ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्पत्तिरेवाभ्युपगता स्यात् । सा चायुक्ता, सीतायाः सामाजिकं प्रत्यविभाव- त्वात् । कान्तात्वं साधारणं वासनाविकासहेतुविभावतायां प्रयोजकमिति चेत्- देवतावर्णनादौ तदपि कथम् । न च स्वकान्तास्मरणं मध्ये संवेद्यते । अलोक- सामान्यानां च रामादीनां ये समुद्रसेतुबन्धादयो विभावास्ते कथं साधारण्यं भजेयुः । न चोत्साहादिमान् रामः स्मर्यते, अननुभूतत्वात् । शब्दादपि तत्प्र- तिपत्तौ न रसोपजनः । प्रत्यक्षादिव नायकमिथुनप्रतिपत्तौ । उत्पत्तिपक्षे च करुणस्योत्पादाद् दुःखित्वे करुणप्रेक्षासु पुनरप्रवृत्तिः स्यात् । तन्न उत्पत्तिरपि, नाप्यभिव्यक्तिः, शक्तिरूपस्य हि शृङ्गारस्याभिव्यक्तौ विषयार्जनतारतम्यप्रवृत्तिः स्यात् । तत्रापि किं स्वगतोऽभिव्यज्यते रसः परगतो वेति पूर्ववदेव दोषः । और स्वगत रूप से (अर्थात् सहृदय में) वह (रस) राम आदि के चरित रूप काव्य से नहीं प्रतीत होता है, क्योंकि अपने आप में प्रतीति मान लेने पर सहृदय में रस की उत्पत्ति माननी होगी। परन्तु वह ठीक नहीं, क्योंकि सामाजिक (या सहृदय) के प्रति सीता विभाव नहीं है। यदि कहिए कि साधारण कान्तात्व रत्यादि वासना के विकास के हेतुभूत विभावना में प्रयोजक है। तो वह भी देवता के वर्णन आदि में कैसे होगा ? ऐसा नहीं कि बीच में अपनी कान्ता के स्मरण का संवेदन होता है। और, आलोक सामान्य चरित वाले राम आदि में जो समुद्र के सेतुबन्ध आदि विभाव हैं, वे कैसे साधारण्य को प्राप्त कर सकते हैं ? और उत्साह आदि से युक्त राम का तत्काल स्मरण भी नहीं होता, क्योंकि उनका पहले कभी अनुभव नहीं हुआ रहता है। शब्द रूप काव्य से यदि उस रामगत उत्साह की प्रतीति करते हैं, तब भी (सहृदयों के) रस उत्पन्न नहीं होगा, जैसे नायक-नायिका को प्रत्यक्ष देखकर (किसी के रसोत्पत्ति नहीं होती) । रस की उत्पत्ति को (सहृदयों में) मान लेने पर करुण रस के उत्पन्न होने से दुःखी होने पर पुनः वे (सहृदय) करुण रस-प्रधान नाटकों में प्रवृत्त नहीं होंगे। इस लिए उत्पत्ति भी नहीं, अभिव्यक्ति भी नहीं। शक्ति या वासना रूप शृङ्गार (और वीर आदि अन्य रस) की अभिव्यक्ति में विषय के अर्जन (ग्रहण) में अनुभव के अंश में तारतम्य की
से और काव्य के 'शेष' अलङ्कार से भेद रह जायगा ? (अनेक अर्थ के बोध की इच्छा से एक पद का एक बार उच्चारण 'तन्त्र' कहलाता है 'हलन्त्यम्' में दो अर्थ हैं।) यदि कहिए कि शास्त्र के शब्दों में नागरिका आदि वृत्तियों का विचार नहीं होता और श्रुतिदुष्ट आदि दोषों का वर्जन नहीं होता, यही दोनों का भेद या अन्तर है। तो इतने मात्र से कुछ भी नहीं होता। इसलिए रसभावनाव्य या भावकत्व रूप द्वितीय व्यापार की कल्पना करते हैं। इस व्यापार से अभिधा विलक्षण हो जाती है। यह व्यापार रसविषयक होकर विभावादि को 'साधारण' बना देता है। इस प्रकार रस के भावित होने पर सहृदय को भोजकत्व व्यापार से रस का 'भोग' होता है। वह 'भोग' अनुभव और स्मरण से विलक्षण, द्रुतविस्तरविकारूप, रजस्तमोवैचित्र्यानुविद्धसत्त्वमय, चित्स्वभाव, निर्वृत्ति या आनन्दरूप, परब्रह्मास्वादसहोदर एवं विश्रान्ति या विगलितवेद्यान्तर- स्थिति रूप है। इस प्रकार भोजकत्ववादी भट्टनायक का मत है।