भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 255

द्वितीय उद्योतः १९५ लोचनम् क्रमेण तावन्न परिपोष इति नानुकार्ये रसः । अनुकर्तरि च तद्भावे लयाद्यननु- सरणं स्यात् । सामाजिकगते वा कश्चमत्कारः ? प्रत्युत करुणादौ दुःखप्राप्तिः । तस्मान्नायं पक्षः । कस्तर्हि ? इहानन्त्यान्नियतस्यानुकारो न शक्यः, निष्प्रयोज- नश्च, विशिष्टाप्रतीतौ तटस्थ्येन व्युत्पत्त्यभावात् । तस्मादनियतावस्थात्मकं स्थायिनमुद्दिश्य विभावानुभावव्यभिचारिभिः संयुज्यमानैरयं रामः सुखीति स्मृतिविलक्षणा स्थायिनि प्रतीतिगोचरतयास्वा- दरूपा प्रतिपत्तिरनुकर्त्रालम्बना नाट्यैकगामिनी रसः । स च न व्यतिरिक्तमा- धारमपेक्षते । किं त्वनुकार्याभिन्नाभिमते नर्तके आस्वादयिता सामाजिक इत्येतावन्मात्रमदः । तेन नाट्य एव रसः, नानुकार्यादिष्विति केचित् । परिपोषरूप फल क्या होगा ? दूसरे यह कि विस्मय, शोक और क्रोध आदि का क्रम से परिपोष नहीं होता है, अतः अनुकार्य में रस नहीं हो सकता । यदि अनुकर्ता नट में रस को मानेंगे तो नट में रस जब सिद्ध ही है तब उसके द्वारा रसोपयोगी ताल-लय आदि का अनुसरण नहीं बनेगा । और यदि सामाजिक में रस स्वीकार करेंगे तब कौन-सा चमत्कार होगा ? प्रत्युत करुण आदि रस में (सामाजिक को) दुःख की प्राप्ति होगी । अतः यह पक्ष नहीं हो सकता । फिर कौन होगा ? तत्तद्गत रत्यादि भाव के अनन्त होने के कारण नियत (निश्चित, एक अवस्था वाले स्थायी) का अनुकरण नहीं किया जा सकता और वह निष्प्रयोजन भी है, क्योंकि स्थायी के वैशिष्य की प्रतीति में (नट के) तटस्थ होने के कारण (चतुर्वर्ग, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के उपाय रूप) व्युत्पत्ति नहीं होगी । इस लिए जिसकी अवस्था नियत नहीं है ऐसे स्थायी को उद्देश करके संयोग प्राप्त करते हुए विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी से 'यह राम सुखी है' यह स्मृति से विलक्षण, स्थायी के प्रतीतिगोचर होने के कारण आस्वादरूप, अनुकर्ता नट में आलम्बित, एकमात्र नाट्य में रहने वाली प्रतिपत्ति (ज्ञान) 'रस' है। वह रस दूसरे आधार की अपेक्षा नहीं करता किन्तु अनुकार्य (राम आदि) से अभिन्न रूप में मान लिए गए नर्तक में सामाजिक आस्वाद प्राप्त करता है, यह इतना मात्र है । इस लिए नाट्य में ही रस है अनुकार्य आदि में नहीं ।' अनियत अवस्था वाले स्थायी को उद्देश्य करके संयोग प्राप्त करते हुए विभावानुभावव्यभिचारी भावों के द्वारा अनुकर्त्ता नट को आलम्बन करके जो स्थायी की नाट्यगत प्रतीति है, वही रस है। सामाजिक अनुकर्त्ता नट को देख कर अनुभव करता है कि यह (नर्तक या नट) सीताविषयक- रतिमान् राम है, इस प्रकार नर्तक को वह राम आदि अनुकार्य से अभिन्न मान लेता है। रस एक आस्वादरूप प्रतीति है जो सामाजिक की विशिष्ट बुद्धि के होने पर मानी जाती है। सामाजिक नट को देख कर अनुमान द्वारा अनुकार्य रामादि से उसे अभिन्न मान लेता है, उसके स्थायी का आस्वाद प्राप्त करता है। इस प्रकार श्री शङ्कुक के अनुसार 'रस' नट के आश्रित रूप में नाट्य के आश्रित है।