भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 680 में से

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पृष्ठ 224

लोचनम् बन्धुसमागमादिकारणोदितहर्षादिलौकिकचित्तवृत्तिन्यग्भावेन चर्वणारूप- त्वम्। अतश्चर्वणात्राभिव्यञ्जनमेव, न तु ज्ञापनम्, प्रमाणव्यापारवत्। नाप्यु- त्पादनम्, हेतुव्यापारवत्। ननु यदि नेयं ज्ञप्तिर्न वा निष्पत्तिः, तर्हि किमेतत् ? न न्वयमसावलौकिको रसः। ननु विभावादिरत्र किं ज्ञापको हेतुः, उत कारकः ? न ज्ञापको न कारकः, अपि तु चर्वणोपयोगी। ननु क्वैतद् दृष्टमन्यत्र। यत एव न दृष्टं तत एवालौकि- कमित्युक्तम्। नन्वेवं रसोऽप्रमाणं स्यात्; अस्तु, किं ततः ? तच्चर्वणात एव प्रीतिव्युत्पत्तिसिद्धेः किमन्यदर्थनीयम्। नन्वप्रमाणकमेतत्; न, स्वसंवेदन- सिद्धत्वात्। ज्ञानविशेषस्यैव चर्वणात्मकत्वात् इत्यलं बहुना। अतश्च रसोऽयम- लौकिकः। येन ललितपरुषानुप्रासस्यार्थाभिधानानुपयोगिनोऽपि रसं प्रति व्यञ्जकत्वम्; का तत्र लक्षणायाः शङ्कापि ? काव्यात्मकशब्दनिष्पीडनेनैव तच्चर्वणा दृश्यते। दृश्यते हि तदेव काव्यं पुनः पुनः पठंश्चर्व्यमाणश्च सहृदयो लोकः, न तु काव्यस्य; तत्र ‘उपादायापि ये हेया' इति न्यायेन कृतप्रतीतिक- स्यानुपयोग एवेति शब्दस्यापीह ध्वननव्यापारः। अत एवालक्ष्यक्रमता। उत्पन्न हर्ष आदि लौकिक चित्तवृत्ति के न्यग्भाव से चर्वणा की स्थिति है। इसलिये चर्वणा यहाँ अभिव्यंजन ही है न कि ज्ञापन, (इन्द्रिय आदि) प्रमाणों के व्यापार की भाँति, और (चर्वणा) उत्पादन रूप (व्यापार) भी नहीं है, (दण्ड, चक्र आदि) हेतु के व्यापार की भांति। शङ्का है कि यदि यह (रसचर्वणा) न ज्ञप्ति है और न तो निष्पत्ति है, तो फिर है क्या ? (उत्तर में कहते हैं कि) रस तो अलौकिक है। तब जब प्रश्न उठता है कि विभावादि यहाँ ज्ञापक हेतु है अथवा कारक हेतु ? (इसका उत्तर यह है कि) वह न तो ज्ञापक हेतु है और न तो कारक, बल्कि वह चर्वणा का उपयोगी है। (तब प्रश्न है कि) यह कहाँ देखा है ? (इसका उत्तर यह है कि) जिस कारण नहीं देखा उसी कारण ‘अलौकिक' कहा। तब तो इस प्रकार रस अप्रमाण होगा ! (उत्तर है कि) हो, उससे क्या ? जब उसकी चर्वणा से ही प्रीति और व्युत्पत्ति सिद्ध हो जाती हैं तो और क्या चाहिये ? (शङ्का है कि) इस कथन का कोई प्रमाण नहीं, (समाधान है) कि नहीं, यह बात अपने संवेदन से सिद्ध है, क्योंकि चर्वणा ज्ञानविशेष रूप ही है। अब बहुत कहना व्यर्थ है। इसलिये यह रस अलौकिक है। जिस कारण अर्थ के अभिधान के उपयोगी न होने वाले ललित एवं परुष अनुप्रास का भी रस के प्रति व्यंजकत्व है फिर लक्षणा की शंका भी कैसे सम्भव है। काव्यात्मक शब्द के निष्पीडन से ही रस की चर्वणा देखी जाती है। क्योंकि सहृदय को बार-बार काव्य पढ़ते हुये और चर्वणा करते हुये देखते हैं, न कि काव्य रूप शब्द का (चर्वण करते हुये देखते हैं); इस प्रकार वहाँ ‘उपादान करके भी जो त्याज्य हैं' इस न्याय के अनुसार जिसकी प्रतीति कर ली गई उसका उपयोग ही नहीं, इसलिये शब्द का भी ‘ध्वनन' व्यापार