ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उद्योतः १९३ लोचनम् तेन न प्रतीयते नोत्पद्यते नाभिव्यज्यते काव्येन रसः । किं त्वन्यशब्दवैलक्षण्यं काव्यात्मनः शब्दस्य त्र्यंशताप्रसादात् । तत्राभिधायकत्वं वाच्यविषयम्, भावकत्वं रसादिविषयम्, भोगकृत्त्वं सहृदयविषयमिति त्रयोऽशभूता व्यापाराः। तत्राभिधाभागो यदि शुद्धः स्यात्तत्तन्त्रादिभ्यः शास्त्राम्नायेभ्यः श्लेषाद्यलङ्काराणां को भेदः ? वृत्तिभेदवैचित्र्यं चाकिञ्चित्करम्। श्रुतिदुष्टादिवर्जनं च किमर्थम् ? तेन रसभावनाख्यो द्वितीयो व्यापारः; यद्वशादभिधा विलक्षणैव । तच्चैतद्भाव- कत्वं नाम रसान् प्रति यत्काव्यस्य तद्विभावादीनां साधारणत्वापादनं नाम । भाविते च रसे तस्य भोगः योऽनुभवस्मरणप्रतिपत्तिभ्यो विलक्षण एव द्रुति- विस्तरविकासात्मा रजस्तमोवैचित्र्यानुविद्धसत्त्वमयनिजचित्स्वभावनिर्वृतिवि- श्रान्तिलक्षणः परब्रह्मास्वादसविधः । स एव च प्रधानभूतोऽशः सिद्धरूप इति । व्युत्पत्तिर्नासाप्रधानमेवे'ति । अत्रोच्यते—रसस्वरूप एव तावद्विप्रतिपत्तयः प्रतिवादिनाम् । तथाहि- प्रवृत्ति करनी पड़ेगी । वहाँ भी, क्या स्वगत ( सहृदयात्मगत ) रस अभिव्यक्त होगा, या परगत, यह दोष पहले के समान ही है । इस लिए काव्य से रस न प्रतीत होता है, न उत्पन्न होता है, न अभिव्यक्त होता है। किन्तु तीन अंशों वाला होने के प्रसाद से काव्य रूप शब्द की अन्य शब्दों से विलक्षणता है। वहाँ अभिधायकत्व ( अभिधा ) वाच्यविषयक व्यापार है भावकत्व रसादिविषयक व्यापार है और भोगकृत्त्व (भोजकत्व ) सहृदयविषयक व्यापार है, इस प्रकार काव्यरूप शब्द के ये तीन अंश- भूत व्यापार हैं। वहाँ यदि अभिधा के अंश को शुद्ध ( अर्थात् इतर व्यापार से अनालिङ्गित ) मान लिया जाय तो तन्त्र आदि शास्त्र के प्रकारों से श्लेष आदि अलङ्कारों का क्या भेद होगा? उपनागरिका आदि वृत्तियों के भेदों का वैचित्र्य ( विलक्षणता ) कुछ नहीं कर सकती । और फिर श्रुतिदुष्ट आदि दोषों का वर्जन किस काम का होगा ? इस लिए रसभावना रूप दूसरा व्यापार है, जिसके कारण अभिधा विलक्षण ही हो जाती है । वह यह भावकत्व रसों के प्रति जो काव्य के उन रसों के विभावादि के साधारणीकरणत्व आपादन है । रस के भावित होने पर, उसका भोग, जो अनुभव, स्मरण और प्रतिपत्ति से विलक्षण ही है, और वह द्रुति, विस्तार और विकास रूप है, तथा रजस् और तमस् के वैचित्र्य से अनुविद्ध स्वात्मचैतन्य रूप लोकोत्तर आनन्द है, अर्थात् विगलित वेद्यान्तररूप में अवस्थिति रूप वाला एवं परब्रह्म के आस्वाद का समीपवर्ती है। वही प्रधानभूत अंश सिद्धरूप है । ( सहृदयों को ) व्युत्पत्ति ( चतुर्वर्ग फल की प्राप्ति रूप फल ) मिलता है, वह तो अप्रधान है ।' इस प्रसङ्ग में कहते हैं—रस के स्वरूप के सम्बन्ध में ही प्रतिवादियों के विभिन्न मत हैं । जैसा कि—कुछ लोग कहते हैं' 'पूर्व अवस्था' में जो 'स्थायी' है, वही व्यभि- १. भट्ट लोल्लट आदि का उत्पत्तिवाद—विभावादि के संयोग से रस की निष्पत्ति या उत्पत्ति होती है । यह रस की उत्पत्ति अनुकार्य राम में होती है । इस विचार को 'काव्य-प्रकाश' में इस १३ ध्व०