भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 680 में से

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पृष्ठ 249

द्वितीय उद्योतः १८९ ध्वन्यालोकः इदानीं रसवदलङ्कारादलक्ष्यक्रमद्योतनात्मकनो ध्वनेर्विभक्तो विषय इति प्रदर्श्यते— वाच्यवाचकचारुत्वहेतूनां विविधात्मनाम् । रसादिपरता यत्र स ध्वनेर्विषयो मतः ॥ ४ ॥ अब रसवद् अलङ्कार से अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य रूप ध्वनि का विषय अलग है, यह दिखाते हैं— नाना प्रकार के वाच्य, वाचक और उनके चारुत्व-हेतुओं का जहाँ रस आदि में तात्पर्य हो, वह ‘ध्वनि’ का विषय माना गया है ॥ ४ ॥ लोचनम् नन्वङ्गित्वेनावभासमान इत्युच्यते; तत्राङ्गित्वमपि किमस्ति रसादेर्येन तन्निराकरणायतद्विशेषणमित्यभिप्रायेणोपक्रमते—इदानीमित्यादिना । अङ्गत्व- मस्ति रसादीनां रसवत्प्रेयऊर्जस्विसमाहितालङ्काररूपतायामिति भावः । अनया च भङ्ग्या रसवदादिष्वलङ्कारेषु रसादिध्वनेर्नान्तर्भाव इति सूचयति । शङ्का है कि जब ‘अङ्गी या प्रधान रूप से अवभासमान’ (ध्वनि को) कहते हैं तो वहाँ रसादि का अङ्गत्व भी क्या है ? जिससे उसके (अङ्गत्व) के निराकरण के लिए यह विशेषण है, इस अभिप्राय से उपक्रम करते हैं—‘अत्र’इत्यादि द्वारा । भाव यह कि रसवत् , प्रेयस्, ऊर्जस्वि, समाहित अलङ्कार के रूपों में रसादि का अङ्गत्व है । इस अङ्गी के द्वारा सूचित करते हैं कि रसवद् आदि अलङ्कारों में रसादि१ ध्वनि का ‘रसादि अर्थ वाच्य के साथ ही प्रतीत होता है’ यह अर्थ होता है । किन्तु यह पाठ भ्रमपूर्ण ही है । क्योंकि वाच्य विभावादि और रसादि अर्थ की प्रतीति में क्रम अवश्य होता है किन्तु वह व्यङ्ग्य रसादि की प्रतीति इतनी शीघ्रता से होती है कि वह क्रम संलक्षित नहीं हो पाता । जैसे कमल के सैकड़ों पत्तों को एक बार सूचिका से छेदने पर क्रम की प्रतीति नहीं होती । इस प्रकार वाच्य के साथ ही रसादि की प्रतीति न होकर वाच्य के साथ जैसी ही प्रतीति होती है, अतः ‘एव’ (ही) के स्थान पर ‘इव’ (जैसा) पाठ ही उचित है । दूसरे यह भी कि वाच्य के साथ ही व्यङ्ग्य अर्थ की प्रतीति कैसे सम्भव है ? क्योंकि दो अर्थों का एक ही समय में ज्ञान मन की सामर्थ्य से बाहर है । लोचनकार ने ‘सहैव’ पाठ को ही निर्दिष्ट किया है । १. जब रस प्रधान होता है अर्थात् अङ्गी होता है तब रसादि ध्वनि होती है, किन्तु जब रस की स्थिति अप्रधान या अङ्ग की होती है तब वह रसवत् आदि अलङ्कार की कोटि में आता है । अलङ्कारों में ध्वनि के अन्तर्भाव का सम्भव न होने की बात पहले कह चुके हैं । समासोक्ति आदि अलङ्कारों में ध्वनि का सामान्यतः अन्तर्भाव तो है ही नहीं, इसी प्रकार रसवद् अलङ्कार में भी रसादि ध्वनि का अन्तर्भाव नहीं है । यह भी बात पहले कही गई है कि वस्तुध्वनि का समासोक्ति आदि अलङ्कारों में अन्तर्भाव नहीं । कहने का तात्पर्य यह कि ध्वनि तत्त्व सर्वथा एक अलग अस्तित्व रखता है ।