भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 680 में से

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पृष्ठ 245

द्वितीय उद्योतः १८५ लोचनम् माभिमुख्येन चरन्तीति व्यभिचारिणः' इति। तत्रोदयावस्थाप्रयुक्तः कदा- चित्। यथा— याते गोत्रविपर्यये श्रुतिपथं शय्यामनुप्राप्तया निर्ध्यांतं परिवर्तनं पुनरपि प्रारब्धुमङ्गीकृतम्। भूयस्तत्प्रकृतं कृतं च शिथिलक्षिप्तैकदोर्लेखया तन्वङ्ग्या न तु पारितः स्तनभरः क्रष्टुं प्रियस्योरसः॥ अत्र हि प्रणयकोपस्योज्जिगमिषतैव यदवस्थानं न तु पारित इत्युदयाव- काशनिराकरणात्तदेवास्वादजीवितम्। स्थितिः पुनरुदाहृता—'तिष्ठेत्कोपवशात्' इत्यादिना। क्वचित्तु व्यभिचारिणः प्रशमावस्थया प्रयुक्तश्चमत्कारः। यथोदा- हृतं प्राक् 'एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया' इति। अयं तत्प्रशम इत्युक्तः। अत्र चेर्ष्याविप्रलम्भस्य रसस्यापि प्रशम इति शक्यं योजयितुम्। क्वचित्तु व्यभिचा- रिणः सन्धिरेव चर्वणास्पदम्। यथा— ओसुरु सुम्ठि आइं मुहु चुम्बिअं जेण। अमिअरसघोण्टाणं पडिजाणिअं तेण॥ इत्यत्र श्रुत्युक्ते तु कोपे कोपकषायगद्गदमन्दरुदिताया येन मुखं चुम्बितं स्थिति और अपाय। जो कि कहते हैं—'विविध प्रकार (अर्थात् तीन प्रकार से) अभिमुख रूप से चरण करते हैं, अतः व्यभिचारी कहे जाते हैं'। उनमें कभी उदयावस्था से प्रयुक्त व्यभिचारी भाव होता है, जैसे— सेज पर आई कृश अङ्गों वाली (नायिका) ने गोत्रविपर्यय (प्रिय द्वारा दूसरी नायिका के नामोच्चारण) कर दिए जाने पर सोचा कि करवट बदल ले और फिर करवट बदलना आरम्भ किया, फिर करवट बदलने का प्रयत्न किया, लेकिन एक हाथ को शिथिल करके अलग हटाया, किन्तु प्रिय के वक्ष से अपने स्तन के भार को खींच न पाई। यहाँ नायिका का प्रणय-कोप उदय लेना ही चाहता है, ऐसी स्थिति को प्राप्त है 'नहीं वह खींच पाई' इस कथन द्वारा उसके हृदय के अवकाश का निराकरण कर देने से वही (उदय लेने की स्थिति में अवस्थान) आस्वाद का प्राण है। 'स्थिति' का उदाहरण दे चुके हैं—'तिष्ठेत् कोपवशात्०' इत्यादि से। कहीं पर व्यभिचारी भाव की प्रशम अवस्था से प्रयुक्त चमत्कार होता है। जैसा कि पहले उदाहरण दे चुके हैं—'एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया०।' यह व्यभिचारी भाव का प्रशम कहा गया है। यहाँ ईर्ष्याविप्रलम्भ रस का प्रशम है, ऐसी योजना कर सकते हैं। कहीं पर तो व्यभिचारी भाव की सन्धि ही चर्वणा (आस्वाद) प्रतिष्ठान होती है। जैसे— ईर्ष्याजनित अश्रु से शोभित नायिका के मुख को जिसने चुम्बन किया है, उसने अमृत-रस के निगलने (रुक-रुक कर पीने) की तृप्ति को जान लिया। (?) यहाँ 'ईर्ष्या' शब्द से अभिहित कोप में 'कोप के मिश्रण से गद्गद एवं मंद-मंद रोती हुई नायिका के मुख को जिसने चुम्बन किया उसने अमृतरस के निगलने की