ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तेनामृतरसनिगरणविश्रान्तिपरम्पराणां तृप्तिर्ज्ञातेति कोपप्रसादसन्धिश्चमत्कार- स्थानम् । क्वचिद्व्यभिचार्यन्तरशबलतैव विश्रान्तिपदम् । यथा— काकार्यं शशलक्ष्मणः क्व च कुलं भूयोऽपि दृश्येत सा दोषाणां प्रशमाय मे श्रुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् । किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा चेतः स्वास्थ्यमुपैहि कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ॥ अत्र हि वितर्कौत्सुक्ये मतिस्मरणे शङ्कादैन्ये धृतिचिन्तने परस्परं बाध्य- बाधकभावेन द्वन्द्वशो भवन्ती, पर्यन्ते तु चिन्ताया एव प्रधानतां ददती परमास्वादस्थानम् । एवमन्यदप्युत्प्रेक्ष्यम् । एतानि चोदयसन्धिशबलत्वादि- कानि कारिकायामादिग्रहणेन गृहीतानि । नन्वेवं विभावानुभावमुखेनाप्यधिकश्चमत्कारो दृश्यत इति विभावध्वनिरनु- भावध्वनिश्च वक्तव्यः । मैवम्; विभावानुभावौ तावत्स्वशब्दवाच्यावेव । तच्च- र्वणापि चित्तवृत्तिष्वेव पर्यवस्यतीति रसभावेभ्यो नाधिकं चर्वणीयम् । यदा तु विभावानुभावावपि व्यङ्ग्यौ भवतस्तदा वस्तुध्वनिरपि किं न सह्यते । यदा तु विभावाभासाद्रत्याभासोदयस्तदा विभावानुभासाच्चर्वणाभास इति रसाभासस्य विश्रान्ति अर्थात् आनन्द की परम्पराओं की तृप्ति को जान लिया’ इस प्रकार कोप और प्रसाद की सन्धि चमत्कार का स्थान है । कहीं पर व्यभिचारी का एक-दूसरे व्यभिचारी में मिल जाना (शबलता) ही विश्रान्ति (आनन्द) का पद (प्रतिष्ठान) होता है । जैसे— (यह ब्राह्मण-कन्या में आसक्ति रूप) अकार्य (गलत कार्य) कहाँ और चन्द्र का वंश कहाँ ? काश, वह फिर और भी दिख जाती ! मैंने दोषों के शमन करने के लिए शास्त्र पढ़ा है, अहो ! उसका मुख कोप की अवस्था में भी सुन्दर लगता है; मालिन्य से रहित एवं सुन्दर आचरण वाले लोग क्या कहेंगे ? वह स्वप्न में भी दुर्लभ है; हे चित्त, तू धीरज धारण कर, कौन धन्य युवक होगा जो उसके अधर का पान करेगा ? यहाँ, वितर्क और औत्सुक्य, मति और स्मरण, शङ्का और दैन्य, धृति और चिन्तन भाव परस्पर बाध्य-बाधक रूप में रहते हुए पर्यन्त में चिन्ता को प्रधान करते हुए परम आस्वाद के प्रतिष्ठान हैं । इसी प्रकार और की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिए । ये उदय, सन्धि, शबलता आदि कारिका में ‘आदि’ शब्द से ग्रहण किए गए हैं । शङ्का है कि इस प्रकार विभाव और अनुभाव के प्रकार से भी अधिक चमत्कार देखा जाता है, ऐसी स्थिति में विभावध्वनि और अनुभावध्वनि को कहना चाहिए ! उत्तर है कि, ऐसा नहीं; विभाव और अनुभाव अपने शब्द से ही वाच्य होते हैं, उनकी चर्वणा भी चित्तवृत्तियों में ही पर्यवसित होती है, इस लिए रस और भावों से अधिक (दूसरा) चर्वणा के योग्य नहीं है । जब कि विभाव और अनुभाव व्यङ्ग्य होते हैं, तब वस्तुध्वनि को क्यों नहीं मान लेते हैं ? जब कि विभावाभाव से रत्याभास का उदय होगा तब विभाव के भी साथ भासित होने के कारण चर्वणाभास होगा;