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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 680 में से

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पृष्ठ 254

१९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् पूर्वावस्थायां यः स्थायी स एव व्यभिचारिसम्पातादिना प्राप्तपरिपोषोऽनुकार्य- गत एव रसः । नाट्ये तु प्रयुज्यमानत्वान्नाट्यरस इति केचित् । प्रवाहधर्मिण्यां चित्तवृत्तौ चित्तवृत्तेः चित्तवृत्त्यन्तरेण कः परिपोषार्थः ? विस्मयशोकक्रोधादेश्च चारी भावों के सम्पात आदि से परिपोष प्राप्त करके अनुकार्य ( राम आदि ) में ही 'रस' होता है । परन्तु नाट्य में प्रयोग किए जानेके कारण नाट्य का रस होता है । कुछ लोग कहते हैं कि—"चित्तवृत्ति के प्रवाहधर्म होने से एक चित्तवृत्ति का दूसरी चित्तवृत्ति से प्रकार कहा है कि रत्यादि स्थायीभाव ललना आदि आलम्बन विभावों से उत्पन्न होता है, उद्यान आदि उद्दीपन विभावों से उद्दीपित होता है, कटाक्ष आदि अनुभावों से प्रतीतियोग्य होता है और उत्कण्ठादि व्यभिचारियों से परिपोषित हुआ 'रस' रूप में अनुकार्य में होता है । और नट में सामाजिक लोग राम आदि के रूप के अनुसन्धान के कारण आरोप करते हैं । इस प्रकार अनुकार्यगत रस का अनुकर्ता नट में आरोप ही उनके चमत्कार का कारण होता है । मुख्यरूप से रामादि अनुकार्य में और गौणरूप से अनुकर्ता नट में रस की प्रतीति होती है, यह भट्टलोल्लट का मत 'लोचन' में बहुत संक्षिप्तरूप से कहा है । भरतमुनि ने नाट्य से सम्बद्ध होने के कारण 'नाट्यरस' कहा है । इसका यह अर्थ नहीं कि रस नाट्य में उत्पन्न होता है । १. श्रीशङ्कुक का अनुमितिवाद—यद्यपि 'लोचन' में उपर्युक्त मत और प्रस्तुत मत के आचार्यों के नाम का उल्लेख नहीं है तथापि 'अभिनवभारती' और 'काव्यप्रकाश' आदि ग्रन्थों के अनुसार आचार्यों का मैंने नामोल्लेख किया है । अस्तु, प्रस्तुत मत के आचार्य श्रीशङ्कुक भट्टलोल्लट प्रभृति के 'अनुकार्यगत रस' के सिद्धान्त का खण्डन करते हैं । उनके अनुसार स्थायीभाव का व्यभिचारी आदि भावों से परिपोष जैसा कि उपर्युक्त मत में कहा गया है, सम्भव नहीं, क्योंकि जब कि चित्तवृत्तियाँ प्रवाहधर्म होती हैं, कभी एक सी नहीं रहतीं, फिर कैसे एक से दूसरी का परिपोष बन सकेगा । बल्कि इसके विपरीत क्रमशः चित्तवृत्तियाँ शिथिल ही हो जाती हैं । इसलिए व्यभिचारी आदि द्वारा स्थायीभाव के परिपोष के न बनने के कारण अनुकार्य में रस की बात गलत हो जाती है । दूसरे यदि कहते हैं कि तब अनुकर्ता नट में रस की सत्ता मान लिया जाय तो यह भी बात नहीं, क्योंकि जब नट में रस की सत्ता ही सिद्ध हो गई तो उसके द्वारा लय आदि के अनुसरण की बात नहीं बनती । वह अनुकर्ता नट इसलिए लय आदि का अनुसरण करता है कि उससे रस का अनुभव हो; जब रस उसमें पहले से सिद्ध है तो उसका यह उद्योग व्यर्थ सिद्ध हो जाता है । और तीसरे यदि सामाजिक में रस मानते हैं तो उसे चमत्कार क्या मिलता है ? प्रेम किसी और ने किया, सुख किसी और को मिला, उससे सामाजिक को क्या मिला ? बल्कि करुण आदि में तो सामाजिक को दुःख ही अनुभव होना चाहिए, क्योंकि रस उसमें उत्पन्न होता है ! इस प्रकार यह भी पक्ष नहीं । यदि 'स्थायी का अनुकरण रस है' यह कहेंगे तब भी स्थायी के अनन्त होने के कारण किसी नियत स्थायी का अनुकरण ही नहीं बन सकेगा और उसका न तो उस स्थायी के अनुकरण का कोई प्रयोजन ही प्रतीत होता है । और यदि सामाजिकों को यह प्रतीत होता है कि नट किसी विशिष्ट स्थायी का अनुकरण कर रहा है तो तटस्थ नट के प्रति उनकी उदासीनता होगी और इस प्रकार उन्हें चतुर्वर्ग की व्युत्पत्ति भी नहीं होगी । अपने मत के अनुसार श्री शङ्कुक का यह कहना है कि रस नाट्य में रहता है । क्योंकि