भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 680 में से

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पृष्ठ 256

१९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् अन्ये तु—अनुकर्तरि यः स्थाय्यवभासोऽभिनयादिसामग्र्यादिकृतो भित्ता- विव हरितालादिना अश्वावभासः, स एव लोकातीततयास्वादपरसंज्ञया प्रतीत्या रस्यमानो रस इति नाट्याद्रसा नाट्यरसाः। अपरे पुनुर्विभावानुभावमात्रमेव विशिष्टसामग्र्या समर्प्यमाणं तद्विभावनीयानुभावनीयस्थायिरूपचित्तवृत्त्युचित- वासनानुषक्तं स्वनिर्वृतिचर्वणाविशिष्टमेव रसः। तन्नाट्यमेव रसाः। अन्ये तु शुद्धं विभावम्, अपरे शुद्धमनुभावम्, केचित्तु स्थायिमात्रम्, इतरे व्यभिचारिणम्, अन्य लोग¹ कहते हैं—अनुकर्ता नट में अभिनयादि सामग्री आदि से उत्पन्न जो स्थायी का अवभास (मिथ्या ज्ञान), भीत पर हरिताल आदि से अश्व के मिथ्या ज्ञान की भाँति, है, वही लोकातीत होने के कारण 'आस्वाद' नामक प्रतीति से रस्यमान हो 'रस' है, इस प्रकार नाट्य से रस 'नाट्यरस' कहलाते हैं। और लोगों² के अनुसार विभाव-अनुभाव मात्र ही, विशिष्ट सामग्री के द्वारा (सामाजिकों) में समर्पित, उनसे विभावनीय एवं अनुभावनीय स्थायी रूप चित्तवृत्ति के उचित वासना में सम्बद्ध, एवं सामाजिक की निर्वृति या आनन्दरूप चर्वणा से विशिष्ट होकर ही रस है। इस प्रकार नाट्य ही रस³ हैं। अन्य लोग शुद्ध विभाव को, दूसरे शुद्ध अनुभाव को, कुछ लोग स्थायी सामाजिक नट को राम समझता है और नट के शिक्षाभ्यास से प्रदर्शित कृत्रिम विभाव- अनुभाव-व्यभिचारी के द्वारा नट में रस का अनुमान करता है। श्री शङ्कुक रस की 'अनुमिति' मानते हैं। सामाजिक की नट में जो रामबुद्धि उत्पन्न होती है उसे 'स्मृति' आदि से विलक्षण मानते हैं, वह सम्यग् ज्ञान, मिथ्याज्ञान, संशय और सादृश्य आदि सभी प्रतीतियों से विलक्षण चित्र के तुरग की जैसी प्रतीति है। चित्र का घोड़ा घोड़ा नहीं है तथापि सभी प्रतीतियों से उसकी प्रतीति विलक्षण होती है। १. इस मत में अभिनयादि सामग्री द्वारा अनुकर्त्ता नट में स्थायी का मिथ्याज्ञान सामाजिक का आस्वाद रूप 'रस' है। जिस प्रकार हरिताल आदि से भीत पर अश्व आदि का चित्र बना दिया जाता है उससे अश्व का मिथ्या ज्ञान होता है उसी प्रकार स्थायी का मिथ्या ज्ञान अनुकर्त्ता नट में उत्पन्न होकर सामाजिक के चमत्कार को उत्पन्न करता है। २. यहाँ विभाव-अनुभाव ही 'रस' होते हैं, नाट्यादि सामग्री से ये सामाजिकों में पहुँच जाते हैं और उनके द्वारा विभावनीय अनुभावनीय स्थायिरूप चित्तवृत्ति की वासना से सम्बद्ध हो जाते हैं और फिर सामाजिक की निर्वृति रूप चर्वणा से विशिष्ट होकर 'रस' की स्थिति को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार इस मत में नाट्य से रस नहीं, बल्कि नाट्य ही रस है, यह माना गया है। और भी, किसी ने शुद्ध विभाव को, किसी ने शुद्ध अनुभाव को, किसी ने स्थायी भाव मात्र को, किसी ने व्यभिचारी भाव को, किसी ने इनके संयोग को, किसी ने अनुकार्य को और किसी ने सकल समुदाय को 'रस' कहा है। ३. 'नाट्यरस' का प्रयोग भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में किया है। विभिन्न व्याख्याकारों ने अपने अपने अनुसार इसका अर्थ किया है। उत्पत्तिवादी लोल्लट के अनुसार अनुकार्यगत रस होने के कारण 'नाट्ये प्रयुज्यमानत्वान्नाट्यरसः' यह विग्रह है। श्री शङ्कुक के यहाँ अनुकार्य के रूप में अभिमत नर्तक या नट में सामाजिक विलक्षण अनुमान द्वारा रस का आस्वादन करता है अतः 'नाट्ये, नाट्याश्रये नटे रसः' यह विग्रह है। उपर्युक्त अन्य मतों में 'नाट्याद् रसः' और 'नाट्यमेव रसः' 'नाट्यरसः' यह विग्रह किये गए हैं।