ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यन्त इति ओदनं पचतीतिवद् व्यवहारः, प्रतीयमान एव हि रसः। प्रतीतिरेव विशिष्टा रसना। सा च नाट्ये लौकिकानुमानप्रतीतेर्विलक्षणा; तां च प्रमुखे उपायतया सन्दधाना। एवं काव्ये अन्यशाब्दप्रतीतेर्विलक्षणा, तां च प्रमुखे उपायतयापेक्षमाणा। तस्मादनुत्थानोपहतः पूर्वपक्षः। रामादिचरितं तु न सर्वस्य हृदयसंवादीति महत्साहसम्। चित्रवासनाविशिष्टत्वाच्चेतसः। यदाह—'तासामनादित्व- माशिषो नित्यत्वात्। जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयो- रेकरूपत्वात्' इति। तेन प्रतीतिस्तावद्रसस्य सिद्धा। सा च रसनारूपा पचाता है) के समान व्यवहार है, क्योंकि रस प्रतीयमान ही होता है, विशिष्ट प्रतीति ही 'रसना' है। वह नाट्य में लौकिक अनुमानजन्य प्रतीति से विलक्षण प्रतीति है। उस (लौकिक अनुमानजन्य प्रतीति) को (वह प्रतीति) पहले अपने उपाय के रूप में अपेक्षा करती है। इस प्रकार काव्य में अन्य (लौकिक-वैदिक) शब्दजन्य प्रतीति से विलक्षण प्रतीति है, उस (शब्दप्रतीति) को पहले में उपायरूप से अपेक्षा करती है। इस लिए पूर्वपक्ष¹ न उत्थित होने के कारण उपहत हो गया। यह कहना बड़े साहस की बात है कि राम आदि का चरित सबका हृदयसंवादी नहीं है, क्योंकि चित्त नानाविध वासना से विशिष्ट होता है। जैसा कि (योगसूत्रकार कहते हैं)—'वे² (वासनाएँ) अनादि होती हैं क्योंकि आशिष या संकल्प विशेष (कि हमें सुख मिलता रहे कभी सुख के साधनों से वियोग न हो) नित्य होते हैं।' 'अतः जाति, देश और काल के व्यवधान होने पर भी (वासनाओं का) आनन्तर्य (क्रम) बना रहता है क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनों एकरूप होते हैं।' उस कारण रस की प्रतीति सिद्ध
१. जैसा कि भट्टनायक ने कहा है कि रस प्रतीत नहीं होता है, यह बात निर्मूल हो जाती है। क्योंकि रस की प्रतीति को सभी ने अपने-अपने ढंग से स्वीकार किया है। जब वह प्रतीत नहीं होता है तो भट्टनायक उसे व्यवहार कैसे करेंगे ? जिस प्रकार उपाय की विलक्षणता से विभिन्न प्रतीतियाँ होती हैं उसी प्रकार यह भी एक विलक्षण प्रतीति है। इस प्रतीति की चर्वणा आदि अनेक संज्ञाएं हैं। इसकी उपायसामग्री विभावादि हैं। 'रस की प्रतीति' यह उसी प्रकार का प्रयोग है जैसे 'भात को पकाता है' यह व्यवहार है; भात तो पका हुआ ही होता है, फिर भी ऐसा प्रयोग सुना जाता है। रस प्रतीयमान ही होता है, अतः रस की प्रतीति रस से भिन्न नहीं है। नाट्य के क्षेत्र में वह प्रतीति लौकिक अनुमान की प्रतीति से विलक्षण होती है, किन्तु उस लौकिक अनुमान-प्रतीति को वह अपना उपाय बनाती है और काव्य के क्षेत्र में वह प्रतीति अन्य शाब्द प्रतीति से विलक्षण होती है और उस शब्द प्रतीति को अपना उपाय बनाती है। २. मानव-चित्त में अनन्तानन्त संस्कार वासना के रूप में जन्मजन्मान्तर से एकत्र होते हैं। किन्तु जब उनकी अभिव्यञ्जक सामग्री एकत्र होती है तभी वे प्रकट होते हैं। इस प्रकार वासना को अनादि माना गया है ! वासना रूप संस्कार, जो चित्त में विद्यमान होते हैं, अपनी अभिव्यञ्जक सामग्री के प्रत्यक्ष होते ही स्मृत हो उठते हैं। अनादि-अनन्त संस्कारों का आदि मूल है प्राणी के मन की सुखेच्छा। वही उसे कार्य के लिए प्रवृत्त करती है और वह कर्म द्वारा अनुभवों को संस्कार के रूप में अपने चित्त में आहित करता है। इस प्रकार आचार्य भट्टनायक ने उठाई है,