भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 257

द्वितीय उद्योतः १९७

लोचनम्

अन्ये तत्संयोगम्, एकेऽनुकार्यम्, केचन सकलमेव समुदायं रसमाहुरित्यलं बहुना । काव्येऽपि च लोकनाट्यधर्मिस्थानीयेन स्वभावोक्तिवक्रोक्तिप्रकारद्वयेना- लौकिकप्रसन्नमधुरौजस्विशब्दसमर्प्यमाणविभावादियोगादियमेव रसवार्ता । अस्तु वात्र नाट्याद्विचित्ररूपा रसप्रतीतिः; उपायवैलक्षण्यादियमेव तावदत्र सरणिः । एवं स्थिते प्रथमपक्ष एवैतानि दूषणानि, प्रतीतेः स्वपरगतत्वादिवि- कल्पनेन । सर्वपक्षेषु च प्रतीतिरपरिहार्या रसस्य । अप्रतीतं हि पिशाचवद्व्य- वहार्यं स्यात् । किं तु यथा प्रतीतिमात्रत्वेनाविशिष्टत्वेऽपि प्रात्यक्षिकी आनुमा- निकी आगमोत्था प्रतिभानकृता योगिप्रत्यक्षजा च प्रतीतिरूपायवैलक्षण्यादन्यैव, तद्वदियमपि प्रतीतिश्चर्वणास्वादनभोगापरनामा भवतु । तन्निदानभूताया हृदयसंवादाद्युपकृताया विभावादिसामग्र्या लोकोत्तररूपत्वात् । रसाः प्रती- मात्र को, इतर लोग व्यभिचारी को, दूसरे लोग इनके संयोग को, कुछ लोग अनुकार्य को और कुछ लोग समुदाय रूप समस्त को 'रस' कहते हैं । अलं बहुना । 'काव्य में भी लोकधर्मी और नाट्यधर्मी के समान, ( क्रम से ) स्वभावोक्ति और वक्रोक्ति इन दोनों प्रकारों से अलौकिक, प्रसन्न, मधुर और ओजस्वी शब्द से समर्प्यमाण विभावादि के योग से इसी प्रकार रस की वार्ता ( प्रतीति ) है । यहाँ ( काव्य में ) नाट्य से रस की प्रतीति विचित्र२ है, तथापि उपाय के विलक्षण होने के कारण यही यहाँ भी प्रकार है। इस प्रकार स्थित होने पर, पहले पक्ष में ही ये दोष हैं, क्योंकि प्रतीति स्वगत होती है या परगत होती है यह विकल्प करते हैं। सभी पक्षों में रस की प्रतीति का निराकरण नहीं है । क्योंकि अप्रतीत वस्तु पिशाच की भाँति, व्यवहार में नहीं आती । किन्तु जिस प्रकार प्रतीति मात्र होने से अवशिष्ट ( समान ) होने पर भी प्रात्यक्षिकी, आनुमानिकी, आगमोत्था, प्रतिभानकृता, योगिप्रत्यक्षजा ये प्रतीतियाँ उपाय के विलक्षण होने से पृथक्-पृथक् हो जाती हैं, उसी प्रकार यह भी प्रतीति, जिसके नाम चर्वणा, आस्वादन, भोग आदि हैं, ( अन्य प्रतीतियों से विलक्षण ) है। क्योंकि इस प्रतीति का निदानभूत जो हृदयसंवाद आदि से उपकृत, विभावादि सामग्री है, वह लोकोत्तर है । 'रस प्रतीत होते हैं' यह 'ओदनं पचति' ( भात को


१. नाट्य दो प्रकार के होते हैं- लोकधर्मी और नाट्यधर्मी। जिसमें अभिनय स्वाभाविक होता है, अर्थात् पुरुष का अभिनय पुरुष करता है और स्त्री का अभिनय स्त्री, वह लोकधर्मी नाट्य है। और जिसमें स्वर, अलंकार और स्त्री-पुरुषादि अपने वेष का परिवर्तन करते हैं वह नाट्यधर्मी नाट्य है। २. दृश्यकाव्य रूप नाट्य में जो रस की प्रतीति का प्रकार है उससे विचित्र प्रकार श्रव्यकाव्य में है। श्रव्यकाव्य में विभावादि उपाय दृष्टिगोचर नहीं होते हैं, अपितु शब्द के द्वारा समर्पित होते हैं। इस प्रकार केवल विभावादि के उपस्थापन को लेकर दोनों का भेद हो जाता है, और बातें सब एक-सी हैं । जिस प्रकार नाट्य में लोकधर्मी और नाट्यधर्मी रूप भेद होते हैं उसी प्रकार काव्य में भी क्रमशः स्वभावोक्ति द्वारा और वक्रोक्ति द्वारा विभावादि का उपस्थापन होता है।