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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 680 में से

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पृष्ठ 251

द्वितीय उद्योतः १९१ लोचनम् परगततया प्रतीयते तर्हि ताटस्थ्यमेव स्यात् । न च स्वगतत्वेन रामादिच- रितमयात्काव्यादसौ प्रतीयते । स्वात्मगतत्वेन च प्रतीतौ स्वात्मनि रसस्यो- रूप से (अर्थात् सहृदय से अतिरिक्त में) प्रतीत होता है, तब ताटस्थ्य (सहृदय से असम्बन्ध) ही होगा (अर्थात् स्वयं सहृदय को ऐसी स्थिति में रसप्रतीति नहीं होगी)। भट्टनायक का रस-विचार—भरत के रस-सूत्र के अनुसार विभाव आदि के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इस पर भट्टनायक पहले 'प्रतीति' की दृष्टि से विचार करते हैं और तत्पश्चात् उसकी प्रक्रिया का अपने अनुसार निरूपण करते हैं। पहले यह विचार करते हैं कि रस की प्रतीति 'परगत' रूप से होती है या 'स्वगत' रूप से। अर्थात् सहृदय को रस का बोध अनुकार्य राम या अनुकर्ता नट में होता है अथवा अपने में। भट्टनायक के विचार में दोनों पक्षों में किसी को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि रस को अनुकार्य या अनुकर्ता में मानते हैं तो सहृदय एक तटस्थ व्यक्ति हो जाता है, ऐसी स्थिति में, उसे क्या आ पड़ी है कि वह भिन्न के रस से स्वयं आनन्द का अनुभव करे। और यदि 'स्वगत' रूप से अर्थात् सहृदय में रस को मानते हैं तब यह स्वीकार करना पड़ता है कि रस सहृदय में उत्पन्न होता है। किन्तु यह ठीक इसलिए नहीं है कि सीता तो सहृदय या सामाजिक का 'विभाव' नहीं है और रस जब भी उत्पन्न होगा तब विभाव से ही उत्पन्न होगा। सहृदय या सामाजिक को जब तक यह भावना है कि सीता राम की पत्नी है तब तक सीता की रामविषयक रति की चर्वणा कैसे कर सकता है ? यदि साधारण कान्तात्व की भावना यहाँ मानते हैं तब भी जो कि सीता आदि में पूज्य-बुद्धि है वह किसी प्रकार सहृदय की रति का उद्बोध नहीं होने देगी। दूसरे यह भी नहीं कि सहृदय तत्काल अपनी पत्नी को स्मरण करने लगता है। पुनश्च राम आदि अलौकिक पात्रों के समुद्रबन्धन आदि विभावों का साधारण्य कैसे बन सकता है ? इस प्रकार साधारणीकरण के सम्भव न होने के कारण स्वगतरूप से भी रस की प्रतीति नहीं होगी। राम के उत्साह आदि के स्मरण यदि साधारणीकरण में सहायक मानते हैं तब भी पूर्व अनुभव के न होने के कारण स्मरण भी नहीं बनता है और काव्यरूप शब्द से यदि प्रतीति करते हैं तब तो लोक में प्रत्यक्ष नायिका-नायक को देखकर भी द्रष्टा को रस उत्पन्न होना चाहिए। सामाजिकों में रस की उत्पत्ति मानने में यह एक और कठिनाई है कि करुण रस के उत्पन्न होने पर दुःखी होने के कारण किसी प्रकार पुनः वे करुण-रस की प्रेक्षा में प्रवृत्त न होंगे। इन अनेक कारणों से सहृदयों में रस की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। इसी प्रकार उनमें रस की अभिव्यक्ति भी नहीं होगी। क्योंकि शृङ्गार जो वासना या शक्ति के रूप में सहृदयों के अन्तःकरण में विद्यमान रहता है उसकी अभिव्यक्ति स्वीकार करने पर कान्ता आदि उपायों के तारतम्य की स्थिति में भी अभिव्यक्ति में भी तारतम्य होगा। जिस प्रकार अन्धकार में पड़ी वस्तु की अभिव्यक्ति अधिक से अधिक तभी होगी जब अधिक से अधिक उस अभिव्यक्ति के उपायभूत आलोक को सम्पादित करेंगे, उसी प्रकार रस की भी अभिव्यक्ति तारतम्य-युक्त होगी यह एक दोष, दूसरा दोष यह कि अभिव्यक्ति को परगत मानते हैं या स्वगत, यह झगड़ा तब भी रह ही जाता है। इस प्रकार भट्टनायक काव्य से रस के प्रतीत, उत्पन्न या अभिव्यक्त होने के सिद्धान्तों का निराकरण करके अपने मत का प्रतिष्ठापन करते हैं कि काव्यात्मक शब्द, चूँकि अन्य शब्दों से विलक्षण होते हैं, के अभिधायकत्व, भावकत्व और भोजकत्व ये तीन अंशभूत व्यापार हैं। प्रथम अर्थविषयक व्यापार है, दूसरा रसादि-विषयक और तीसरा सहृदय-विषयक व्यापार है। और को न मानकर यदि केवल शुद्ध अभिधा को ही यहाँ मानते हैं तो शास्त्र के 'तन्त्र' आदि