भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 680 में से

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पृष्ठ 247

द्वितीय उद्योतः १८७ लोचनम् विषयः । यथा रावणकाव्याकर्णने शृङ्गाराभासः । यद्यपि ‘शृङ्गारानुकृतिर्या तु स हास्यः’ इति मुनिना निरूपितं तथाप्यौत्तरकालिकं तत्र हास्यरसत्वम् । दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि याते श्रुतिं चेतः कालकलामपि प्रकुरुते नावस्थितिं तां विना । इत्यत्र तु न हास्यचर्वणावसरः । ननु नात्र रतिः स्थायिभावोऽस्ति । परस्परास्थाबन्धाभावात् केनैतदुक्तं रतिरिति । रत्याभासो हि सः । अतश्चा- भासता येनास्य सीता मय्युपेक्षिका द्विष्ठा वेति प्रतिपत्तिर्हृदयं न स्पृशत्येव । तत्स्पर्शे हि तस्याप्यभिलाषो विलीयेत । न च मयीयमनुरक्तेत्यपि निश्चयेन कृतं, कामकृतान्मोहात् । अत एव तदाभासत्वं वस्तुतस्तत्र स्थाप्यते शुक्तौ रजता- भासवत् । एतच्च शृङ्गारानुकृतिशब्दं प्रयुञ्जानो मुनिरपि सूचितवान् । अनुकृ- तिरमुख्यता आभास इति ह्येकोऽर्थः । अत एवाभिलाषे एकतरनिष्ठेऽपि शृङ्गा- रशब्देन तत्र तत्र व्यवहारस्तदाभासतया मन्तव्यः । शृङ्गारेण वीरादीनामप्या- भासरूपतोपलक्षितैव । एवं रसध्वनेरेवामी भावध्वनिप्रभृतयो निष्यन्दाः । आस्वादे प्रधानं प्रयोजकमेवमंशं विभज्य पृथग्व्यवस्थाप्यते । यथा गन्धयुक्ति- इस प्रकार रसाभास का विषय होगा । जैसे रावणकाव्य के श्रवण करने में शृङ्गाराभास होगा । यद्यपि भरत मुनि ने निरूपण किया है कि ‘जो शृङ्गार का अनुकरण हो उसे हास्य कहना चाहिए’, तथापि हास्यरस की स्थिति ( शृङ्गार के ) उत्तर काल में होती है । ‘दूर ही से आकर्षण कर लेने वाले मोहमन्त्र की भाँति उसके नाम के कान में प्रवेश करते ही चित्त थोड़ी देर भी उसके बिना नहीं ठहर पाता है ।’ यहाँ हास्यरस की चर्वणा का अवसर नहीं है । जब कि रति स्थायिभाव यहाँ नहीं है क्योंकि एक-दूसरे के प्रति ( परस्पर ) आस्था बन्ध का अभाव है फिर किसने कहा कि यह रति है ? क्योंकि वह रत्याभास है । इस कारण से भी रति की आभासता जाहिर होती है कि रावण के हृदय को यह ज्ञान छू तक नहीं सका है, कि सीता मेरे प्रति उपेक्षा का भाव रखती है या द्वेष का । यदि उसे ऐसा ज्ञान होता तो उसका अभिलाष विलीन हो जाता । ‘मुझ में यह अनुरक्त है’ यह निश्चय भी नहीं है, क्योंकि कामजनित मोह हो चुका है । इसलिए रति की आभासता को वस्तुतः वहाँ स्थापित करते हैं, जैसे शुक्ति में रजत का आभास होता है । इसे ‘शृङ्गार की अनुकृति’ इस शब्द का प्रयोग करते हुए मुनि ने भी सूचित कर दिया है । अनुकृति, अमुख्यता और आभास एक ही अर्थ है । इस लिए अभिलाष जब किसी एक ( पक्ष ) में ही रहे, तब ‘शृङ्गार’ शब्द से व्यवहार उसके आभास के रूप में मानना चाहिए । एक शृङ्गार के कहने से वीर आदि रसों की भी आभासरूपता उपलक्षित ही है । इस प्रकार ये भावध्वनि प्रभृति रसध्वनि के ही निष्यन्द हैं । आस्वाद के इस प्रकार प्रधान अंश को विभक्त करके अलग व्यवस्थापित करते हैं । जिस प्रकार गन्ध योजना की कला के जानकार लोग एक रस के आस्वाद से व्याप्त आमोद ( गन्ध ) के