ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
द्वितीय उद्योतः १९३ लोचनम् तेन न प्रतीयते नोत्पद्यते नाभिव्यज्यते काव्येन रसः । किं त्वन्यशब्दवैलक्षण्यं काव्यात्मनः शब्दस्य त्र्यंशताप्रसादात् । तत्राभिधायकत्वं वाच्यविषयम्, भावकत्वं रसादिविषयम्, भोगकृत्त्वं सहृदयविषयमिति त्रयोऽशभूता व्यापाराः। तत्राभिधाभागो यदि शुद्धः स्यात्तत्तन्त्रादिभ्यः शास्त्राम्नायेभ्यः श्लेषाद्यलङ्काराणां को भेदः ? वृत्तिभेदवैचित्र्यं चाकिञ्चित्करम्। श्रुतिदुष्टादिवर्जनं च किमर्थम् ? तेन रसभावनाख्यो द्वितीयो व्यापारः; यद्वशादभिधा विलक्षणैव । तच्चैतद्भाव- कत्वं नाम रसान् प्रति यत्काव्यस्य तद्विभावादीनां साधारणत्वापादनं नाम । भाविते च रसे तस्य भोगः योऽनुभवस्मरणप्रतिपत्तिभ्यो विलक्षण एव द्रुति- विस्तरविकासात्मा रजस्तमोवैचित्र्यानुविद्धसत्त्वमयनिजचित्स्वभावनिर्वृतिवि- श्रान्तिलक्षणः परब्रह्मास्वादसविधः । स एव च प्रधानभूतोऽशः सिद्धरूप इति । व्युत्पत्तिर्नासाप्रधानमेवे'ति । अत्रोच्यते—रसस्वरूप एव तावद्विप्रतिपत्तयः प्रतिवादिनाम् । तथाहि- प्रवृत्ति करनी पड़ेगी । वहाँ भी, क्या स्वगत ( सहृदयात्मगत ) रस अभिव्यक्त होगा, या परगत, यह दोष पहले के समान ही है । इस लिए काव्य से रस न प्रतीत होता है, न उत्पन्न होता है, न अभिव्यक्त होता है। किन्तु तीन अंशों वाला होने के प्रसाद से काव्य रूप शब्द की अन्य शब्दों से विलक्षणता है। वहाँ अभिधायकत्व ( अभिधा ) वाच्यविषयक व्यापार है भावकत्व रसादिविषयक व्यापार है और भोगकृत्त्व (भोजकत्व ) सहृदयविषयक व्यापार है, इस प्रकार काव्यरूप शब्द के ये तीन अंश- भूत व्यापार हैं। वहाँ यदि अभिधा के अंश को शुद्ध ( अर्थात् इतर व्यापार से अनालिङ्गित ) मान लिया जाय तो तन्त्र आदि शास्त्र के प्रकारों से श्लेष आदि अलङ्कारों का क्या भेद होगा? उपनागरिका आदि वृत्तियों के भेदों का वैचित्र्य ( विलक्षणता ) कुछ नहीं कर सकती । और फिर श्रुतिदुष्ट आदि दोषों का वर्जन किस काम का होगा ? इस लिए रसभावना रूप दूसरा व्यापार है, जिसके कारण अभिधा विलक्षण ही हो जाती है । वह यह भावकत्व रसों के प्रति जो काव्य के उन रसों के विभावादि के साधारणीकरणत्व आपादन है । रस के भावित होने पर, उसका भोग, जो अनुभव, स्मरण और प्रतिपत्ति से विलक्षण ही है, और वह द्रुति, विस्तार और विकास रूप है, तथा रजस् और तमस् के वैचित्र्य से अनुविद्ध स्वात्मचैतन्य रूप लोकोत्तर आनन्द है, अर्थात् विगलित वेद्यान्तररूप में अवस्थिति रूप वाला एवं परब्रह्म के आस्वाद का समीपवर्ती है। वही प्रधानभूत अंश सिद्धरूप है । ( सहृदयों को ) व्युत्पत्ति ( चतुर्वर्ग फल की प्राप्ति रूप फल ) मिलता है, वह तो अप्रधान है ।' इस प्रसङ्ग में कहते हैं—रस के स्वरूप के सम्बन्ध में ही प्रतिवादियों के विभिन्न मत हैं । जैसा कि—कुछ लोग कहते हैं' 'पूर्व अवस्था' में जो 'स्थायी' है, वही व्यभि- १. भट्ट लोल्लट आदि का उत्पत्तिवाद—विभावादि के संयोग से रस की निष्पत्ति या उत्पत्ति होती है । यह रस की उत्पत्ति अनुकार्य राम में होती है । इस विचार को 'काव्य-प्रकाश' में इस १३ ध्व०
१९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् पूर्वावस्थायां यः स्थायी स एव व्यभिचारिसम्पातादिना प्राप्तपरिपोषोऽनुकार्य- गत एव रसः । नाट्ये तु प्रयुज्यमानत्वान्नाट्यरस इति केचित् । प्रवाहधर्मिण्यां चित्तवृत्तौ चित्तवृत्तेः चित्तवृत्त्यन्तरेण कः परिपोषार्थः ? विस्मयशोकक्रोधादेश्च चारी भावों के सम्पात आदि से परिपोष प्राप्त करके अनुकार्य ( राम आदि ) में ही 'रस' होता है । परन्तु नाट्य में प्रयोग किए जानेके कारण नाट्य का रस होता है । कुछ लोग कहते हैं कि—"चित्तवृत्ति के प्रवाहधर्म होने से एक चित्तवृत्ति का दूसरी चित्तवृत्ति से प्रकार कहा है कि रत्यादि स्थायीभाव ललना आदि आलम्बन विभावों से उत्पन्न होता है, उद्यान आदि उद्दीपन विभावों से उद्दीपित होता है, कटाक्ष आदि अनुभावों से प्रतीतियोग्य होता है और उत्कण्ठादि व्यभिचारियों से परिपोषित हुआ 'रस' रूप में अनुकार्य में होता है । और नट में सामाजिक लोग राम आदि के रूप के अनुसन्धान के कारण आरोप करते हैं । इस प्रकार अनुकार्यगत रस का अनुकर्ता नट में आरोप ही उनके चमत्कार का कारण होता है । मुख्यरूप से रामादि अनुकार्य में और गौणरूप से अनुकर्ता नट में रस की प्रतीति होती है, यह भट्टलोल्लट का मत 'लोचन' में बहुत संक्षिप्तरूप से कहा है । भरतमुनि ने नाट्य से सम्बद्ध होने के कारण 'नाट्यरस' कहा है । इसका यह अर्थ नहीं कि रस नाट्य में उत्पन्न होता है । १. श्रीशङ्कुक का अनुमितिवाद—यद्यपि 'लोचन' में उपर्युक्त मत और प्रस्तुत मत के आचार्यों के नाम का उल्लेख नहीं है तथापि 'अभिनवभारती' और 'काव्यप्रकाश' आदि ग्रन्थों के अनुसार आचार्यों का मैंने नामोल्लेख किया है । अस्तु, प्रस्तुत मत के आचार्य श्रीशङ्कुक भट्टलोल्लट प्रभृति के 'अनुकार्यगत रस' के सिद्धान्त का खण्डन करते हैं । उनके अनुसार स्थायीभाव का व्यभिचारी आदि भावों से परिपोष जैसा कि उपर्युक्त मत में कहा गया है, सम्भव नहीं, क्योंकि जब कि चित्तवृत्तियाँ प्रवाहधर्म होती हैं, कभी एक सी नहीं रहतीं, फिर कैसे एक से दूसरी का परिपोष बन सकेगा । बल्कि इसके विपरीत क्रमशः चित्तवृत्तियाँ शिथिल ही हो जाती हैं । इसलिए व्यभिचारी आदि द्वारा स्थायीभाव के परिपोष के न बनने के कारण अनुकार्य में रस की बात गलत हो जाती है । दूसरे यदि कहते हैं कि तब अनुकर्ता नट में रस की सत्ता मान लिया जाय तो यह भी बात नहीं, क्योंकि जब नट में रस की सत्ता ही सिद्ध हो गई तो उसके द्वारा लय आदि के अनुसरण की बात नहीं बनती । वह अनुकर्ता नट इसलिए लय आदि का अनुसरण करता है कि उससे रस का अनुभव हो; जब रस उसमें पहले से सिद्ध है तो उसका यह उद्योग व्यर्थ सिद्ध हो जाता है । और तीसरे यदि सामाजिक में रस मानते हैं तो उसे चमत्कार क्या मिलता है ? प्रेम किसी और ने किया, सुख किसी और को मिला, उससे सामाजिक को क्या मिला ? बल्कि करुण आदि में तो सामाजिक को दुःख ही अनुभव होना चाहिए, क्योंकि रस उसमें उत्पन्न होता है ! इस प्रकार यह भी पक्ष नहीं । यदि 'स्थायी का अनुकरण रस है' यह कहेंगे तब भी स्थायी के अनन्त होने के कारण किसी नियत स्थायी का अनुकरण ही नहीं बन सकेगा और उसका न तो उस स्थायी के अनुकरण का कोई प्रयोजन ही प्रतीत होता है । और यदि सामाजिकों को यह प्रतीत होता है कि नट किसी विशिष्ट स्थायी का अनुकरण कर रहा है तो तटस्थ नट के प्रति उनकी उदासीनता होगी और इस प्रकार उन्हें चतुर्वर्ग की व्युत्पत्ति भी नहीं होगी । अपने मत के अनुसार श्री शङ्कुक का यह कहना है कि रस नाट्य में रहता है । क्योंकि
द्वितीय उद्योतः १९५ लोचनम् क्रमेण तावन्न परिपोष इति नानुकार्ये रसः । अनुकर्तरि च तद्भावे लयाद्यननु- सरणं स्यात् । सामाजिकगते वा कश्चमत्कारः ? प्रत्युत करुणादौ दुःखप्राप्तिः । तस्मान्नायं पक्षः । कस्तर्हि ? इहानन्त्यान्नियतस्यानुकारो न शक्यः, निष्प्रयोज- नश्च, विशिष्टाप्रतीतौ तटस्थ्येन व्युत्पत्त्यभावात् । तस्मादनियतावस्थात्मकं स्थायिनमुद्दिश्य विभावानुभावव्यभिचारिभिः संयुज्यमानैरयं रामः सुखीति स्मृतिविलक्षणा स्थायिनि प्रतीतिगोचरतयास्वा- दरूपा प्रतिपत्तिरनुकर्त्रालम्बना नाट्यैकगामिनी रसः । स च न व्यतिरिक्तमा- धारमपेक्षते । किं त्वनुकार्याभिन्नाभिमते नर्तके आस्वादयिता सामाजिक इत्येतावन्मात्रमदः । तेन नाट्य एव रसः, नानुकार्यादिष्विति केचित् । परिपोषरूप फल क्या होगा ? दूसरे यह कि विस्मय, शोक और क्रोध आदि का क्रम से परिपोष नहीं होता है, अतः अनुकार्य में रस नहीं हो सकता । यदि अनुकर्ता नट में रस को मानेंगे तो नट में रस जब सिद्ध ही है तब उसके द्वारा रसोपयोगी ताल-लय आदि का अनुसरण नहीं बनेगा । और यदि सामाजिक में रस स्वीकार करेंगे तब कौन-सा चमत्कार होगा ? प्रत्युत करुण आदि रस में (सामाजिक को) दुःख की प्राप्ति होगी । अतः यह पक्ष नहीं हो सकता । फिर कौन होगा ? तत्तद्गत रत्यादि भाव के अनन्त होने के कारण नियत (निश्चित, एक अवस्था वाले स्थायी) का अनुकरण नहीं किया जा सकता और वह निष्प्रयोजन भी है, क्योंकि स्थायी के वैशिष्य की प्रतीति में (नट के) तटस्थ होने के कारण (चतुर्वर्ग, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के उपाय रूप) व्युत्पत्ति नहीं होगी । इस लिए जिसकी अवस्था नियत नहीं है ऐसे स्थायी को उद्देश करके संयोग प्राप्त करते हुए विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी से 'यह राम सुखी है' यह स्मृति से विलक्षण, स्थायी के प्रतीतिगोचर होने के कारण आस्वादरूप, अनुकर्ता नट में आलम्बित, एकमात्र नाट्य में रहने वाली प्रतिपत्ति (ज्ञान) 'रस' है। वह रस दूसरे आधार की अपेक्षा नहीं करता किन्तु अनुकार्य (राम आदि) से अभिन्न रूप में मान लिए गए नर्तक में सामाजिक आस्वाद प्राप्त करता है, यह इतना मात्र है । इस लिए नाट्य में ही रस है अनुकार्य आदि में नहीं ।' अनियत अवस्था वाले स्थायी को उद्देश्य करके संयोग प्राप्त करते हुए विभावानुभावव्यभिचारी भावों के द्वारा अनुकर्त्ता नट को आलम्बन करके जो स्थायी की नाट्यगत प्रतीति है, वही रस है। सामाजिक अनुकर्त्ता नट को देख कर अनुभव करता है कि यह (नर्तक या नट) सीताविषयक- रतिमान् राम है, इस प्रकार नर्तक को वह राम आदि अनुकार्य से अभिन्न मान लेता है। रस एक आस्वादरूप प्रतीति है जो सामाजिक की विशिष्ट बुद्धि के होने पर मानी जाती है। सामाजिक नट को देख कर अनुमान द्वारा अनुकार्य रामादि से उसे अभिन्न मान लेता है, उसके स्थायी का आस्वाद प्राप्त करता है। इस प्रकार श्री शङ्कुक के अनुसार 'रस' नट के आश्रित रूप में नाट्य के आश्रित है।
१९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् अन्ये तु—अनुकर्तरि यः स्थाय्यवभासोऽभिनयादिसामग्र्यादिकृतो भित्ता- विव हरितालादिना अश्वावभासः, स एव लोकातीततयास्वादपरसंज्ञया प्रतीत्या रस्यमानो रस इति नाट्याद्रसा नाट्यरसाः। अपरे पुनुर्विभावानुभावमात्रमेव विशिष्टसामग्र्या समर्प्यमाणं तद्विभावनीयानुभावनीयस्थायिरूपचित्तवृत्त्युचित- वासनानुषक्तं स्वनिर्वृतिचर्वणाविशिष्टमेव रसः। तन्नाट्यमेव रसाः। अन्ये तु शुद्धं विभावम्, अपरे शुद्धमनुभावम्, केचित्तु स्थायिमात्रम्, इतरे व्यभिचारिणम्, अन्य लोग¹ कहते हैं—अनुकर्ता नट में अभिनयादि सामग्री आदि से उत्पन्न जो स्थायी का अवभास (मिथ्या ज्ञान), भीत पर हरिताल आदि से अश्व के मिथ्या ज्ञान की भाँति, है, वही लोकातीत होने के कारण 'आस्वाद' नामक प्रतीति से रस्यमान हो 'रस' है, इस प्रकार नाट्य से रस 'नाट्यरस' कहलाते हैं। और लोगों² के अनुसार विभाव-अनुभाव मात्र ही, विशिष्ट सामग्री के द्वारा (सामाजिकों) में समर्पित, उनसे विभावनीय एवं अनुभावनीय स्थायी रूप चित्तवृत्ति के उचित वासना में सम्बद्ध, एवं सामाजिक की निर्वृति या आनन्दरूप चर्वणा से विशिष्ट होकर ही रस है। इस प्रकार नाट्य ही रस³ हैं। अन्य लोग शुद्ध विभाव को, दूसरे शुद्ध अनुभाव को, कुछ लोग स्थायी सामाजिक नट को राम समझता है और नट के शिक्षाभ्यास से प्रदर्शित कृत्रिम विभाव- अनुभाव-व्यभिचारी के द्वारा नट में रस का अनुमान करता है। श्री शङ्कुक रस की 'अनुमिति' मानते हैं। सामाजिक की नट में जो रामबुद्धि उत्पन्न होती है उसे 'स्मृति' आदि से विलक्षण मानते हैं, वह सम्यग् ज्ञान, मिथ्याज्ञान, संशय और सादृश्य आदि सभी प्रतीतियों से विलक्षण चित्र के तुरग की जैसी प्रतीति है। चित्र का घोड़ा घोड़ा नहीं है तथापि सभी प्रतीतियों से उसकी प्रतीति विलक्षण होती है। १. इस मत में अभिनयादि सामग्री द्वारा अनुकर्त्ता नट में स्थायी का मिथ्याज्ञान सामाजिक का आस्वाद रूप 'रस' है। जिस प्रकार हरिताल आदि से भीत पर अश्व आदि का चित्र बना दिया जाता है उससे अश्व का मिथ्या ज्ञान होता है उसी प्रकार स्थायी का मिथ्या ज्ञान अनुकर्त्ता नट में उत्पन्न होकर सामाजिक के चमत्कार को उत्पन्न करता है। २. यहाँ विभाव-अनुभाव ही 'रस' होते हैं, नाट्यादि सामग्री से ये सामाजिकों में पहुँच जाते हैं और उनके द्वारा विभावनीय अनुभावनीय स्थायिरूप चित्तवृत्ति की वासना से सम्बद्ध हो जाते हैं और फिर सामाजिक की निर्वृति रूप चर्वणा से विशिष्ट होकर 'रस' की स्थिति को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार इस मत में नाट्य से रस नहीं, बल्कि नाट्य ही रस है, यह माना गया है। और भी, किसी ने शुद्ध विभाव को, किसी ने शुद्ध अनुभाव को, किसी ने स्थायी भाव मात्र को, किसी ने व्यभिचारी भाव को, किसी ने इनके संयोग को, किसी ने अनुकार्य को और किसी ने सकल समुदाय को 'रस' कहा है। ३. 'नाट्यरस' का प्रयोग भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में किया है। विभिन्न व्याख्याकारों ने अपने अपने अनुसार इसका अर्थ किया है। उत्पत्तिवादी लोल्लट के अनुसार अनुकार्यगत रस होने के कारण 'नाट्ये प्रयुज्यमानत्वान्नाट्यरसः' यह विग्रह है। श्री शङ्कुक के यहाँ अनुकार्य के रूप में अभिमत नर्तक या नट में सामाजिक विलक्षण अनुमान द्वारा रस का आस्वादन करता है अतः 'नाट्ये, नाट्याश्रये नटे रसः' यह विग्रह है। उपर्युक्त अन्य मतों में 'नाट्याद् रसः' और 'नाट्यमेव रसः' 'नाट्यरसः' यह विग्रह किये गए हैं।
द्वितीय उद्योतः १९७
लोचनम्
अन्ये तत्संयोगम्, एकेऽनुकार्यम्, केचन सकलमेव समुदायं रसमाहुरित्यलं बहुना । काव्येऽपि च लोकनाट्यधर्मिस्थानीयेन स्वभावोक्तिवक्रोक्तिप्रकारद्वयेना- लौकिकप्रसन्नमधुरौजस्विशब्दसमर्प्यमाणविभावादियोगादियमेव रसवार्ता । अस्तु वात्र नाट्याद्विचित्ररूपा रसप्रतीतिः; उपायवैलक्षण्यादियमेव तावदत्र सरणिः । एवं स्थिते प्रथमपक्ष एवैतानि दूषणानि, प्रतीतेः स्वपरगतत्वादिवि- कल्पनेन । सर्वपक्षेषु च प्रतीतिरपरिहार्या रसस्य । अप्रतीतं हि पिशाचवद्व्य- वहार्यं स्यात् । किं तु यथा प्रतीतिमात्रत्वेनाविशिष्टत्वेऽपि प्रात्यक्षिकी आनुमा- निकी आगमोत्था प्रतिभानकृता योगिप्रत्यक्षजा च प्रतीतिरूपायवैलक्षण्यादन्यैव, तद्वदियमपि प्रतीतिश्चर्वणास्वादनभोगापरनामा भवतु । तन्निदानभूताया हृदयसंवादाद्युपकृताया विभावादिसामग्र्या लोकोत्तररूपत्वात् । रसाः प्रती- मात्र को, इतर लोग व्यभिचारी को, दूसरे लोग इनके संयोग को, कुछ लोग अनुकार्य को और कुछ लोग समुदाय रूप समस्त को 'रस' कहते हैं । अलं बहुना । 'काव्य में भी लोकधर्मी और नाट्यधर्मी के समान, ( क्रम से ) स्वभावोक्ति और वक्रोक्ति इन दोनों प्रकारों से अलौकिक, प्रसन्न, मधुर और ओजस्वी शब्द से समर्प्यमाण विभावादि के योग से इसी प्रकार रस की वार्ता ( प्रतीति ) है । यहाँ ( काव्य में ) नाट्य से रस की प्रतीति विचित्र२ है, तथापि उपाय के विलक्षण होने के कारण यही यहाँ भी प्रकार है। इस प्रकार स्थित होने पर, पहले पक्ष में ही ये दोष हैं, क्योंकि प्रतीति स्वगत होती है या परगत होती है यह विकल्प करते हैं। सभी पक्षों में रस की प्रतीति का निराकरण नहीं है । क्योंकि अप्रतीत वस्तु पिशाच की भाँति, व्यवहार में नहीं आती । किन्तु जिस प्रकार प्रतीति मात्र होने से अवशिष्ट ( समान ) होने पर भी प्रात्यक्षिकी, आनुमानिकी, आगमोत्था, प्रतिभानकृता, योगिप्रत्यक्षजा ये प्रतीतियाँ उपाय के विलक्षण होने से पृथक्-पृथक् हो जाती हैं, उसी प्रकार यह भी प्रतीति, जिसके नाम चर्वणा, आस्वादन, भोग आदि हैं, ( अन्य प्रतीतियों से विलक्षण ) है। क्योंकि इस प्रतीति का निदानभूत जो हृदयसंवाद आदि से उपकृत, विभावादि सामग्री है, वह लोकोत्तर है । 'रस प्रतीत होते हैं' यह 'ओदनं पचति' ( भात को
१. नाट्य दो प्रकार के होते हैं- लोकधर्मी और नाट्यधर्मी। जिसमें अभिनय स्वाभाविक होता है, अर्थात् पुरुष का अभिनय पुरुष करता है और स्त्री का अभिनय स्त्री, वह लोकधर्मी नाट्य है। और जिसमें स्वर, अलंकार और स्त्री-पुरुषादि अपने वेष का परिवर्तन करते हैं वह नाट्यधर्मी नाट्य है। २. दृश्यकाव्य रूप नाट्य में जो रस की प्रतीति का प्रकार है उससे विचित्र प्रकार श्रव्यकाव्य में है। श्रव्यकाव्य में विभावादि उपाय दृष्टिगोचर नहीं होते हैं, अपितु शब्द के द्वारा समर्पित होते हैं। इस प्रकार केवल विभावादि के उपस्थापन को लेकर दोनों का भेद हो जाता है, और बातें सब एक-सी हैं । जिस प्रकार नाट्य में लोकधर्मी और नाट्यधर्मी रूप भेद होते हैं उसी प्रकार काव्य में भी क्रमशः स्वभावोक्ति द्वारा और वक्रोक्ति द्वारा विभावादि का उपस्थापन होता है।
१९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यन्त इति ओदनं पचतीतिवद् व्यवहारः, प्रतीयमान एव हि रसः। प्रतीतिरेव विशिष्टा रसना। सा च नाट्ये लौकिकानुमानप्रतीतेर्विलक्षणा; तां च प्रमुखे उपायतया सन्दधाना। एवं काव्ये अन्यशाब्दप्रतीतेर्विलक्षणा, तां च प्रमुखे उपायतयापेक्षमाणा। तस्मादनुत्थानोपहतः पूर्वपक्षः। रामादिचरितं तु न सर्वस्य हृदयसंवादीति महत्साहसम्। चित्रवासनाविशिष्टत्वाच्चेतसः। यदाह—'तासामनादित्व- माशिषो नित्यत्वात्। जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयो- रेकरूपत्वात्' इति। तेन प्रतीतिस्तावद्रसस्य सिद्धा। सा च रसनारूपा पचाता है) के समान व्यवहार है, क्योंकि रस प्रतीयमान ही होता है, विशिष्ट प्रतीति ही 'रसना' है। वह नाट्य में लौकिक अनुमानजन्य प्रतीति से विलक्षण प्रतीति है। उस (लौकिक अनुमानजन्य प्रतीति) को (वह प्रतीति) पहले अपने उपाय के रूप में अपेक्षा करती है। इस प्रकार काव्य में अन्य (लौकिक-वैदिक) शब्दजन्य प्रतीति से विलक्षण प्रतीति है, उस (शब्दप्रतीति) को पहले में उपायरूप से अपेक्षा करती है। इस लिए पूर्वपक्ष¹ न उत्थित होने के कारण उपहत हो गया। यह कहना बड़े साहस की बात है कि राम आदि का चरित सबका हृदयसंवादी नहीं है, क्योंकि चित्त नानाविध वासना से विशिष्ट होता है। जैसा कि (योगसूत्रकार कहते हैं)—'वे² (वासनाएँ) अनादि होती हैं क्योंकि आशिष या संकल्प विशेष (कि हमें सुख मिलता रहे कभी सुख के साधनों से वियोग न हो) नित्य होते हैं।' 'अतः जाति, देश और काल के व्यवधान होने पर भी (वासनाओं का) आनन्तर्य (क्रम) बना रहता है क्योंकि स्मृति और संस्कार दोनों एकरूप होते हैं।' उस कारण रस की प्रतीति सिद्ध
१. जैसा कि भट्टनायक ने कहा है कि रस प्रतीत नहीं होता है, यह बात निर्मूल हो जाती है। क्योंकि रस की प्रतीति को सभी ने अपने-अपने ढंग से स्वीकार किया है। जब वह प्रतीत नहीं होता है तो भट्टनायक उसे व्यवहार कैसे करेंगे ? जिस प्रकार उपाय की विलक्षणता से विभिन्न प्रतीतियाँ होती हैं उसी प्रकार यह भी एक विलक्षण प्रतीति है। इस प्रतीति की चर्वणा आदि अनेक संज्ञाएं हैं। इसकी उपायसामग्री विभावादि हैं। 'रस की प्रतीति' यह उसी प्रकार का प्रयोग है जैसे 'भात को पकाता है' यह व्यवहार है; भात तो पका हुआ ही होता है, फिर भी ऐसा प्रयोग सुना जाता है। रस प्रतीयमान ही होता है, अतः रस की प्रतीति रस से भिन्न नहीं है। नाट्य के क्षेत्र में वह प्रतीति लौकिक अनुमान की प्रतीति से विलक्षण होती है, किन्तु उस लौकिक अनुमान-प्रतीति को वह अपना उपाय बनाती है और काव्य के क्षेत्र में वह प्रतीति अन्य शाब्द प्रतीति से विलक्षण होती है और उस शब्द प्रतीति को अपना उपाय बनाती है। २. मानव-चित्त में अनन्तानन्त संस्कार वासना के रूप में जन्मजन्मान्तर से एकत्र होते हैं। किन्तु जब उनकी अभिव्यञ्जक सामग्री एकत्र होती है तभी वे प्रकट होते हैं। इस प्रकार वासना को अनादि माना गया है ! वासना रूप संस्कार, जो चित्त में विद्यमान होते हैं, अपनी अभिव्यञ्जक सामग्री के प्रत्यक्ष होते ही स्मृत हो उठते हैं। अनादि-अनन्त संस्कारों का आदि मूल है प्राणी के मन की सुखेच्छा। वही उसे कार्य के लिए प्रवृत्त करती है और वह कर्म द्वारा अनुभवों को संस्कार के रूप में अपने चित्त में आहित करता है। इस प्रकार आचार्य भट्टनायक ने उठाई है,
द्वितीय उद्योतः १९९ लोचनम् प्रतीतिरुत्पद्यते । वाच्यवाचकयोस्तत्राभिधादिविविक्तो व्यञ्जनात्मा ध्वननव्या- पार एव । भोगीकरणव्यापारश्च काव्यस्य रसविषयो ध्वननात्मैव, नान्यत्कि- ञ्चित् । भावकत्वमपि समुचितगुणालङ्कारपरिग्रहात्मकमस्माभिरेव वितत्य वक्ष्यते । किमेतदपूर्वम् ? काव्यं च रसान् प्रति भावकमिति यदुच्यते, तत्र भवतैव भावनादुत्पत्तिपक्ष एव प्रत्युज्जीवितः । न च काव्यशब्दानां केवलानां भावकत्वम्, अर्थापरिज्ञाने तदभावात् । न च केवलानामर्थानाम्, शब्दान्तरे- णार्प्यमाणत्वे तदयोगात् । द्वयोस्तु भावकत्वमस्माभिरेवोक्तम् । 'यत्रार्थः शब्दो है। वह रसना रूप उत्पन्न होती है। उसमें वाच्य और वाचक (काव्य) का अभिधा से व्यतिरिक्त व्यञ्जना (ध्वनन) ही रूप व्यापार है। (भट्टनायक का अभिमत) भोगी- करण¹ (भोजकत्व) व्यापार काव्य का रसविषयक व्यापार होने के कारण ध्वनन रूप ही है, दूसरा कुछ नहीं। समुचित गुणों और अलङ्कारों का परिग्रह रूप भावकत्व व्यापार को भी हम ही विस्तार करके कहेंगे। फिर यह अपूर्व क्या है ? यदि आप कहते हैं कि रसों के प्रति काव्य भावक होता है, वहाँ आप ही ने भावन करने (अर्थात् काव्य को रस का उत्पादक मान लेने) से उत्पत्तिपक्ष को पुनरुज्जीवित कर दिया है। केवल काव्य के शब्दों का भावकत्व नहीं बन सकता, क्योंकि अर्थ के परिज्ञान न होने से उनका भावकत्व नहीं बनेगा। केवल अर्थों का भी (भावकत्व), नहीं सम्भव है शब्दान्तर (लौकिक वाक्य) से भी उन अर्थों के उपस्थित होने पर उनमें भावकत्व का योग नहीं। दोनों का भावकत्व तो हमने ही कहा है 'जहाँ अर्थ अथवा शब्द उस गलत सिद्ध होती है, क्योंकि प्राणियों का चित्त नानाविध वासनाओं से युक्त होता है। अतः लोकोत्तर चरित के पात्रों के साथ भी सामाजिकों का 'हृदयसंवाद' बन जाता है। १. भट्टनायक ने काव्यरूप शब्द के तीन अंश (व्यापार) माने हैं—अभिधायकत्व, भावकत्व और भोजकत्व। लोचनकार तृतीय व्यापार भोगकृत्त्व या भोजकत्व को 'ध्वनन' व्यापार रूप ही मानते हैं, क्योंकि 'रस' ध्वन्यमान तत्त्व है और भोगकृत्त्व उस ध्वन्यमान रस का साधन है। 'भोग' भी वह चमत्कार है जो रस की रस्यमानता से उत्पन्न होता है। द्वितीय व्यापार भावकत्व भी समुचित गुणालङ्कार का परिग्रह रूप है। क्योंकि जब तक काव्य समुचित गुण-अलङ्कार- परिगृहीत नहीं होता तब तक रस के प्रति भावक नहीं होता । यहाँ लोचनकार ने मीमांसकों की तीन अंशों वाली 'भावना' से प्रस्तुत में काव्य के द्वारा रसों के भावन को संगत किया है। जैसा कि मीमांसक लोग कहते हैं, जैसे 'यजेत' इस वैदिक प्रयोग में 'भावना' के ये तीन अंश साध्य, साधन और इतिकर्त्तव्यता प्रत्यय के आख्यातात्व और लिङ्गत्व रूप अंशों से प्रतीत होते हैं। तात्पर्य यह कि यहाँ 'यजेत' के द्वारा यह भावना प्रतीत होती है कि क्या करे, किससे करे और कैसे करे ! इन आकांक्षाओं के उत्पन्न होने पर स्वर्गादि इष्ट को साध्य रूप से, स्वर्गादि को यागादि करण या साधन रूप से और प्रयाज आदि क्रियाकलाप को इतिकर्तव्यता रूप से भावन करे। इसी प्रकार प्रस्तुत में भी भावक काव्य व्यञ्जकत्व व्यापार रूप करण से, गुणालङ्कार के औचित्य रूप इतिकर्त्तव्यता द्वारा रसों को भावन करता है अर्थात् सहृदयों को रस का आस्वादन कराता है। शास्त्र से शासन और इतिहास से प्रतिपादन होता है, किन्तु इनसे भी विलक्षण काव्य का व्युत्पादन है। अर्थात् सहृदय को अपनी प्रतिभा से काव्य द्वारा
२०० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् वा तमर्थं व्यङ्क्तः' इत्यत्र । तस्माद्व्यञ्जकत्वाख्येन व्यापारेण गुणालङ्कारौचित्या- दिकयेतिकर्तव्यतया काव्यं भावकं रसान् भावयति, इति त्र्यंशायामपि भाव- नायां करणांशे ध्वननमेव निपतति । भोगोऽपि न काव्यशब्देन क्रियते, अपि तु घनमोहान्ध्यसङ्कटतानिवृत्तिद्वारेणास्वादापरनाम्नि अलौकिके द्रुतिविस्तरवि- कासात्मनि भोगे कर्तव्ये लोकोत्तरे ध्वननव्यापार एव मूर्धाभिषिक्तः । तच्चेदं भोगकृत्त्वं रसस्य ध्वननीयत्वे सिद्धे दैवसिद्धम् । रस्यमानतोदितचमत्कारान- तिरिक्तत्वाद्भोगस्येति । सत्त्वादीनां चाङ्गाङ्गिभाववैचित्र्यस्यानन्त्याद् द्रुत्यादि- त्वेनास्वादगणना न युक्ता । परब्रह्मास्वादसब्रह्मचारित्वं चास्त्वस्य रसास्वा- दस्य । व्युत्पादनं च शासनप्रतिपादनाभ्यां शास्त्रेतिहासकृताभ्यां विलक्षणम् । यथा रामस्तथाहमित्युपमानातिरिक्तां रसास्वादोपायस्वप्रतिभाविजृम्भारूपां व्युत्पत्तिमन्ते करोतीति कमुपालभामहे । तस्मात्स्थितमेतत्—अभिव्यज्यन्ते रसाः प्रतीत्यैव च रस्यन्त इति । तत्राभिव्यक्तिः प्रधानतया भवत्वन्यथा वा । अर्थ को व्यञ्जित करते हैं' इस कारिका में । इस लिए व्यञ्जकत्व नामक व्यापार से गुण और अलङ्कार के औचित्य आदि रूप इतिकर्तव्यता के द्वारा भावक काव्य रसों को भावित करता है । इस प्रकार तीन अंशों ( साध्य, साधन और इतिकर्तव्यता ) वाली 'भावना' में करण ( साधन ) अंश में 'ध्वनन' ही आता है। भोग भी काव्य-शब्द से नहीं किया जाता है ? ( अर्थात् अवश्य किया जाता है ) । अपि तु वह भोग, जो घने मोहान्धकार की आवृत्ति ( सङ्कटता ) भग्न हो जाने के द्वारा आस्वाद नामधारी एवं द्रुत, विस्तर और विकास रूप है, जब ( उत्पन्न ) किया जाता है, उस स्थिति में लोकोत्तर 'ध्वनन' व्यापार ही मूर्धाभिषिक्त ( प्रधान हेतु ) होता है। वह यह भोगकृत्त्व ( भोजकत्व व्यापार ) रस की ध्वननीयता के सिद्ध हो जाने पर दैवसिद्ध (स्वयंसिद्ध) है, क्योंकि भोग रस्यमानता के कारण उत्पन्न चमत्कार से अनतिरिक्त ( अभिन्न ) है। सत्त्व आदि का अङ्गाङ्गिभावप्रयुक्त वैचित्र्य अनन्त हो जाता है, अतः द्रुति आदि रूप से आस्वाद की गणना ठीक नहीं। इस रसास्वाद का परब्रह्म के आस्वाद के समान होना माना गया है ! ( इस काव्य का ) व्युत्पादन, शास्त्र के शासन और इतिहास के प्रतिपादन से विलक्षण है। 'जैसा राम वैसा मैं हूँ' इस प्रकार के उपमान से अतिरिक्त, रसास्वाद के उपायभूत अपनी प्रतिभा की विजृम्भा ( विकास ) रूप व्युत्पत्ति को पर्यन्त में ( उत्पन्न ) करता है, ऐसी स्थिति में हम किसे उलहना दें। इसलिए यह स्थिर हुआ— रस अभिव्यक्त होते हैं, और प्रतीति के द्वारा ही आस्वादित होते हैं, वह अभिव्यक्ति रसास्वाद प्राप्त करने के पश्चात् पर्यन्त में एक विलक्षण व्युत्पत्ति अनुभव होती है, जिसे 'जैसे राम हैं वैसा मैं हूँ', इस उपमान से अतिरिक्त कहा गया है। ध्वनिवादी लोचनकार का अभिमत यह है कि रस की अभिव्यक्ति होती है और उस अभिव्यक्ति का साधन है व्यञ्जना व्यापार । जब वही अभिव्यक्ति प्रधान होती है तब उसे 'ध्वनि' कहते हैं। और अप्रधान की स्थिति में रसादि अलङ्कार ।
द्वितीय उद्योतः २०१ ध्वन्यालोकः रसभावतदाभासतत्प्रशमलक्षणं मुख्यमर्थमनुवर्तमाना यत्र शब्दार्था- लङ्कारा गुणाश्च परस्परं ध्वन्यपेक्षया विभिन्नरूपा व्यवस्थितास्तत्र काव्ये ध्वनिरिति व्यपदेशः ॥ ४ ॥ प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्गं तु रसादयः । काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः ॥ ५ ॥ यद्यपि रसवदलङ्कारस्यान्यैर्दर्शितो विषयस्तथापि यस्मिन् काव्ये जहाँ रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रशम रूप मुख्य अर्थ का अनुगमन करते हुए शब्द, अर्थ और उनके अलङ्कार और गुण परस्पर ध्वनि की अपेक्षा भिन्न स्वरूप से व्यवस्थित होते हैं उस काव्य में 'ध्वनि' यह व्यपदेश (व्यवहार) होता है॥ अन्यत्र जहाँ वाक्यार्थ के प्रधान होने पर रस आदि अङ्ग हो जाते हैं उस काव्य में रसादि अलङ्कार हैं, यह मेरी मति (सिद्धान्त) है। यद्यपि रसवत् अलङ्कार का विषय दूसरों ने दिखाया है तथापि प्रधान रूप से लोचनम् प्रधानत्वे ध्वनिः, अन्यथा रसाद्यलङ्काराः । तदाह—मुख्यमर्थमिति । व्यवस्थिता इति । पूर्वोक्तयुक्तिभिर्विभागेन व्यवस्थापितत्वादिति भावः ॥ ४ ॥ अन्यत्रेति । रसस्वरूपे वस्तुमात्रेऽलङ्कारतायोग्ये वा । मे मतिरित्यन्यपक्षं दूष्यत्वेन हृदि निधायाभीष्टत्वात्स्वपक्षं पूर्वं दर्शयति—तथापीति । स हि पर- दर्शितो विषयो भाविनीत्या नोपपन्न इति भावः । यस्मिन् काव्ये इति स्पष्टत्वे- नासङ्गतं वाक्यमित्थं योजनीयम्-यस्मिन् काव्ये ते पूर्वोक्ता रसादयोऽङ्गभूता वाक्यार्थीभूतान्योऽर्थः, चशब्दस्तुशब्दस्यार्थे; तस्य काव्यस्य सम्बन्धिनो ये रसादयोऽङ्गभूतास्ते रसादेरलङ्कारस्य रसवदाद्यलङ्कारशब्दस्य विषयाः; स एवालङ्कारशब्दवाच्यो भवति योऽङ्गभूतः, न त्वन्य इति यावत् । अत्रोदाहरण- प्रधान रूप से हो अथवा अन्यथा (अप्रधान) रूप से। प्रधान होने पर 'ध्वनि' होगी; अन्यथा रसादि अलङ्कार । उसे कहते हैं—मुख्य अर्थ—। व्यवस्थित—। भाव यह कि पहले कही गई युक्तियों से विभाग के द्वारा व्यवस्थापित किए जा चुके हैं ॥ ४ ॥ अन्यत्र— । रसस्वरूप, वस्तुमात्र अथवा अलङ्कारता के योग्य वाक्यार्थ। मेरी मति— । इस कथन से दूसरे पक्ष को हृदय में दूषणीय मानकर, अभीष्ट होने के कारण अपने पक्ष को पहले दिखाते हैं—तथापि— । भाव यह कि वह परदर्शित विषय वक्ष्यमाण नीति के अनुसार उपपन्न नहीं है, जिस काव्य में यह स्पष्ट रूप से असङ्गत वाक्य इस प्रकार लगाना चाहिए—जिस काव्य में वे पूर्वोक्त रसादि अङ्गभूत हों और अन्य अर्थ वाक्यार्थीभूत (प्रधान अर्थ) हो, ('च' शब्द 'तु' शब्द के अर्थ में है); उस काव्य के सम्बन्धी जो रसादि अङ्गभूत हैं, वे रसादि अलङ्कार के—'रसवदादि- अलङ्कार' शब्द के—विषय हैं; वही 'अलङ्कार' शब्द का वाच्य होता है जो अङ्गभूत
२०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रधानतयाऽन्योऽर्थो वाक्यार्थीभूतस्तस्य चाङ्गभूता ये रसादयस्ते रसादेरलङ्कारस्य विषया इति मामकीनः पक्षः । तद्यथा चाटुषु प्रेयोऽ- लङ्कारस्य वाक्यार्थत्वेऽपि रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्ते । अन्य अर्थ जिस काव्य में वाक्यार्थ हो और उसके जो रसादि अङ्ग हों वे रसादि अलङ्कार के विषय हैं यह मेरा पक्ष है। वह जैसा कि चाटु के विषयों में प्रेयोऽलङ्कार के मुख्य वाक्यार्थ होने पर भी रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं। लोचनम् माह—तद्यथेति । तदित्यङ्गत्त्वम् । यथात्र वक्ष्यमाणोदाहरणे, तथान्यत्रापीत्यर्थः । भामहाभिप्रायेण चाटुषु प्रेयोऽलङ्कारस्य वाक्यार्थत्वेऽपि रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्त इतीदमेकं वाक्यम् । भामहेन हि गुरुदेवनृपतिपुत्रविषयप्रीतिवर्णनं प्रेयोऽलङ्कार इत्युक्तम् । तत्र प्रेयानलङ्कारो यत्र स प्रेयोऽलङ्कारोऽलङ्करणीय इहोक्तः । न त्वलङ्कारस्य वाक्यार्थत्वं युक्तम् । यदि वा वाक्यार्थत्वं प्रधानत्वम् । चमत्कार- होता है, न कि दूसरा । यहाँ उदाहरण कहते हैं—वह, जैसा कि— । 'वह' अर्थात् अङ्गत्व । अर्थात् जैसे यहाँ वक्ष्यमाण उदाहरण में, उसी प्रकार अन्यत्र भी । भामह¹ के अभिप्राय से 'चाटु के विषयों में प्रेयोऽलङ्कार के वाक्यार्थ होने पर भी रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं' यह एक वाक्य है। क्योंकि भामह ने कहा है कि गुरु, देवता, नृपति, पुत्र के विषय में प्रीति का वर्णन 'प्रेयोऽलङ्कार' है, यह कहा है। 'प्रेयान् (प्रियतम) जहाँ अलङ्कार है वह 'प्रेयोऽलङ्कार'² अलङ्करणीय यहाँ कहा गया है । क्योंकि 'अलङ्कार' का वाक्यार्थत्व ठीक नहीं। यदि वा वाक्यार्थत्व अर्थात् प्रधानत्व या चमत्कारकारिता । उद्भट² के मतानुयायी लोग (इस वाक्य को) टुकड़े करके व्याख्यान १. भामह के अभिप्राय से यह एक ही वाक्य है कि चाटु या प्रशंसाविषयक स्थलों में प्रेयो- लङ्कार की होती है अतः वहां रसादि अङ्गभूत हो जाते हैं। भामह के अनुसार गुरु, देवता, नृपति, पुत्र के सम्बन्ध में प्रीति का वर्ण 'प्रेयोऽलङ्कार' है। इसलिए भामह के अनुसार 'प्रेयोऽलङ्कार' का विग्रह होगा 'प्रेयान् अलङ्कारो यत्र' अर्थात् जहां अतिशय प्रिय प्राणी अलङ्कार या वर्णन का विषय हो वह 'प्रेयोऽलङ्कार' है। इसलिए प्रस्तुत में 'प्रेयोऽलङ्कार' वाक्यार्थ होने के कारण अलङ्कार नहीं बल्कि स्वयं अलङ्करणीय है। 'वाक्यार्थ' का दूसरा अर्थ प्रधानत्व है, अर्थात् चमत्कारकारी होना । २. इस व्याख्यान के विपरीत उद्भट के मतानुयायी लोग इसका वाक्यभेद करके व्याख्यान करते हैं। उनका कहना है कि पूर्व वाक्य में रसवदलङ्कार के विषय होने की चर्चा है, यहां उत्तर वाक्य में चाटुओ के वाक्यार्थ होने की स्थिति में प्रेयोऽलङ्कार का भी विषय है, यह बात कही गई है। यह तात्पर्य 'अपि' या 'भी' शब्द के वाक्य में प्रयोग से प्रतीत होता है, अर्थात् केवल रसवदलङ्कार का ही नहीं, अपितु प्रेयोऽलङ्कार का भी विषय है। उद्भट के मत में 'भावालङ्कार' (जिसमें रत्यादि भावों का वर्णन हो) ही प्रेयोऽलङ्कार है।
द्वितीय उद्योतः २०३ ध्वन्यालोकः स च रसादिरलङ्कारः शुद्धः सङ्कीर्णो वा । तत्राद्यो यथा— किं हास्येन न मे प्रयास्यसि पुनः प्राप्तश्चिराद्दर्शनं केयं निष्करुण प्रवासरुचिता केनासि दूरीकृतः । वह रसादि-अलङ्कार शुद्ध अथवा सङ्कीर्ण (दो प्रकार का) होता है। उनमें पहला, जैसे— ‘मजाक से क्या लाभ ! बहुत देर के बाद दर्शन देकर फिर तुम मुझ से दूर नहीं जा सकते । हे निष्करुण, यह प्रवास में तेरी रुचि कैसी ? किसने तुम्हें दूर कर दिया ?’ लोचनम् कारितेति यावत् । उद्भटमतानुसारिणस्तु अङ्क्त्वा व्याचक्षते—चाटुषु चाटु- विषये वाक्यार्थत्वे चाटूनां वाक्यार्थत्वे प्रेयोऽलङ्कारस्यापि विषय इति पूर्वेण सम्बन्धः । उद्भटमते हि भावालङ्कार एव प्रेय इत्युक्तः, प्रेम्णा भावानामुपलक्ष- णात् । न केवलं रसवदलङ्कारस्य विषयः यावत्प्रेयःप्रभृतेरपीत्यपिशब्दार्थः । रसवच्छब्देन प्रेयःशब्देन च सर्व एव रसवदाद्यलङ्कारा उपलक्षिताः, तदेवाह— रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्त इति । उक्तविषय इति शेषः । शुद्ध इति । रसान्तरेणाङ्गभूतेनालङ्कारान्तरेण वा न मिश्रः, आमिश्रस्तु सङ्कीर्णः । स्वप्नस्थानुभूतसदृशत्वेन भवनमिति हसन्नेव प्रियतमः स्वप्नेऽवलो- कितः । न मे प्रयास्यसि पुनरिति । इदानीं त्वां विदितशठभावं बाहुपाशबन्धान्न करते हैं—चाटु अर्थात् चाटुविषय के वाक्यार्थ होने पर ‘प्रेयोऽलङ्कार’ का भी विषय है, यह पहले से सम्बन्ध (अन्वय) है । क्योंकि उद्भट के मत में भावालङ्कार ही ‘प्रेयस्’ कहा गया है, प्रेम से भाव का उपलक्षण है । ‘अपि’ (या ‘भी’) शब्द का अर्थ है कि न केवल रसवदलङ्कार का, अपितु प्रेयःप्रभृति अलङ्कार का भी विषय है । ‘रसवत्’ शब्द से और ‘प्रेयस्’ शब्द से सभी ‘रसवदादि-अलङ्कार उपलक्षित हैं, उसी को कहते हैं—‘रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं’ यह उक्त विषय है । शुद्ध—। अर्थात् अङ्गभूत किसी रस अथवा किसी अलङ्कार से न मिला हुआ; और जो मिला हुआ (आमिश्र) है वह ‘सङ्कीर्ण’ है । अनुभव किए हुए के सदृश ही स्वप्न होता है, अतः हंसता हुआ ही प्रियतम स्वप्न में देखा गया । फिर तुम मुझसे दूर नहीं जा सकते—। जब तुम्हारा शठभाव (छिपकर प्रतिकूल आचरण) जान लिया है, ऐसी स्थिति में बाहुपाश के बन्धन से नहीं छोड़ूंगी । अतएव रिक्तबाहु- १. जहां भी ‘रसादि’ शब्द का प्रयोग है उससे रस के साथ भाव, तदाभास (रसाभास और भावाभास) तथा भावशान्त्यादि (यहां ‘आदि’ पद से भावोदय, भावसन्धि और भावशबलता गृहीत हैं) गृहीत होते हैं। ये रसादि किसी के अङ्ग के रूप में होने पर क्रमशः रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्वि और समाहित अलङ्कार के नाम से अभिहित होते हैं । अर्थात् रस, अङ्ग होने पर ‘रसवदलङ्कार’, भाव, अङ्ग होने पर ‘प्रेयोऽलङ्कार’, तदाभास (रसाभास और भावाभास) अङ्ग होने
२०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्वप्नान्तेष्विति ते वदन् प्रियतमव्यासक्तकण्ठग्रहो बुद्ध्वा रोदिति रिक्तबाहुवलयस्तारं रिपुस्त्रीजनः ॥ इस प्रकार स्वप्न में प्रिय के कण्ठ में बाहें डाले कहती हुई तुम्हारी रिक्तबाहुवलय वाली रिपु-स्त्रियाँ जग कर जोर से रुदन करती हैं । लोचनम् मोद्यामि । अत एव रिक्तबाहुवलय इति । स्वीकृतस्य चोपालम्भो युक्त इत्याह- केयं निष्करुणेति । केनासीति । गोत्रस्खलनादावपि न मया कदाचित्खेदितोऽसि । स्वप्नान्तेषु । स्वप्नायितेषु सुप्तप्रलपितेषु पुनःपुनरुद्भूततया बहुष्विति वदन्त्युष्माकं सम्बन्धी रिपुस्त्रीजनः प्रियतमे विशेषेणासक्तः कण्ठग्रहो येन तादृश एव सन् बुद्ध्वा शून्यवलयाकारीकृतबाहुपाशः सन् तारं मुक्तकण्ठं रोदितीति । अत्र शोक- स्थायिभावेन स्वप्नदर्शनोद्दीपितेन करुणरसेन चर्व्यमाणेन सुन्दरीभूतो नरपति- प्रभावो भातीति करुणः शुद्ध एवालङ्कारः । न हि त्वया रिपवो हता इति यादृग- नलङ्कृतोऽयं वाक्यार्थस्तादृगयम्, अपि तु सुन्दरतरीभूतोऽत्र वाक्यार्थः, सौन्दर्यं च करुणरसकृतमेवेति । चन्द्रादिना वस्तुना यथा वस्त्वन्तरं वदनाद्यलङ्क्रियते तदुपमितत्वेन चारुतायावभासात् । तथा रसेनापि वस्तु वा रसान्तरं वोपस्कृतं सुन्दरं भाति इति रसस्यापि वस्तुन इवालङ्कारत्वे को विरोधः ? वलय— । अपने आदमी को उलहना उचित है, इसलिए कहते हैं—हे निष्करुण यह प्रवास में— । किस ने— । कभी मैंने गोत्रस्खलन ( अन्य प्रिय का नामग्रहण ) आदि द्वारा भी तुम्हें खिन्न नहीं किया है । स्वप्नान्त अर्थात् सपनाने की स्थिति के प्रलापों में, बार-बार उत्पन्न होने के कारण बहुत से, इस प्रकार प्रलाप करती हुई तुम्हारी रिपु-स्त्रियाँ, प्रियतम में विशेष रूप से आसक्त किया है कण्ठग्रह को जिन्होंने, ऐसी ही अवस्था में जग कर, वलय से शून्यता की स्थिति को प्राप्त बाहुपाश वाली वे अधिक स्वर में अर्थात् मुक्तकण्ठ, रुदन करती हैं । यहाँ शोक जिसका स्थायी भाव है, और जो स्वप्न-दर्शन से उद्दीपित है ऐसे चर्वित होते हुए करुणरस से सुन्दर बना राजा का प्रभाव शोभावान् होता है, इस प्रकार करुण शुद्ध अवस्था में ही अलङ्कार है । 'तुमने शत्रुओं को मार डाला है' यह जिस प्रकार का अलङ्कारहीन वाक्यार्थ है उस प्रकार का यह नहीं है, बल्कि यहाँ सुन्दरतर वाक्यार्थ बन पड़ा है, और सौन्दर्य करुणरस के द्वारा ही है । चन्द्रादि पदार्थों से उस प्रकार दूसरा पदार्थ मुख आदि अलङ्कृत होता है, क्योंकि चन्द्र द्वारा उपमित होने से वह चारुरूप से मालूम होने लगता है । उसी प्रकार रस से भी वस्तु अथवा रसान्तर उपस्कृत होकर सुन्दर हो जाता है, इस प्रकार रस का भी, वस्तु की भाँति, अलङ्कार होने में क्या विरोध है ? पर 'ऊर्जस्वि' और भावशान्त्यादि, अङ्ग होने पर 'समाहित' कहलाते हैं । इस प्रकार 'रसादि' और 'रसवदाद्यलङ्कार' को प्राधान्य और अप्राधान्य मूलक रूप में सर्वत्र समझना चाहिए ।
द्वितीय उद्योतः २०५ ध्वन्यालोकः इत्यत्र करुणरसस्य शुद्धस्याङ्गभावात्स्पष्टमेव रसवदलङ्कारत्वम् । एवमेवंविधे विषये रसान्तराणां स्पष्ट एवाङ्गभावः । यहाँ शुद्ध करुण रस के अङ्ग हो जाने के कारण स्पष्ट ही रसवदलङ्कारता है । इस प्रकार ऐसे विषय में दूसरे रसों का भी स्पष्ट ही अङ्गभाव है । लोचनम् ननु रसेन किं कुर्वता प्रकृतोऽर्थोऽलङ्क्रियते ! तर्हि उपमयापि किं कुर्वत्या- लङ्क्रियेत । ननु तयोपमीयते प्रस्तुतोऽर्थः । रसेनापि तर्हि सरसीक्रियते सोऽर्थ इति स्वसंवेद्यमेतत् । तेन यत्केचिच्चूचुदन्-‘अत्र रसेन विभावादीनां मध्ये किमलङ्क्रियते’ इति तदनभ्युपगमपराहतम्; प्रस्तुतार्थस्यालङ्कार्यत्वेना- भिधानात् । अस्यार्थस्य भूयसा लक्ष्ये सद्भाव इति दर्शयति-एवमिति । यत्र राजादेः प्रभावख्यापनं तादृश इत्यर्थः । शङ्का-क्या करता हुआ रस प्रकृत अर्थ को अलङ्कृत करता है ? ( समाधान में प्रश्न करते हैं कि ) क्या करती हुई उपमा अलङ्कृत करती है ? ( यदि कहिए कि ) प्रस्तुत अर्थ उसके द्वारा उपमित किया जाता है ! तब तो यह स्वयं ही समझा जा सकता है कि रस के द्वारा भी वह अर्थ सरस किया जाता है । इसलिए जो कि कुछ लोगों ने कहा है-‘यहाँ रस के द्वारा विभाव आदि के बीच किसे अलङ्कृत किया जाय ?’ वह अमान्य होने के कारण निराकृत है । क्योंकि प्रस्तुत¹ अर्थ को अलङ्कार्य कहा गया है । इस अर्थ का बहुत प्रकार से लक्ष्य में सद्भाव है, यह दिखाते हैं— इस प्रकार- । अर्थात् जहाँ राजा आदि के प्रभाव का ख्यापन हो वैसा । १. यहां ध्वनिकार के ‘रसवदलङ्कार’ को लेकर दो प्रकार के मतभेद उपस्थित हैं, जिनका संकेत कारिका में ‘मे मतिः’ ( मेरी मति या सिद्धान्त है ) तथा वृत्तिग्रन्थ में ‘रसवदलङ्कारस्यान्यै- र्दर्शितो विषयः’ ( अन्य लोगों ने रसवदलङ्कार का विषय दिखाया है ) विदित होता है । प्रथम मतभेद यह है कि तथाकथित ‘रसवदलङ्कार’ को अलङ्कार की कोटि में गणना तभी हो सकती है जब कि ‘अलङ्कार’ का सामान्य लक्षण उसमें संगत हो । जैसा कि अलङ्कार को कहा जाता है कि वह कटक-कुण्डलादि के समान हैं, जिस प्रकार कटक-कुण्डल आदि शरीर के साक्षात् उपकारक होते हुए परम्परया आत्मा के उपकारक हैं उसी प्रकार काव्य-क्षेत्र में वाच्य-वाचक के साक्षात् उपकारक और परम्परया रस के उपकारक को अलङ्कार कहते हैं । ‘काव्यप्रकाश’ में यही कहा है— उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित् । हारादिवदलङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः ॥ २०१२ ॥ ‘अलङ्कार’ का यह लक्षण ‘रसवदलङ्कार’ में संगत नहीं होता, क्योंकि रसवदलङ्कार वाच्य- वाचक का उपकारक नहीं होता है बल्कि साक्षात् रस का उपकारक होता है, अतः उसकी गणना अलङ्कारों में न होकर ‘गुणीभूतव्यङ्ग्य’ के ‘अपराङ्ग’ नामक प्रभेद में है । तब प्रश्न उठता है कि जब ‘रसवदलङ्कार’ अलङ्कार नहीं है तो उसे ‘अलङ्कार’ क्यों कहा गया ? इसके समाधान में कुछ लोग कहते हैं कि जब प्राचीनों ने इसे अलङ्कार के रूप में व्यवहार
२०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
सङ्कीर्णो रसादिरङ्गभूतो यथा—
क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोंऽशुकान्तं
गृह्णन् केशेष्वपास्तश्चरणनिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेण ।
आलिङ्गन् योऽवधूतस्त्रिपुरयुवतिभिः साश्रुनेत्रोत्पलाभिः
कामीवार्द्रापराधः स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्निः ॥
सङ्कीर्ण रसादि अङ्गभूत, जैसे—
आर्दापराध कामी की भांति वह भगवान् शङ्कर का बाणाग्नि आप के पाप का
दहन करे, जो सजलनेत्रकमलों वाली त्रिपुरयुवतियों द्वारा झटकने पर हाथ में लग
गया, जोर से पीटने पर कपड़े के अन्त-भाग को पकड़ने लगा, तिरस्कृत होकर बाल
पकड़ पड़ा, नहीं देखने पर चरणों पर धड़फड़ा कर पड़ गया, और आलिङ्गन करता
हुआ तिरस्कार पाया ।
लोचनम्
क्षिप्त इति । कामिपक्षेऽनादृतः, इतरत्र धुतः । अवधूत इति न प्रतीप्सितः
प्रत्यालिङ्गनेन, इतरत्र सर्वाङ्गधूननेन विशरारूकृतः । साश्रुत्वमेकत्रेष्यया अन्यत्र
निष्प्रत्याशतया । कामीवेत्यनेनोपमानेन श्लेषानुगृहीतेनेर्ष्याविप्रलम्भो य
आकृष्टस्तस्य श्लेषोपमासहितस्याङ्गत्त्वम्, न केवलस्य । यद्यप्यत्र करुणो रसो
वास्तवोऽप्यस्ति तथापि स तच्चारुत्वप्रतीतौ न व्यापियत इत्यनेनाभिप्रायेण
श्लेषसहितस्येत्येतावदेवावोचत्, न तु करुणसहितस्येत्यपि । एतमर्थमपूर्वत्-
क्षिप्त— । कामी के पक्ष में अनादृत और अन्यत्र ( बाणाग्नि के पक्ष में ) झटका
गया । अवधूत, अर्थात् प्रत्यालिङ्गन द्वारा प्रत्यभिलषित न हुआ, अन्यत्र पक्ष में सभी
अङ्गों के झकझोरने से विशीर्ण किया गया । सजल नेत्र होना, एक जगह ईर्ष्या के
कारण और अन्यत्र प्रत्याशारहित होने के कारण । ‘कामी की भांति’ इस श्लेष
अलङ्कार-द्वारा अनुगृहीत उपमान से ईर्ष्याविप्रलम्भ, जो खिंचकर आता है, श्लेषोपमा
सहित वह ‘ईर्ष्याविप्रलम्भ’ यहाँ अङ्ग बन रहा है, अकेला नहीं। यद्यपि यहाँ करुणरस
भी वास्तव में है, लेकिन वह उस (विप्रलम्भ) के चारुत्व की प्रतीति के लिए, नहीं
लगता है, इस अभिप्राय से ‘श्लेषसहित’ इतना ही कहा है न कि ‘करुणसहित’ यह भी
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कर दिया है तब रसोपकारक होने मात्र से उसमें गौण ‘अलङ्कार’ का व्यवहार कथञ्चित्
मान लेना चाहिए ।
दूसरे लोग इसका समाधान यह देते हैं कि अलङ्कार का मुख्य लक्षण रसोपकारकत्व मात्र है
अतः रसवदलङ्कार में गौणरूप से ‘अलङ्कार’ का व्यवहार नहीं ।
‘काव्यप्रकाश’ में रसवदलङ्कारों को अलङ्कारों के प्रसंग में न रखकर गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रसंग
में निर्दिष्ट किया है ।
किन्तु ध्वनिकार और लोचनकार दोनों रसवदलङ्कारों को अलङ्कार के ही रूप में स्वीकार
द्वितीय उद्योतः २०७
ध्वन्यालोकः
इत्यत्र त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वे ईर्ष्याविप्रलम्भस्य
श्लेषसहितस्याङ्गभाव इति, एवंविध एव रसवदाद्यलङ्कारस्य न्याय्यो
यहाँ त्रिपुर-शत्रु (शिवजी) का अतिशय प्रभाव वाक्यार्थ (अङ्गी) है, और
श्लेषसहित ईर्ष्या विप्रलम्भ का अङ्गभाव है । इस प्रकार ही रसवद् आदि अलङ्कार का
लोचनम्
योत्प्रेक्षितं दृढीकर्तुमाह-एवंविध एवेति । अत एवेति । यतोऽत्र विप्रलम्भस्याल-
ङ्कारत्वं न तु वाक्यार्थता, अतो हेतोरित्यर्थः । न दोष इति । यदि ह्यन्यतरस्य
रसस्य प्राधान्यमभविष्यन्न द्वितीयो रसः समाविशेत् । रतिस्थायिभावत्वेन तु
सापेक्षभावो विप्रलम्भः, स च शोकस्थायिभावत्वेन निरपेक्षभावस्य करुणस्य
(कहा है)। अपूर्व ढंग से उत्प्रेक्षित इस बात को दृढ़ करने के लिए कहते हैं—इस
प्रकार ही— । इसी लिए— । अर्थात् जिस कारण यहाँ विप्रलम्भ का अलङ्कारत्व है,
न कि वाक्यार्थत्व है उस कारण । दोष नहीं है— । क्योंकि यदि दो में से किसी एक
रस का प्राधान्य होता तो दूसरा रस समावेश प्राप्त नहीं करता । ‘रति’ जिसका
स्थायिभाव है, इस कारण विप्रलम्भ सापेक्षभाव है और ‘शोक’ जिसका स्थायी है,
ऐसा करुण निरपेक्षभाव है, अतः करुण विप्रलम्भ से विरुद्ध ही है । इस प्रकार
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करते हैं। इन लोगों का पक्ष है कि ‘अलङ्कार’ का प्रधान कार्य है सुन्दरता का सम्पादन, ऐसी स्थिति
में रसादि को भी वस्तु की भाँति अलङ्कार मानने में कोई विरोध नहीं ।
फिर, ध्वनिकार की दृष्टि में गुणीभूतव्यङ्ग्य और रसवदादि के भेद के समन्वय के लिए यह
कहा जा सकता है कि रसादि ध्वनि के अपराङ्ग होने पर रसवत् और प्रेयोऽलङ्कार होंगे और वस्तु
या अलङ्कार ध्वनि के अपराङ्ग होने पर गुणीभूतव्यङ्ग्य होगा ।
द्वितीय मतभेद के अनुसार चेतन के वाक्यार्थीभूत होने पर रसादि-अलङ्कार का विषय और
अचेतन के वाक्यार्थीभाव में उपमादि अलङ्कार का विषय है। रसादि, चूँकि चित्तवृत्ति रूप होते
हैं, इसलिए अचेतन के वाक्यार्थीभाव की स्थिति में रसवदलङ्कार का विषय नहीं बन सकता। इस
मत के विरुद्ध ध्वनिकार ने आगे की पंक्तियों में स्वयं स्पष्ट कर दिया है ।
१. त्रिपुरदाह के वर्णन रूप प्रस्तुत पद्य में प्रधान रूप से शिवजी के प्रति कवि की भक्ति प्रकट
होती है, यद्यपि शिवजी का उत्साह त्रिपुरदाह के कार्य में प्रतीत होता है । किन्तु वह अनुभाव-
विभाव से परिपोष न प्राप्त करने के कारण ‘वीररस’ की स्थिति नहीं प्राप्त कर सका है। कामी
के उपमान से यहाँ श्लेषोपमा के साथ ईर्ष्याविप्रलम्भ रूप शृङ्गार की प्रतीति अङ्गरूप से होती है,
और साथ ही करुणरस भी प्रतीत होता है । ‘लोचन’ में ये सभी बातें स्पष्ट हो चुकी हैं । शृङ्गार
और करुण दोनों विरोधी रस हैं, अतः इनका एकत्र अवस्थान यद्यपि दोषपूर्ण माना गया है, परन्तु
प्रस्तुत में दोनों अङ्गरूप में अवस्थित हैं अतः यहाँ उनका विरोध अकिञ्चित्कर है । रसों के परस्पर
विरोध-अविरोध का विचार अन्यत्र ‘साहित्यदर्पण’ आदि ग्रन्थों से अवगत कर लेना चाहिए ।
शृङ्गार सर्वथा सापेक्ष-भाव है, क्योंकि इसका स्थायीभाव ‘रति’ दूसरे जन के विद्यमान रहने पर
ही हो सकती है और करुणरस का स्थायीभाव ‘शोक’ है उसमें प्रिय के विद्यमान रहने की अपेक्षा
नहीं, अतः निरपेक्ष-भाव है, अतएव दोनों का परस्पर विरोध माना जाता है । चूँकि स्वयं
२०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः विषयः । अत एव चेर्ष्याविप्रलम्भकरणयोरङ्गत्वेन व्यवस्थानात्समा- वेशो न दोषः । यत्र हि रसस्य वाक्यार्थीभावस्तत्र कथमलङ्कारत्वम् ? अलङ्कारो हि चारुत्वहेतुः प्रसिद्धः; न त्वसावात्मैवात्मनश्चारुत्वहेतुः । तथा चायमत्र संक्षेपः— रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् । अलङ्कृतीनां सर्वासामलङ्कारत्वसाधनम् ॥ विषय उचित है। इसी लिए ईर्ष्या विप्रलम्भ और करुण के अङ्ग रूप से व्यवस्थित होने से कोई दोष नहीं है। क्योंकि जहाँ रस का वाक्यार्थीभाव ( प्राधान्य ) है वहाँ कैसे ( उसका ) अलङ्कारत्व होगा ? क्योंकि अलङ्कार चारुत्व के हेतु के रूप में प्रसिद्ध है, वह स्वयं अपने से अपने चारुत्व का हेतु नहीं है। और इस प्रकार यहाँ संक्षेप है— रस, भाव आदि के तात्पर्य का आश्रयण करके सभी अलङ्कारों का रखना उनके अलङ्कारत्व का साधन है।
लोचनम् विरुद्ध एव । एवमलङ्कारशब्दप्रसङ्गेन समावेशं प्रसाध्य एवंविध एवेति यदुक्तं तत्रैवकारस्याभिप्रायं व्याचष्टे—यत्र हीति । सर्वासामुपमादीनाम् । अयं भावः—उपमादीनामलङ्कारत्वे यादृशी वार्ता तादृश्येव रसादीनाम् । तदवश्यमन्येनालङ्कार्येण भवितव्यम् । तच्च यद्यपि वस्तुमात्रमपि भवति, तथापि तस्य पुनरपि विभावादिरूपतापर्यवसानाद्रसादितात्पर्यमेवेति सर्वत्र रसध्वनेरेवात्मभावः । तदुक्तं—रसभावादितात्पर्यमिति । तस्येति । प्रधानस्यात्म- 'अलङ्कार' शब्द के प्रसङ्ग से समावेश की बात तय करके 'इस प्रकार ही' यह जो कहा है उसके 'ही' कहने के अभिप्राय की व्याख्या करते हैं—क्योंकि जहाँ— । सभी उपमा आदि का । भाव यह है—उपमा आदि के अलङ्कार होने में जो बात है वही रसादि के ( अलङ्कार होने में है )। इस लिए अवश्य कोई अन्य अलङ्कार्य होना चाहिए। और वह ( अलङ्कार्य ) यद्यपि वस्तुमात्र भी हो सकता है, तथापि उसके पुनः भी विभावादि- रूपता में पर्यवसान होने के कारण, रसादि तात्पर्य ही सिद्ध होता है ऐसी स्थिति में सर्वत्र 'रसध्वनि' का ही आत्मत्व है। इसलिए कहा है—रस, भाव आदि के तात्पर्य० ।
ये दोनों प्रधान न होकर किसी तीसरे के अङ्ग हैं, अतः इनका विरोध एकत्र अवस्थान में भी नहीं है। यहाँ यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि शृङ्गार या करुण यहाँ परिपुष्ट न होने के कारण परिपूर्ण रस की स्थिति में नहीं हैं, उनका यहाँ गौण व्यवहार है। यहाँ दोनों भावरूप हैं।
द्वितीय उद्योतः २०९ ध्वन्यालोकः तस्माद्यत्र रसादयो वाक्यार्थीभूताः स सर्वो न रसादेरलङ्कारस्य विषयः; स ध्वनेः प्रभेदः, तस्योपमादयोऽलङ्काराः । यत्र तु प्राधान्ये- नार्थान्तरस्य वाक्यार्थीभावे रसादिभिश्चारुत्वनिष्पत्तिः क्रियते, स रसा- देरलङ्कारताया विषयः । इस लिए जहाँ रसादि वाक्यार्थ हैं, वह रसादि अलङ्कार का विषय नहीं है, बल्कि वह 'ध्वनि' का प्रभेद है, उसके उपमादि अलङ्कार हैं । और जहाँ प्रधान रूप से अर्थान्तर के वाक्यार्थ हो जाने पर रसादि द्वारा चारुत्व की निष्पत्ति की जाती है, वह रसादि की अलङ्कारता का विषय है । लोचनम् भूतस्य । एतदुक्तं भवति-उपमया यद्यपि वाच्योऽर्थोऽलङ्क्रियते, तथापि तस्य तदेवालङ्करणं यद्व्यङ्ग्यार्थाभिव्यञ्जनसामर्थ्याधानमिति वस्तुतो ध्वन्यात्मैवा- लङ्कार्यः । कटककेयूरादिभिरपि हि शरीरसमवायिभिश्चेतन आत्मैव तत्तच्चित्त- वृत्तिविशेषौचित्यसूचनात्तयालङ्क्रियते । तथाहि-अचेतनं शवशरीरं कुण्ड- लाद्युपेतमपि न भाति, अलङ्कार्यस्याभावात् । यतिशरीरं कटकादियुक्तं हास्या- वहं भवति, अलङ्कार्यस्यानौचित्यात् । न हि देहस्य किञ्चिदनौचित्यमिति वस्तुत आत्मैवालङ्कार्यः, अहमलङ्कृत इत्यभिमानात् । रसादेरलङ्कारताया इति । व्यधिकरणषष्ठ्यौ, रसादेर्यालङ्कारता तस्याः स एव विषयः । एतदनुसारेणैव पूर्वत्रापि वाक्ये योज्यम्, रसादिकर्तृकस्यालङ्करणक्रियात्मनो विषय इति । उसका- । प्रधान, आत्मभूत का । बात यह कही गई-उपमा से यद्यपि वाच्य अर्थ अलङ्कृत होता है तथापि उस वाच्यार्थ का वही अलङ्करण है जो व्यङ्ग्य अर्थ के अभिव्यञ्जन-सामर्थ्य का आधान है, इस प्रकार वस्तुतः ध्वनि रूप ही अलङ्कार्य है ( वाच्यार्थ रूप नहीं ) । क्योंकि शरीर के साथ सम्बन्ध रखने वाले कटक, केयूर आदि अलङ्कार भी उस-उस विशेष चित्तवृत्ति के औचित्य के सूचक होने के कारण ( क्योंकि जैसे किसी युवक के शरीर के अलङ्कार उसके चित्त के रागी होने के औचित्य के सूचक होते हैं, इसी प्रकार किसी साधु के दण्ड-कमण्डल आदि उसके विराग के सूचक होते हैं ) चेतनस्वरूप आत्मा को ही अलंकृत करते हैं । जैसा कि-चेतनारहित शव-शरीर कुण्डल आदि अलङ्कारों से युक्त होकर भी नहीं शोभता, क्योंकि उसमें अलङ्कार्य ( आत्मा ) का अभाव है और साधु का शरीर कटक आदि अलङ्कारों से युक्त होकर खिल्ली का पात्र बनता है, क्योंकि अलङ्कार्य का वहाँ औचित्य नहीं है ( वहाँ तो दण्ड-कमण्डल का ही रहना उचित है ) । शरीर का कोई अनौचित्य नहीं । इस प्रकार वस्तुतः आत्मा ही अलङ्कार्य है, क्योंकि यह अभिमान होता है कि 'मैं अलङ्कृत हूँ' । 'रसादि की अलङ्कारता का' यहाँ व्यधिकरण षष्ठी विभक्ति है अर्थात् रसादि की जो अल- १४ ध्व०
२१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एवं ध्वनेरुपमादीनां रसवदलङ्कारस्य च विभक्तविषयता भवति । इस प्रकार ध्वनि, उपमा आदि और रसवद् अलङ्कारों का अलग-अलग विषय लोचनम् एवमिति । अस्मदुक्तेन विषयविभागेनेत्यर्थः । उपमादीनामिति । यत्र रसस्या- लङ्कार्यता रसान्तरं चाङ्गभूतं नास्ति तत्र शुद्धा एवोपमादयः । तेन संसृष्ट्या नोपमादीनां विषयापहार इति भावः । रसवदलङ्कारस्य चेति । अनेन भावाद्य- लङ्कारा अपि प्रेयस्वूर्जस्विसमाहिता गृह्यन्ते । तत्र भावालङ्कारस्य शुद्धस्यो- दाहरणं यथा— तव शतपत्रपत्रमृदुताम्रतलश्चरणश्चलकलहंसनूपुरकलध्वनिना मुखरः । महिषमहासुरस्य शिरसि प्रसभं निहितः कनकमहामहीध्रगुरुतां कथमम्ब गतः ॥ इत्यत्र देवीस्तोत्रे वाक्यार्थीभूते वितर्कविस्मयादिभावस्य चारुत्वहेतुतेति तस्याङ्गत्वान्द्भावालङ्कारस्य विषयः । रसाभासस्यालङ्कारता यथा ममैव स्तोत्रे— समस्तगुणसम्पदः सममलङ्क्रियाणां गणै- र्भवन्ति यदि भूषणं तव तथापि नो शोभसे । शिवं हृदयवल्लभं यदि यथा तथा रञ्जये- स्तदेव ननु वाणि ! ते भवति सर्वलोकोत्तरम् ॥ ङ्कारता वही विषय । इसी के अनुसार पहले वाक्य में भी योजना कर लेनी चाहिए— रसादिकर्तृक अलङ्करण क्रिया का विषय । इस प्रकार—अर्थात् जैसा कि हमने विषय-विभाग कहा है । उपमा आदि—। जहाँ रस की अलङ्कार्यता और रसान्तर अङ्गभूत नहीं होता उपमा आदि शुद्ध ही अलङ्कार हैं । इसलिए भाव यह कि संसृष्टि से उपमा आदि का विषयापहार ( उच्छेद ) नहीं । और रसवद् अलङ्कार का—। इससे प्रेयस्वि, ऊर्जस्वि, समाहित ( आदि ) भावालङ्कार भी गृहीत होते हैं। उनमें शुद्ध 'भावालङ्कार' का उदाहरण, जैसे— 'हे अम्ब, कमल के पत्र के समान कोमल एवं रक्त तलभाग वाला, चंचल कलहंस की भाँति नूपुर की आवाज से मुखर, तुम्हारा चरण महिषासुर के सिर पर बलात् रखा हुआ, कैसे सुमेरु महापर्वत की गुरुता को प्राप्त किया ? यहाँ देवी का स्तोत्र प्रधान वाक्यार्थ है और वितर्क, विस्मय आदि भाव उसके चारुत्व के हेतु हैं, इस प्रकार उस ( वाक्यार्थ रूप स्तोत्र ) के अङ्ग होने के कारण 'भावालङ्कार' का विषय है। 'रसाभास' की अलङ्कारता, जैसे मेरे ही ( रचे ) स्तोत्र में— हे वाणि, अलङ्कारों के साथ समस्त गुणों की सम्पत्तियाँ यदि तुम्हारा भूषण बनें तब भी तुम्हारी शोभा नहीं, यदि तुम जिस-किसी प्रकार मनभाये भगवान् शिव को प्रसन्न करो तभी तुम्हारा सब से लोकोत्तर भूषण हो ।
द्वितीय उद्योतः २११ ध्वन्यालोकः यदि तु चेतनानां वाक्यार्थीभावो रसाद्यलङ्कारस्य विषय इत्युच्यते तर्ह्युपमादीनां प्रविरलविषयता निर्विषयता वाभिहिता स्यात् । यस्मा- दचेतनवस्तुवृत्ते वाक्यार्थीभूते पुनश्चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनया यथाकथ- सिद्ध होता है। अगर यदि चेतन पदार्थों का वाक्यार्थीभाव रसादि-अलङ्कार का विषय है, यह कहते हैं तो उपमा आदि अलङ्कार का जहाँ-कहीं ही (अर्थात् बहुत कम) विषय मिलेंगे, अथवा उनका कोई विषय ही न रह जायगा। क्योंकि जहाँ अचेतन वस्तु का वृत्तान्त मुख्य वाक्यार्थ है वहाँ (विभावादि की प्रक्रिया से) लोचनम् अत्र हि परमेशस्तुतिमात्रं वाचः परमोपादेयमिति वाक्यार्थे शृङ्गाराभासश्चा- रुत्वहेतुः श्लेषसहितः । न ह्ययं पूर्णः शृङ्गारो नायिकाया निर्गुणत्वे निरलङ्कारत्वे च भवति । ‘उत्तमयुवप्रकृतिरुज्ज्वलवेषात्मकः’ इति चाभिधानात् । भावाभा- साङ्गता यथा— स पातु वो यस्य हतावशेषास्तत्तुल्यवर्णाञ्जनरञ्जितेषु । लावण्ययुक्तेष्वपि वित्रसन्ति दैत्याः स्वकान्तानयनोत्पलेषु ॥ अत्र रौद्रप्रकृतीनामनुचितस्त्रासो भगवत्प्रभावकारणकृत इति भावाभासः । एवं तत्प्रशमस्याङ्गत्वमुदाहार्यम् । मे मतिरित्येनेन यत्परमतं सूचितं तद्दूषण- मुपन्यस्यति–यदीत्यादिना । परस्य चायमाशयः--अचेतनानां चित्तवृत्तिरूपर- साद्यसम्भवात्तद्वर्णने रसवदलङ्कारस्यानाशङ्क्यत्वात्तद्विभक्त एवोपमादीनां विषय इति । एतद् दूषयति–तर्हीति । तस्माद्वचनाद्धेतोरित्यर्थः । नन्वचेतन- यहाँ ‘परमेश्वर (शिव जी) की स्तुतिमात्र वाणी का परम उपादेय है’ इस वाक्यार्थ में श्लेष-सहित शृङ्गाराभास चारुत्व का हेतु है। नायिका के निर्गुण और निरलङ्कार होने पर शृङ्गारपूर्ण नहीं है, (अपितु आभासमात्र है), क्योंकि कहा है ‘उज्ज्वल वेषवाले उत्तम प्रकृति के युवति और युवक होते हैं’। ‘भावाभास’ की अङ्गता, जैसे— वह भगवान् कृष्ण आपकी रक्षा करें, जिसके द्वारा मारे जाने से बचे हुए दैत्य उन (कृष्ण) के सदृश कृष्ण वर्ण के अंजन से रञ्जित, अपनी पत्नियों के लावण्ययुक्त भी नेत्रकमलों से डरते रहते हैं। यहाँ रौद्र प्रकृति वाले दैत्यों का त्रास अनुचित है, (किन्तु) वह भगवान् के प्रभाव के कारण है, इस लिए ‘भावाभास’ है। इसी प्रकार ‘भावप्रशम’ का भी उदाहरण कर लेना चाहिए। ‘मेरी मति है’ इस कथन से जो परमत को सूचित किया है उसका दोष उपन्यस्त करते हैं—अगर—इत्यादि द्वारा। दूसरे का यह आशय है—‘अचेतन पदार्थों का चित्तवृत्ति रूप रसादि सम्भव न होने के कारण, उनके वर्णन में रसवद् अलङ्कार के अनाशङ्क्य होने से रसवद् अलङ्कार से अलग ही उपमादि अलङ्कारों का विषय है।’ इसमें दोष देते हैं—तो—। अर्थात् उस कथन के
२१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्चिद्भवितव्यम् । अथ सत्यामपि तस्यां यत्राचेतनानां वाक्यार्थीभावो नासौ रसवदलङ्कारस्य विषय इत्युच्यते । तत् महतः काव्यप्रबन्धस्य रसनिधानभूतस्य नीरसत्वमभिहितं स्यात् । यथा— तरङ्गभ्रूभङ्गा क्षुभितविहगश्रेणिरशना विकर्षन्ती फेनं वसनमिव संरम्भशिथिलम् । यथाविद्धं याति स्खलितमभिसन्धाय बहुशो नदीरूपेणेयं ध्रुवमसहना सा परिणता ॥ चेतन वस्तु-वृत्तान्त की योजना किसी प्रकार होनी चाहिए । अगर यदि उस ( चेतन- वृत्तान्त की योजना ) के होने पर भी जहाँ अचेतनों का वाक्यार्थीभाव है, वहाँ रसवदलङ्कार नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं तो बहुत बड़े एवं रस के निधान रूप काव्य-भाग की नीरसता अभिहित होती है । जैसे— तरंगें जिसकी भ्रूभङ्ग हैं, खलबल पक्षि-समुदाय ( की आवाज ) जिसकी काञ्ची है, रगड़ से ढीले पड़े वस्त्र की भाँति फेन को धारण करती हुई एवं बहुत बार स्खलन को प्राप्त कर कुटिल चाल से चलती हुई वह निश्चय ही नदी के रूप से ( मुझ पर ) कोपवती हो गई है । लोचनम् वर्णनं विषय इत्युक्तमित्याशङ्क्य हेतुमाह—यस्मादिति । यथाकथञ्चिदिति विभावादिरूपतया । तस्यामिति । चेतनवृत्तान्तयोजनायाम् । नीरसत्वमिति । यत्र हि रसस्तत्रावश्यं रसवदलङ्कार इति परमतम् । ततो न रसवदलङ्कारश्चेन्नूनं तत्र रसो नास्तीति परमताभिप्रायान्नीरसत्वमुक्तम् । न त्वस्माकं रसवदलङ्का- राभावे नीरसत्वम्, अपि तु ध्वन्यात्मभूतरसाभावे, तादृक्च रसोऽत्रास्त्येव । तरङ्गेति । तरङ्गा एव भ्रूभङ्गा यस्याः । विकर्षन्ती विलम्बमानं बलादाक्षि- कारण । ‘अचेतन का वर्णन विषय है’ यह आशङ्का करके हेतु कहते हैं—जिस कारण—। जिस किसी प्रकार अर्थात् विभावादि के प्रकार से । ‘उसमें’ अर्थात् चेतन पदार्थ के वृत्तान्त की योजना में । नीरसत्व—। दूसरे का यह मत है कि जहाँ रस है वहाँ अवश्य रसवद् अलङ्कार है । ऐसी स्थिति में जहाँ रसवद् अलङ्कार न हो वह रस नहीं है इस दूसरे के मत के अभिप्राय से ‘नीरसत्व’ कहा गया । लेकिन हमारे मत में रसवद् अलङ्कार के अभाव में ‘नीरसत्व’ नहीं है, अपितु ‘ध्वनि’ के आत्मा रूप रस के अभाव में ( नीरसत्व है ), उस प्रकार का रस यहाँ है ही । तरंगें—तरङ्ग ही हैं भ्रूभङ्ग जिसके । विकर्षण करती हुई फैले हुए को बल-