन्वीति । वियोगकृशाप्यनुतप्ता चाभरणानि त्यजति । स्वकालो वसन्त- ग्रीष्मप्रायः । उपायचिन्तनार्थं मौनं, किमिति पादपतितमपि दयितमवधूतव- त्यहमिति च चिन्तया मौनम् । चण्डी कोपना । एतौ श्लोकौ नदीलतावर्णनपरौ तात्पर्येण पुरूरवस उन्मादाक्रान्तस्योक्तिरूपौ । पूर्वक धारण करती हुई । वसन अर्थात् अंशुक । प्रियतम के अवलम्बन के निषेध के लिए, यह भाव है । अर्थात् बहुत बार के जो स्खलित हैं, जो अपराध हैं, उन्हें अभिसन्धान करके—हृदय के साथ एक करके सहन न करती हुई मानिनी । और भी, यह कि मेरे वियोगजन्य पश्चात्ताप को न सहन कर पा रही वह ताप की शान्ति के लिए नदी के स्वरूप को प्राप्त हुई । तन्वी—। वियोग से कृश होने के कारण भी और पश्चात्ताप से पीड़ित होने के कारण, आभरणों को छोड़ देती है । अपना समय (स्वकाल) अर्थात् प्रायः वसन्त और ग्रीष्म । उपाय ढूँढ़ने की चिन्ता के लिए मौन, क्योंकर मैंने पैरों पर गिरे प्रिय को झटक दिया (तिरस्कृत किया), इस चिन्ता से मौन । चण्डी अर्थात् कोपना (कोपशीला) । ये दोनों नदी और लता के वर्णन के श्लोक तात्पर्य रूप से उन्माद से आक्रान्त पुरूरवस् की उक्तिरूप हैं ।