भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 680 में से

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पृष्ठ 244

१८४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् त्वक्रम एव सः । क्रमत्वमपि हि तस्य कदाचिद्भवति । तदा चार्थशक्त्युद्द्भवा- नुस्वानरूपभेदेतेति वक्ष्यते । आत्मशब्दः स्वभाववचनः प्रकारमाह । तेन रसादिर्योऽर्थः स ध्वनेरक्रमो नाम भेदः । असंलक्ष्यक्रम इति यावत् । ननु किं सर्वदैव रसादिरर्थो ध्वनेः प्रकारः ? नेत्याह; किं तु यदाङ्गित्वेन प्रधानत्वे- नावभासमानः । एतच्च सामान्यलक्षणे 'गुणीकृतस्वार्थावि'त्यत्र यद्यपि निरू- पितम्, तथापि रसवदाद्यलङ्कारप्रकाशनावकाशदानायानूदितम् । स च रसा- दिर्ध्वनिर्व्यवस्थित एव; न हि तच्छून्यं काव्यं किञ्चिदस्ति । यद्यपि च रसेनेव सर्वं जीवति काव्यम्, तथापि तस्य रसस्यैकघनचमत्कारात्मकस्यापि कुतश्चिदं- शात्प्रयोजकीभूतादधिकोऽसौ चमत्कारो भवति । तत्र यदा कश्चिदुद्रिक्तावस्थां प्रतिपन्नो व्यभिचारी चमत्कारातिशयप्रयोजको भवति, तदा भावध्वनिः । यथा- तिष्ठेत्कोपवशात्प्रभावपिहिता दीर्घं न सा कुप्यति स्वर्गायोत्पतिता भवेन्मयि पुनर्भावार्द्रमस्या मनः । तां हर्तुं विबुधद्विषोऽपि न च मे शक्ताः पुरोवर्तिनीं सा चात्यन्तमगोचरं नयनयोर्यातेति कोऽयं विधिः ॥ अत्र हि विप्रलम्भरससद्भावेऽपीति वितर्काख्यव्यभिचारिचमत्क्रियाप्रयुक्त आस्वादातिशयः । व्यभिचारिण उदयस्थित्यपायत्रिधर्मकाः । यदाह—'विविध- ध्वनि का आत्मा है, न कि वह अक्रम ही है, क्योंकि उसका कभी क्रमत्व भी होता है । तब अर्थ रूप शक्ति से उत्पन्न अनुरणन रूप भेद होता है, यह कहेंगे । स्वभाव के अर्थ में 'आत्मा' शब्द प्रकार बताता है । उससे, रसादि रूप जो अर्थ है वह ध्वनि का अक्रम नामक भेद है, अर्थात् असंलक्ष्यक्रम है । शङ्का है कि क्या रसादि अर्थ हमेशा ही ध्वनि का प्रकार है ? उत्तर में कहते हैं कि, नहीं । किन्तु जब अङ्गी या प्रधान रूप से प्रतीत होता है, ( तब ध्वनि का प्रकार है) । इस बात को यद्यपि ( ध्वनि के ) सामान्य लक्षण में 'गुणीकृतस्वार्थों०' इस स्थल पर निरूपण कर दिया है, तथापि रसवत् आदि अलङ्कारों के प्रकाशन का अवकाश देने के लिए अनुवाद किया है। वह रस आदि ध्वनि के रूप में व्यवस्थित ही है, क्योंकि उससे शून्य काव्य कोई चीज नहीं है । यद्यपि रस से ही सारा काव्य जीवित रहता है, तथापि एकघन चमत्कार रूप भी उस रस के कहीं प्रयोजक अंश से अधिक चमत्कार होता है । वहाँ जब कोई व्यभिचारी भाव उद्रिक्त या निष्पन्न अवस्था को प्राप्त करके अतिशय चमत्कार का प्रयोजक होता है, तब भावध्वनि होता है । जैसे— वह ( उर्वशी ) भले ही कुछ कोप से अन्तर्हित हो जाय पर वह अधिक कुपित नहीं होती, भले ही वह स्वर्ग चली गई हो, फिर भी उसका मन मेरे प्रति भावार्द्र है, मेरे सामने स्थित उसे असुर भी हरण नहीं कर सकते, और वह आँखों के अत्यन्त अविषय हो गई है, यह कैसा प्रकार है ? यहाँ विप्रलम्भ रस के होने पर भी वितर्क नामक व्यभिचारी भाव के चमत्कार से प्रयुक्त अतिशय आस्वाद हो रहा है । व्यभिचारी भावों के तीन धर्म हैं—उदय,