भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 680 में से

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पृष्ठ 223

प्रथम उद्योतः १६३ लोचनम् पूर्णीभविष्यद्रसास्वादाङ्कुरीभावेनानुमानस्मरणादिसरणिमनारूढैव तन्मयीभ- वनोचितचर्वणाप्राणतया । न चासौ चर्वणा प्रमाणान्तरतो जाता पूर्वं, येने- दानीं स्मृतिः स्यात् । न चाधुना कुतश्चित्प्रमाणान्तरादुत्पन्ना, अलौकिके प्रत्यक्षाद्यव्यापारात् । अत एवालौकिक एव विभावादिव्यवहारः । यदाह— ‘विभावो विज्ञानार्थः लोके कारणमेवाभिधीयते न विभावः । अनुभावोऽप्य- लौकिक एव । ‘यदयमनुभावयति वागङ्गसत्त्वकृतोऽभिनयस्तस्मादनुभाव’ इति । तच्चित्तवृत्तितन्मयीभवनमेव ह्यनुभवनम् । लोके तु कार्यमेवोच्यते नानुभावः । अत एव परकीया न चित्तवृत्तिर्गम्यत इत्यभिप्रायेण ‘विभावानु- भावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’ इति सूत्रे स्थायिग्रहणं न कृतम् । तत्प्र- त्युत शल्यभूतं स्यात् । स्थायिनस्तु रसीभाव औचित्यादुच्यते, तद्विभावानु- भावोचितचित्तवृत्तिसंस्कारसुन्दरचर्वणोदयात् । हृदयसंवादोपयोगिलोकचित्त- वृत्तिपरिज्ञानावस्थायामुद्यानपुलकादिभिः स्थायीभूतरत्याद्यवगमाच्च । व्यभि- चारी तु चित्तवृत्त्यात्मत्वेऽपि मुख्यचित्तवृत्तिपरवश एव चर्व्यत इति विभावा- नुभावमध्ये गणितः । अत एव रस्यमानताया एषैव निष्पत्तिः, यत्प्रबन्धप्रवृत्त- सहृदयत्व के परवश होने के कारण पूर्णता को प्राप्त करने वाले रसास्वाद के अंकुरी- भाव से, अनुमान और स्मरण आदि की सरणि पर आरूढ़ हुये बिना ही, तन्मय होने के उचित चर्वणा के उपयोग से (विभावादि को अवगत करता है)। पहले वह ‘चर्वणा’ प्रमाणान्तर से उत्पन्न नहीं हो चुकी होती है, जिससे इस समय उसे ‘स्मृति’ कहते, और न कि इस समय प्रमाणान्तर से उत्पन्न हो रही है, क्योंकि अलौकिक वस्तु में प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों का व्यवहार नहीं होता। जैसा कि कहा है—विभाव विशेष ज्ञान की वस्तु है—वह लोक में ‘कारण’ ही कहा जाता है, विभाव नहीं । अनुभाव भी अलौकिक ही होता है। जो कि यह वाणी, अङ्ग और सत्त्व से किया हुआ अभिनय अनुभवन कराता है, उस कारण अनुभाव है।’ उन चित्तवृत्तियों से तन्मय हो जाना ही अनुभवन है। उसे लोक में कार्य ही कहते हैं, न कि अनुभाव। इसीलिये परकीय चित्तवृत्ति को (सामाजिक लोग) नहीं अनुभव करते, इस अभिप्राय से ‘विभाव’ अनुभाव और व्यभिचारी के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है’ इस सूत्र में स्थायी का ग्रहण नहीं किया। उसका ग्रहण प्रत्युत शल्यभूत (विरुद्ध) हो जाता । स्थायी भाव का रसीभाव (रस के रूप में परिणत होना) औचित्य के कारण कहा जाता है, क्योंकि वह (औचित्य) विभाव, अनुभाव और उचित चित्तवृत्ति के संस्कार से सुन्दर चर्वणा के उदय से होता है। और हृदय-संवाद की उपयोगिनी लोक-चित्तवृत्ति के परिज्ञान की अवस्था में उद्यान और पुलक आदि द्वारा स्थायीभूत रति आदि के अवगम से (औचित्य) होता है। चित्तवृत्ति रूप होने पर भी व्यभिचारी मुख्य चित्तवृत्ति के परवश ही होकर चर्वित होता है, अतः उसकी गणना विभाव-अनुभाव के बीच ही की गई है। अतएव रस्यमानता की यही निष्पत्ति है कि जो समय से प्रवृत्त बन्धु-समागम आदि कारण से