भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 680 में से

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पृष्ठ 248

१८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः रसादिरर्थो हि सहेव वाच्येनावभासते । स चाङ्गित्वेनावभासमानो ध्वनेरात्मा । रसादि रूप अर्थ वाच्य के साथ हीसा प्रतीत होता है । और वह अङ्गी (प्रधान) रूप से प्रतीत होता हुआ ध्वनि का आत्मा (स्वरूप) है । लोचनम् नैरेकरससम्मूर्च्छितामोदोपभोगेऽपि शुद्धमास्यादिप्रयुक्तमिदं सौरभमिति । रसध्वनिस्तु स एव योऽत्र मुख्यतया विभावानुभावव्यभिचारिसंयोजनोदित- स्थायिप्रतिपत्तिकस्य प्रतिपत्तुः स्थाय्यंशचर्वणाप्रयुक्त एवास्वादप्रकर्षः । यथा— कृच्छ्रेणोरुयुगं व्यतीत्य सुचिरं भ्रान्त्वा नितम्बस्थले मध्येऽस्यास्त्रिवलीतरङ्गविषमे निःष्पन्दतामागता । मद्दृष्टिस्तृषितेव सम्प्रति शनैरारुह्य तुङ्गौ स्तनौ साकाङ्क्षं मुहुरीक्षते जललवप्रस्यन्दिनी लोचने ॥ अत्र हि नायिकाकारानुवर्ण्यमानस्वात्मप्रतिकृतिपवित्रितचित्रफलकावलो- कनाद्वत्सराजस्य परस्परास्थाबन्धरूपो रतिस्थायिभावो विभावानुभावसंयोज- नवशेन चर्वणारूढ इति । तदलं बहुना१! स्थितमेतत्-रसादिरर्थोऽङ्गित्त्वेन भास- मानोऽसंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यस्य ध्वनेः प्रकार इति । सहेवेति । इवशब्देनासंलक्ष्यता विद्यमानत्वेऽपि क्रमस्य व्याख्याता । वाच्येनेति । विभावानुभावादिना । उपभोग में भी कहते हैं कि यह गन्ध शुद्ध मांसी (एक प्रकार का गन्ध द्रव्य) आदि से तैयार है । रसध्वनि तो वही है जो यहाँ मुख्य रूप से विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी के संयोग से उत्पन्न स्थायी भाव की प्रतिपत्ति या ज्ञान वाले ज्ञाता या सहृदय का स्थायी के अंश की चर्वणा के कारण ही प्रकृष्ट आस्वाद है । जैसे— ‘प्यासी हुई सी मेरी दृष्टि कठिनाई से प्रिया के ऊरुयुगल को पार कर, नितम्ब के स्थल में देर तक भ्रमण कर, इसके त्रिवली की तरङ्गों से विषम मध्यभाग में निश्चलभाव को प्राप्त कर गई, अब इन उन्नत स्तनों पर धीरे से चढ़ कर हसरत के साथ अश्रुजल को बरसने वाली आँखों को बार-बार देख रही है ।’ यहाँ, नायिका (रत्नावली) के आकार रूप चित्र से देखी गई अपनी प्रतिकृति (चित्र) से पवित्र हुए फलक को देखने के कारण वत्सराज (उदयन) का परस्पर आस्थारूप रति-स्थायिभाव विभाव और अनुभाव के संयोजन के कारण चर्वणा की स्थिति तक आरूढ हो गया है । बहुत कहने से फायदा नहीं ! बात यह हुई—रसादि अर्थ अङ्गी या प्रधान रूप से भासमान होकर असंलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य ध्वनि का प्रकार है । साथ१ जैसा— । ‘जैसा’ या ‘सा’ (इव) शब्द से क्रम के रहते हुए भी उसका संलक्ष्यता व्याख्यान की गई है । वाच्य के साथ— । अर्थात् विभाव, अनुभाव आदि के साथ । १. वृत्तिग्रन्थ के ‘सहेव’ का ‘निर्णयसागर’ के संस्करण का पाठ ‘सहैव’ है। इसके अनुसार

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