ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
१४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः
यदप्युक्तं भक्तिर्ध्वनिरिति, तत्प्रतिसमाधीयते—
जो कि 'भक्ति ध्वनि है' यह कहा है उसका प्रतिसमाधान करते हैं—
लोचनम्
द्यभावे मध्यमकक्ष्यायां लक्षणायास्तृतीयाया अभावात्। यदि वाऽऽकस्मिक-
विशिष्टप्रश्नार्थानुपपत्तेर्मुख्यार्थबाधायां सादृश्याल्लक्षणा भवतु मध्ये। तस्यास्तु
प्रयोजनं ध्वन्यमानमेव, तत्तूर्यकक्ष्यानिवेशि, केवलं पूर्वत्र लक्षणैव प्रधानं
ध्वननव्यापारे सहकारि। इह त्वभिधातात्पर्यशक्ती। वाक्यार्थसौन्दर्यादेव
व्यङ्ग्यप्रतिपत्तेः केवलं लेशेन लक्षणाव्यापारोपयोगोऽप्यस्तीत्युक्तम्। असंलक्ष्य-
क्रमव्यङ्ग्ये तु लक्षणासमुन्मेषमात्रमपि नास्ति, असंलक्ष्यत्वादेव क्रमस्येति
वक्ष्यामः। तेन द्वितीयेऽपि भेदे चत्वार एव व्यापाराः ॥ १३ ॥
अत एवोभयोदाहरणपृष्ठ एव भाक्तमाहुरित्यनुभाष्य दूषयति। अयं भावः-
भक्तिश्च ध्वनिश्चेति किं पर्यायवत्ताद्रूप्यम् ? अथ पृथिवीत्वमिव पृथिव्या अन्यतो
व्यावर्तकधर्मरूपतया लक्षणम् ? उत काक इव देवदत्तगृहस्य सम्भवमात्रादुप-
लक्षणम् ? तत्र प्रथमं पक्षं निराकरोति—
अभाव होने से बीच की कक्ष्या में तीसरी लक्षणा वृत्ति यहाँ नहीं है। अथवा
आकस्मिक (असम्भावित) एवं विशिष्ट (शुक द्वारा तप करने के स्थान को लेकर)
प्रश्नार्थ की उपपत्ति न बनने के कारण मुख्यार्थबाध के हो जाने पर सादृश्य से बीच
में लक्षणा हो सकती है। उस (लक्षणा का) प्रयोजन ध्वन्यमान ही है, वह (ध्वन्यमान
प्रयोजन) चौथी कक्ष्या में रहने वाला है। (अगर दोनों उदाहरणों में भेद करें तो)
पहले उदाहरण में केवल लक्षणा ही प्रधान होकर ध्वनन व्यापार में सहकारिणी है,
और यहाँ अभिधा या तात्पर्य ये दोनों शक्तियाँ (ध्वनन व्यापार में) सहकारिणी हैं।
क्योंकि वाक्यार्थ के सौन्दर्य से ही व्यंग्य की जब प्रतीति हो जाती है, ऐसी स्थिति में
केवल लेशरूप से यहाँ लक्षणा व्यापार का उपयोग भी है ऐसा कहा गया। 'असंलक्ष्य-
क्रमव्यंग्य' (जहाँ व्यंग्य के बोध का क्रम संलक्षित नहीं होता) में लक्षणा का समुन्मेष
मात्र भी, क्रम के संलक्ष्य न होने के कारण ही, नहीं है, यह कहेंगे। इस प्रकार दूसरे
भी भेद में चार ही व्यापार हैं ॥ १३ ॥
इसीलिए दोनों के उदाहरणों के बाद ही 'भाक्तमाहुः' इसका अनुवाद करके दोष
देते हैं। भाव यह है— 'भक्ति' और 'ध्वनि' इस प्रकार क्या (इन्द्र, शक्र आदि) पर्याय
की भाँति दोनों का ऐक्य या अभेद है ? अथवा पृथिवी के 'पृथिवीत्व' की भाँति
अतिरिक्त के व्यावर्तक धर्मरूप होने के कारण, लक्षण है ? या कौए की भाँति देवदत्त
के गृह का सम्भवमात्र से, उपलक्षण है ? उनमें प्रथम पक्ष का निराकरण करते हैं—
१. 'भक्ति' और 'ध्वनि' को तीन प्रकार से अभिन्न कह सकते हैं—पर्याय, लक्षण और उपलक्षण। अर्थात् भाक्तवादी क्या ध्वनि और भक्ति को पर्याय मानते हैं, जैसे घट और कलश शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं, अथवा 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण है, जैसे पृथिवीत्व पृथिवी का
प्रथम उद्योतः १४९ ध्वन्यालोकः भक्त्या बिभर्ति नैकत्वं रूपभेदादयं ध्वनिः अयमुक्तप्रकारो ध्वनिर्भक्त्या नैकत्वं बिभर्ति भिन्नरूपत्वात् । वाच्यव्यतिरिक्तस्यार्थस्य वाच्यवाचकाभ्यां तात्पर्येण प्रकाशनं यत्र व्यङ्ग्यप्राधान्ये स ध्वनिः । उपचारमात्रं तु भक्तिः । 'यह ध्वनि रूप भेद के कारण 'भक्ति' के साथ एकत्व ( अभेद ) को धारण नहीं करता ।' यह उक्त प्रकार का ध्वनि भिन्न रूप होने के कारण भक्ति से एकत्व ( अर्थात् अभेद ) प्राप्त नहीं करता । वाच्य से व्यतिरिक्त अर्थ का वाच्य और वाचक द्वारा तात्पर्य रूप से प्रकाशन जहाँ व्यङ्ग्य के प्राधान्य में हो वह 'ध्वनि' है । 'भक्ति' तो उपचार मात्र है । लोचनम् भक्त्या बिभर्तीति । उक्तप्रकार इति पञ्चस्वर्थेषु योज्यम्—शब्देऽर्थे व्यापारे व्यङ्ग्ये समुदाये च । रूपभेदं दर्शयितुं ध्वनेस्तावद्रूपमाह—वाच्येति । तात्पर्येण विश्रान्तिधामतया प्रयोजनत्वेनेति यावत् । प्रकाशनं द्योतनमित्यर्थः । उपचारमा- त्रमिति । उपचारो गुणवृत्तिर्लक्षणा उपचरणमतिशयितो व्यवहार इत्यर्थः । यह ध्वनि—। 'उक्त प्रकार' को पाँचो अर्थों में लगाना चाहिए—शब्द में, अर्थ में, व्यापार में; व्यंग्य में और समुदाय ( रूप काव्य ) में । रूपभेद को दिखाने के लिए ध्वनि का स्वरूप कहते हैं—वाच्य से—। 'तात्पर्यरूप से' अर्थात् विश्राम लेने का स्थान होने के कारण प्रयोजनरूप होने से । 'प्रकाशन' अर्थात् द्योतन । उपचारमात्र—१ उपचार व्यावर्तक धर्म रूप लक्षण है । अथवा 'उपलक्षण' अर्थात् सूचक मात्र है, जैसे 'काकवद् देवदत्तस्य गृहम्' अर्थात् देवदत्त का घर कौवे वाला है, यह उसी समय बात कही गई है जब देवदत्त के घर पर कौआ बैठा है, इस प्रकार 'काकवत्त्व' देवदत्त के घर का सूचक मात्र होने से 'उपलक्षण' है । इन तीनों विकल्पों में 'भक्ति' ध्वनि का क्या है ? यह प्रश्न भाक्तवादी से स्वयं उद्भावित करते हैं । समाधान में, आचार्य ने तीनों विकल्पों का निराकरण कर दिया । प्रथम विकल्प 'पर्याय' के सम्बन्ध में आचार्य कहते हैं कि भक्ति और ध्वनि किसी प्रकार एक दूसरे के पर्याय नहीं हो सकते हैं, क्योंकि दोनों में रूपभेद है अर्थात् ध्वनि का स्वरूप भिन्न है और भक्ति का स्वरूप भिन्न । फिर प्रस्तुत कारिका के उत्तरार्ध में आचार्य ने भक्ति को ध्वनि का 'लक्षण' भी अमान्य ठहराया है, क्योंकि 'लक्षण' वही होता है जिसमें अतिव्याप्ति और अव्याप्ति आदि दोष नहीं होते । किन्तु 'भक्ति' को ध्वनि का लक्षण बनाने पर अतिव्याप्ति और अव्याप्ति दोनों दोष उत्पन्न होंगे । इसे आगे स्वयं स्पष्ट करेंगे। फिर तीसरे विकल्प 'उपलक्षण' को आचार्य ने १९ वीं कारिका के पूर्वार्ध में स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट कह दिया है कि इससे यह नहीं कह सकते हैं कि गुणवृत्ति या भक्ति से ही ध्वनि लक्षित होता है । यह विषय आगे के पृष्ठों में स्पष्ट होगा । १. 'उपचार' का अर्थ लोचनकार ने 'अतिशयित व्यवहार' करके यह व्यक्त किया है कि जिस शब्द का जिस अर्थ में संकेततः व्यवहार प्रसिद्ध है उसे छोड़ कर उससे सम्बद्ध अर्थ में
१५० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः मा चैतत्तस्याङ्गक्तिर्लक्षणं ध्वनेरित्याह— अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्न चासौ लक्ष्यते तया ॥ १४ ॥ नैव भक्त्या ध्वनिर्लक्ष्यते । कथम् ? अतिव्याप्तेरव्याप्तेश्च । तत्रातिव्याप्तिर्ध्वनिव्यतिरिक्तेऽपि विषये भक्तेः सम्भवात् । यत्र हि व्यङ्ग्यकृतं महत्सौष्ठवं नास्ति तत्राप्युपचरितशब्दवृत्त्या प्रसिद्धयनुरोध- प्रवर्तितव्यवहाराः कवयो दृश्यन्ते । यथा— 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण है, यह भी नहीं हो सकता, यह कहते हैं— 'अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के कारण यह ( ध्वनि ) उस ( भक्ति ) से लक्षित नहीं हो सकता ।' ॥ १४ ॥ भक्ति से ध्वनि नहीं ही लक्षित होता है । कैसे ? अतिव्याप्ति और अव्याप्ति के कारण ! वहाँ, ध्वनि से भिन्न स्थल में भी भक्ति का सम्भव है, यह अतिव्याप्ति है । जहाँ व्यंग्यकृत अधिक ( महत् ) सौष्ठव नहीं है वहाँ भी कविजन प्रसिद्धिवश उपचरित शब्द-व्यापार ( गौणी वृत्ति ) से व्यवहार करते देखे जाते हैं । जैसे— लोचनम् मात्रशब्देनेदमाह— यत्र लक्षणाव्यापारात्तृतीयादन्यश्चतुर्थः प्रयोजनद्योतनात्मा व्यापारो वस्तुस्थित्या सम्भवन्नप्यनुपयुज्यमानत्वेनानाद्रियमाणत्वादसत्कल्पः । 'यमर्थमधिकृत्य' इति हि प्रयोजनलक्षणम् । तत्रापि लक्षणास्तीति कथं ध्वननं लक्षणा चेत्येकं तत्त्वं स्यात् । द्वितीयं पक्षं दूषयति—अतिव्याप्तेरिति । असाविति ध्वनिः । तयेति भक्त्या । ननु ध्वननमवश्यम्भावीति कथं तद्व्यतिरिक्तोऽस्ति विषय इत्याह—महत्सौष्ठवमिति । अत एव प्रयोजनस्यानादरणीयत्वाद् व्यञ्ज- कत्वेन न कृत्यं किञ्चिदिति भावः । महद्ग्रहणेन गुणमात्रं तद्भवति । यथोक्तम्— अर्थात् गुणवृत्ति, लक्षणा । 'उपचरण' अर्थात् अतिशयित व्यवहार । 'मात्र' शब्द से यह कह सकते हैं—जहाँ तीसरे लक्षणा व्यापार से अतिरिक्त प्रयोजन-द्योतनरूप चौथा व्यापार वस्तुस्थिति के साथ सम्भव होता हुआ भी उपयुज्यमान न होने के कारण आदर का पात्र न होकर नहीं के बराबर है । 'प्रयोजन' का लक्षण यह है—'जिस वस्तु को लेकर कोई प्रवृत्त होता है वह प्रयोजन है' ( यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनम् ) । वहाँ भी लक्षणा है । इस प्रकार कैसे ध्वनन और लक्षणा एक तत्त्व हो सकते हैं ? दूसरे पक्ष में दोष देते हैं—अतिव्याप्ति होने के कारण—। 'यह' अर्थात् ध्वनि । उससे अर्थात् भक्ति से । शङ्का है कि ( लक्षणा में ) ध्वनन अवश्यम्भावी है, ऐसी स्थिति में कैसे उस ( ध्वनि ) से भिन्न-विषय है ? इस पर कहते हैं—अधिक सौष्ठव ( या शब्द का व्यवहार ही अतिशयित व्यवहार है । यद्यपि इस उपचार रूप गुणवृत्ति या लक्षणा में 'प्रयोजन' भी होता है, किन्तु वहां उपयोगी न होने के कारण न होने के समान ( असत्कल्प ) ही माना जाता है । इसलिए वृत्तिग्रन्थ में 'उपचार' के साथ 'मात्र' का प्रयोग है ।
प्रथम उद्योतः १५१ ध्वन्यालोकः परिम्लानं पीनस्तनजघनसंङ्गादुभयत- स्तनोर्मध्यस्यान्तः परिमिलनमप्राप्य हरितम् । इदं व्यस्तन्यासं श्लथभुजलताक्षेपवलनैः कृशाङ्ग्याः सन्तापं वदति बिसिनीपत्रशयनम् ॥ दोनों ओर मोटे स्तन और जघन के सम्पर्क से अधिक मुरझाया हुआ, मध्यभाग ( कटि ) के बीच सम्पर्क प्राप्त न करके हरा ही बना हुआ एवं शिथिल भुजलता के फेंकने और मोड़ने की क्रियाओं से इधर-उधर अस्तव्यस्त, कमलिनी के पत्तों का यह शयन कृश अङ्गोंवाली का विरहसन्ताप कह रहा है । लोचनम् 'समाधिरन्यधर्मस्य' काप्यारोपो विवक्षित' इति दर्शयति । ननु प्रयोजनाभावे कथं तथा व्यवहार इत्याह—प्रसिद्धद्यनुरोधेति । परम्परया तथैव प्रयोगात् । वयं तु ब्रूमः—प्रसिद्धिर्या प्रयोजनस्यानिगूढतेत्यर्थः । उत्तानेनापि रूपेण तत्प्रयोजनं चकासन्निगूढतां निधानवदपेक्षत इति भावः । वदतीत्युपचारे हि स्फुटीकरणप्रतिपत्तिः प्रयोजनम् । यद्यगूढं स्वशब्देनोच्येत, किमचारुत्वं स्यात् ? गूढतया वर्णने वा किं चारुत्वमधिकं जातम् ? अनेनैवाशयेन वक्ष्यति— सौन्दर्य )—। अतएव भाव यह कि प्रयोजन के आदरणीय न होने के कारण व्यञ्जक होने से ( व्यञ्जना व्यापार से ) कुछ नहीं होता जाता । 'अधिक' ( महत् ) ग्रहण से ( यह ज्ञात होता है कि वह ( व्यञ्जकत्व या व्यञ्जना व्यापार ), कोई गुणमात्र ( अप्रधान ) होता है । जैसा कि कहा है—'दूसरे के ( अप्रस्तुत के ) धर्म का कहीं पर जब आरोप विवक्षित हो तब 'समाधि' ( नाम का गुण ) कहते हैं' इसे दिखाते हैं । शङ्का है कि प्रयोजन के अभाव में कैसे उस प्रकार व्यवहार होगा ? इस प्रकार कहते हैं—प्रसिद्धिवश—। क्योंकि परम्परा से उसी प्रकार प्रयोग है । हम तो कहते हैं—प्रसिद्धि वह है जो प्रयोजन की अनिगूढता ( प्रकटरूपता ) है । भाव यह कि उत्तानरूप से प्रकाशित होता हुआ प्रयोजन खजाने की भाँति निगूढता की अपेक्षा करता है । 'वदति'१ ( 'कह रहा है' ) इस 'उपचार' में स्फुटीकरण की प्रतीति प्रयोजन है । यदि अनिगूढ या प्रकटरूप से शब्दतः उक्त कर दिया जाए तो क्या १. 'वदति' अर्थात् 'प्रकटयति' । 'वदति' का प्रयोजन है प्रकटन का ज्ञान । यदि कवि ने 'प्रकटयति' ही लिख दिया होता तब भी कोई अचारुत्व नहीं होता और 'वदति' इस उपचरित व्यवहार या गूढरूप से वर्णन से कोई अधिक चारुत्व भी सिद्ध नहीं होता । यह कभी भी ध्वनि का विषय नहीं हो सकता, किन्तु भक्ति का विषय तथापि माना जा सकता है । इस प्रकार अतिव्याप्ति के कारण भक्ति को ध्वनि का लक्षण नहीं कहा जा सकता ।
१५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तथा— चुम्बिज्जइ असहुत्तं अवरुन्धिज्जइ सहस्सहुत्तम्वि । विरमिअ पुणो रमिज्जइ पिओ जणो णत्थि पुनरुत्तम् ॥ ( शतकृत्वोऽवरुध्यते सहस्रकृत्वश्चुम्ब्यते । विरम्य पुना रम्यते प्रियो जनो नास्ति पुनरुक्तम् ॥ इति च्छाया ) तथा— कुविआओ पसन्नाओ ओरण्णमुहीओ विहसमाणाओ । जह गहिओ तह हिअअं हरन्ति उच्छिन्तमहिलाओ ॥ उसी प्रकार— प्रिय को सौ बार चुम्बन करते हैं; हजार बार अवरोधन ( आलिङ्गन ) करते हैं, विराम करके रमण करते हैं, फिर भी पुनरुक्त नहीं होता ! उसी प्रकार— खिसियानी, खुश, रुआंसी या हँसती, चाहे जिस रूप में ग्रहण करो मनचली औरतें दिल हर लेती हैं। लोचनम् यत उक्त्यन्तरेणाशक्यं यदिति । अवरुन्धिज्जइ आलिङ्ग्यते । पुनरुक्तमित्यनुपा- देयता लक्ष्यते, उक्तार्थस्यासम्भवात् । कुपिताः प्रसन्ना अवरुदितवदना विहसन्त्यः । यथा गृहीतास्तथा हृदयं हरन्ति स्वैरिण्यो महिलाः ।। अचारुत्व हो जाता है ? अथवा गूढ या अप्रकटरूप से वर्णन करने पर क्या चारुत्व अधिक हो जाता है ? इसी आशय से कहेंगे—'क्योंकि 'दूसरी उक्ति से जो अशक्य है—' इत्यादि । अवरोधन करता है अर्थात् आलिङ्गन करता है । 'पुनरुक्त' इससे अनुपादेयता लक्षित होती है, क्योंकि वचनरूप उक्त अर्थ का ( प्रियजन के अर्थ में ) सम्भव नहीं । १. पुनरुक्त और पुनर्वचन, किसी बात को दुबारा कहना । प्रिय तो कोई वचन नहीं है जो पुनरुक्त होता है, इस प्रकार यहाँ मुख्यार्थ का बाध होकर लक्षणा होती है और उससे लक्षित होती है अनुपादेयता, अर्थात् प्रिय की तब भी किसी प्रकार अनुपादेयता नहीं होती, बल्कि उसकी उपादेयता सब प्रकार से बनी रहती है । यहाँ पर अधिकफलशालित्व रूप प्रयोजन प्रतीत होता है किन्तु चमत्कारी न होने के कारण आदरणीय नहीं है । इसलिए पूर्ववत् यह भी ध्वनि का विषय नहीं है ।
प्रथम उद्योतः १५३ ध्वन्यालोकः तथा— अज्जाएँ पहारो णवलदाए दिण्णो पिएण थणवट्टे । मिउओ वि दूसहो विअ जाओ हिअए सवत्तीणम् ॥ ( भार्यायाः प्रहारो नवलतया दत्तः प्रियेण स्तनपृष्ठे । मृदुकोऽपि दुःसह इव जातो हृदये सपत्नीनाम् ॥ इति च्छाया ) उसी प्रकार— 'प्रिय ने नवलता से जब भार्या के स्तन पर प्रहार दिया तब वह ( प्रहार ) मृदु होकर भी सौतों के हृदय में दुःसह हो गया।' लोचनम् अत्र ग्रहणेनोपादेयता लक्ष्यते । हरणेन तत्परतन्त्रतापत्तिः । तथा-अज्जेति । कनिष्ठभार्यायाः स्तनपृष्ठे नवलतया कान्तेनोचितक्रीडा- योगेन मृदुकोऽपि प्रहारो दत्तः सपत्नीनां सौभाग्यसूचकं तत्क्रीडासंविभागम- प्राप्तानां हृदये दुःसहो जातः, मृदुकत्वादेव । अन्यस्य दत्तो मृदुः प्रहारोऽन्यस्य च सम्पद्यते । दुस्ससहश्च मृदुरपीति चित्रम् । दानेनात्र फलवत्त्वं लक्ष्यते । यहाँ 'ग्रहण'¹ से उपादेयता लक्षित होती है और 'हरण' से उसके परतन्त्र हो जाने की स्थिति ( लक्षित होती है ) । 'उसी प्रकार' भार्या—। छोटी भार्या के स्तन पर नवलता से प्रिय द्वारा उचित क्रीड़ा के सम्बन्ध से दिया हुआ मृदु भी प्रहार सौभाग्य के सूचक उस क्रीड़ा-संविभाग को नहीं पाई हुई सौतों के हृदय में दुःसह हो गया, मृदु होने के कारण ही। दूसरे को दिया हुआ मृदु प्रहार दूसरे को प्राप्त होता है। मृदु होकर भी दुःसह है यह आश्चर्य है। यहाँ ( प्रहार के ) 'दान'² या दिए जाने से फलवत्त्व ( सफल होना ) लक्षित होता है। १. 'गृहीताः' में ग्रहण से स्वैरिणी महिलाओं ( मनचली औरतों ) की उपादेयता लक्षित होती है और 'हरन्ति' में हरण से परतन्त्रता लक्षित होती है, हर लेती है अर्थात् अपने वश में कर लेती हैं। यहां भी व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य के अभाव में ध्वनि नहीं है। २. 'दत्तः में 'दान' तो किसी पदार्थ का होता है, यह 'दान' का मुख्य अर्थ प्रस्तुत में 'प्रहार के दान' में बाधित होने के कारण फलवत्त्व लक्षित होता है। पूर्ववत् यह भी ध्वनि का विषय नहीं।
१५४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तथा— परार्थे यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरो यदीयः सर्वेषामिह खलु विकारोऽप्यभिमतः । न सम्प्राप्तो वृद्धिं यदि स भृशमक्षेत्रपतितः किमैक्षोर्दोषोऽसौ न पुनरगुणाया मरुभुवः ॥ इत्यत्रैक्षुपक्षेऽनुभवतिशब्दः । न चैवंविधः कदाचिदपि ध्वनेर्विषयः । उसी प्रकार— जो दूसरों के लिए पीड़ा ( कष्ट या पीड़न अर्थात् रस निकालने के लिए यन्त्र में पीड़ित होने ) का अनुभव करता है, टूट जाने पर भी मधुर ( मीठा ) बना रहता है, सबों को जिसका विकार ( रस अथवा दोष ) भी अच्छा लगता है वह ईख यदि ऊसर जमीन में पड़कर नहीं बढ़ा तो क्या यह ईख का दोष ( अपराध ) है, गुणहीन मरुभूमि का नहीं ? यहाँ ईख के पक्ष में 'अनुभव करता है' यह शब्द ( उपचरित है ), इस प्रकार का शब्द कभी ध्वनि का विषय नहीं होता ॥ १४ ॥ लोचनम् तथा—परार्थेति । यद्यपि प्रस्तुतमहापुरुषापेक्षयानुभवतिशब्दो मुख्य एव, तथाप्यप्रस्तुते इक्षौ प्रशस्यमाने पीडाया अनुभवेनेनासम्भवता पीडावत्त्वं लक्ष्यते; तच्च पीड्यमानत्वे पर्यवस्यति । नन्वस्त्यत्र प्रयोजनं तत्किमिति न ध्वन्यत इत्याशङ्क्याह—न चैवं- विध इति ॥ १४ ॥ उसी प्रकार—दूसरों के लिए—। प्रस्तुत महापुरुष की अपेक्षा यद्यपि 'अनुभव करता है' शब्द मुख्य ही है, तथापि अप्रस्तुत इक्षु की प्रशंसा की जाने पर नहीं सम्भव होते हुए पीड़ा के अनुभव से पीड़ावान् होना लक्षित होता है, और वह पीड्यमान होने में पर्यवसित होता है ।¹ शङ्का करते हैं कि यदि प्रयोजन यहाँ है तो क्यों नहीं ध्वनित होता है ? यह आशङ्का करके कहते हैं—इस प्रकार का—। ॥ १४ ॥ १. यद्यपि प्रकृत 'महापुरुष' के पक्ष में 'अनुभवति' शब्द उपपन्न है, तथापि अप्रकृत 'इक्षु' के पक्ष में असम्भव होता हुआ ( क्योंकि जड़ पदार्थ इक्षु अनुभव करने की सामर्थ्य नहीं रखता ) पीडावत्त्व को लक्षित करता है । यहाँ भी व्यङ्ग्य के अप्राधान्य में ध्वनि का अभाव है । इन पाँचो उदाहरणों का यही अभिप्राय है कि अतिव्याप्त होने के कारण 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती ।
प्रथम उद्योतः १५५ ध्वन्यालोकः यतः— उक्त्यन्तरेणाशक्यं यत्तच्चारुत्वं प्रकाशयन् । शब्दो व्यञ्जकतां बिभ्रद् ध्वन्युक्तेर्विषयीभवेत् ॥ १५ ॥ अत्र चोदाहृते विषये नोक्त्यन्तराशक्यचारुत्वव्यञ्जिहेतुः शब्दः। किञ्च— क्योंकि— जो चारुत्व दूसरी उक्ति ( उक्त्यन्तर ) से प्रकाशित नहीं किया जा सकता उसे प्रकाशित करने वाला एवं व्यञ्जकता ( व्यञ्जना व्यापार ) को धारण करने वाला शब्द 'ध्वनि' इस उक्ति का विषय होता है ॥ १५ ॥ और यहाँ उदाहृत विषय में शब्द दूसरी शक्ति से अशक्य चारुत्व की व्यञ्जना का हेतु नहीं है। और भी, लोचनम् यत उक्त्यन्तरेणेति । उक्त्यन्तरेण ध्वन्यतिरिक्तेन स्फुटेन शब्दार्थव्यापार- विशेषेणेत्यर्थः । शब्द इति पञ्चस्वर्थेषु योज्यम् । ध्वन्युक्तेर्विषयीभवेदिति—ध्वनि- शब्देनोच्यत इत्यर्थः । उदाहृत इति । वदतीत्यादौ ॥ १५ ॥ एवं यत्र प्रयोजनं सदपि नादरास्पदं तत्र को ध्वननव्यापार इत्युक्तवा यत्र मूलत एव प्रयोजनं नास्ति, भवति चोपचारस्तत्रापि को ध्वननव्यापार इत्याह—किञ्चेति । लावण्याद्या ये शब्दाः स्वविषयाल्लवणरसयुक्तत्वादेः स्वार्था- दन्यत्र हृद्यत्वादौ रूढाः, रूढत्वादेव त्रितयसन्निध्यपेक्षक्षणव्यवधानशून्याः । यदाह— ‘निरूढा लक्षणाः काश्चित्सामर्थ्यादभिधानवत् ।’ इति । ते तस्मिन् स्वविषयादन्यत्र प्रयुक्ता अपि न ध्वनेः पदं भवन्ति; न क्योंकि—दूसरी उक्ति से—। दूसरी उक्ति से अर्थात् ध्वनि से अतिरिक्त स्फुट शब्द और अर्थ के व्यापार-विशेष से । 'शब्द' को पाँचो अर्थों में लगाना चाहिए 'ध्वनि' इस उक्ति का विषय होता है—। अर्थात् 'ध्वनि' शब्द से कहा जाता है । उदाहृत—। 'वदति' इत्यादि में। इस प्रकार जहाँ प्रयोजन रहता हुआ भी आदरास्पद नहीं है वहाँ ध्वनन-व्यापार क्या ? यहाँ कहकर जहाँ मूलतः ही प्रयोजन नहीं है किन्तु उपचार है, वहाँ भी ध्वननव्यापार क्या ? यह कहते हैं—और भी—। 'लावण्य' आदि जो शब्द 'लवणरस से युक्तत्व' आदि अपने विषयरूप स्वार्थ से अन्यत्र हृद्यत्व अर्थ आदि में रूढ़ हैं, रूढ़ होने के कारण ही त्रितय ( अर्थात् मुख्यार्थबाध, मुख्यार्थयोग और प्रयोजन ) के सन्निधान की अपेक्षारूप व्यवधान से रहित हैं। क्योंकि कहा है— 'कुछ निरूढ लक्षणाएँ प्रयोग की सामर्थ्य से अभिधान के सदृश ही होती हैं ।' वे ( 'लावण्य' आदि प्रयुक्त शब्द ) अपने विषय से अन्यत्र प्रयुक्त होकर भी 'ध्वनि' के
१५६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः रूढा ये विषयेऽन्यत्र शब्दाः स्वविषयादपि । लावण्याद्याः प्रयुक्तास्ते न भवन्ति पदं ध्वनेः ॥ १६ ॥ तेषु चोपचरितशब्दवृत्तिरस्तीति । तथाविधे च विषये क्वचि- त्सम्भवन्नपि ध्वनिव्यवहारः प्रकारान्तरेण प्रवर्तते । न तथाविध- शब्दमुखेन । अपने विषय से भी अन्यत्र विषय में शब्द दूसरी उक्ति से अशक्य चारुत्व की व्यञ्जना का हेतु नहीं है । और भी, अपने विषय से भी अन्यत्र विषय में जो शब्द रूढ हो जाते हैं, जैसे कि 'लावण्य' आदि प्रयुक्त शब्द, वे ध्वनि के विषय नहीं होते ॥ १६ ॥ उनमें उपचरित शब्दवृत्ति है । उस प्रकार के विषय में कहीं पर सम्भव होता हुआ भी ध्वनि का व्यवहार प्रकारान्तर से होता है, उस प्रकार के शब्द के द्वारा नहीं । • लोचनम् तत्र ध्वनिव्यवहारः । उपचरिता शब्दस्य वृत्तिर्गौणी; लाक्षणिकी चेत्यर्थः । आदिग्रहणेनानुलोम्यं प्रातिकूल्यं सब्रह्मचारीत्येवमादयः शब्दा लाक्षणिका गृह्यन्ते । लोम्नामनुगतमनुलोमं मर्दनम् । कूलस्य प्रतिपक्षतया स्थितं स्रोतः प्रतिकूलम् । तुल्यगुरुः सब्रह्मचारी इति मुख्यो विषयः । अन्यः पुनरुपचरित एव । न चात्र प्रयोजनं किञ्चिदुद्दिश्य लक्षणा प्रवृत्तेति न तद्विषयो ध्वननव्यवहारः । ननु 'देवडिति लुणाहि पलुअम्मिगमज्ज्वलवगुज्वलं गुमरिफेल्लपरण्य' (?) इत्यादौ लावण्यादिशब्दसन्निधानेऽस्ति प्रतीयमानाभिव्यक्तिः, सत्यम्, सा तु न लावण्यशब्दात् । अपि तु समग्रवाक्यार्थप्रतीत्यनन्तरं ध्वननव्यापारादेव । अत्र हि प्रियतमामुखस्यैव समस्ताशाप्रकाशकत्वं ध्वन्यत इत्यलं बहुना । विषय नहीं होते हैं, 'ध्वनि' व्यवहार उनमें नहीं होता । उपचारिता शब्द-वृत्ति गौणी है अर्थात् लाक्षणिकी । 'आदि' ग्रहण से 'आनुलोम्य, प्रातिकूल्य, सब्रह्मचारी' इत्यादि प्रकार के लाक्षणिक शब्द गृहीत होते हैं । लोकों का अनुगत अनुलोम है अर्थात् मर्दन । कूल के प्रतिपक्ष होकर स्थित स्रोत प्रतिकूल होता है । तुल्यगुरु सब्रह्मचारी । इस प्रकार मुख्य विषय है । दूसरा फिर तो उपचरित ही है । यहाँ कोई प्रयोजन को उद्देश्य करके लक्षणा प्रवृत्त नहीं है, अतः तद्विषयक ध्वननव्यापार नहीं है । शङ्का करते हैं कि 'देवडिति' (?) इत्यादि में 'लावण्य' आदि शब्द के सन्निधान में प्रतीयमान की अभिव्यक्ति है ? ठीक है, परन्तु वह (अभिव्यक्ति) 'लावण्य' शब्द से नहीं है, अपितु समग्र वाक्यार्थ की प्रतीति के अनन्तर ध्वननव्यापार से ही है । यहाँ प्रियतमा के मुख का ही समस्त आशा का प्रकाशकत्व ध्वनित होता है, इस प्रकार
प्रथम उद्योतः १५७ ध्वन्यालोकः अपि च— मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्त्याऽर्थदर्शनम् । यदुद्दिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ॥ १७ ॥ और भी, जिस फल को उद्देश्य करके मुख्य वृत्ति को छोड़ कर गुणवृत्ति से अर्थ का ज्ञान कराया जाता है वहाँ ( उस फल के बोधन में ) शब्द स्खलद्गति अर्थात् वाधि- तार्थ नहीं है । लोचनम् तदाह—प्रकारान्तरेणेति । व्यञ्जकत्वेनैव । न तूपचरितलावण्यादिशब्दप्रयोगा- दित्यर्थः ॥ १६ ॥ एवं यत्र यत्र भक्तिस्तत्र तत्र ध्वनिरिति तावन्नास्ति । तेन यदि ध्वनेर्भक्ति- र्लक्षणं तदा भक्तिसन्निधौ सर्वत्र ध्वनिव्यवहारः स्यादित्यतिव्याप्तिः । अभ्युप- गम्यापि ब्रूमः—भवतु यत्र यत्र भक्तिस्तत्र तत्र ध्वनिः । तथापि यद्विषयो लक्षणाव्यापारो न तद्विषयो ध्वननव्यापारः । न च भिन्नविषययोर्धर्मधर्मिभावः, धर्म एव च लक्षणमित्युच्यते । तत्र लक्षणा तावदमुख्यार्थविषयो व्यापारः । ध्वननं च प्रयोजनविषयम् । न च तद्विषयोऽपि द्वितीयो लक्षणाव्यापारो युक्तः, लक्षणासामग्र्यभावादित्यभिप्रायेणाह—अपि चेत्यादि । मुख्यां वृत्तिमभिधा- व्यापारं परित्यज्य परिसमाप्य गुणवृत्त्या लक्षणारूपयार्थस्यामुख्यस्य दर्शनं प्रत्यायना, सा यत्फलं कर्मभूतं प्रयोजनरूपमुद्दिश्य क्रियते, तत्र प्रयोजने अधिक कहना व्यर्थ है । अतः कहते हैं—प्रकारान्तर से—। व्यञ्जनाव्यापार से ही । अर्थात् न कि उपचरित लावण्य आदि शब्द के प्रयोग से ( ध्वनित होता है ) । इस प्रकार जहाँ-जहाँ भक्ति है वहाँ-वहाँ ध्वनि है, ऐसा नहीं । इसलिए ध्वनि का यदि 'भक्ति' लक्षण है तब तो 'भक्ति' के समीप सर्वत्र 'ध्वनि' काव्यव्यवहार होना चाहिए ( पर नहीं होता ) अतः अतिव्याप्ति ( अलक्ष्य में लक्षण का संक्रमण ) है । अभ्युगम करके ( मान करके ) भी कहते हैं—जहाँ-जहाँ 'भक्ति' है वहाँ-वहाँ 'ध्वनि' हो, तथापि लक्षणाव्यापार जिस विषय का है उस विषय का ध्वननव्यापार नहीं है । भिन्न विषय वालों का धर्मधर्मिभाव नहीं होता । और धर्म ही 'लक्षण' भी कहा जाता है । लक्षणा अमुख्यार्थविषयक व्यापार है और ध्वनन प्रयोजनविषयक व्यापार । लक्षणाव्यापार को प्रयोजनविषयक मानना ठीक नहीं' क्योंकि लक्षणा की ( मुख्यार्थबाध आदि ) सामग्री का अभाव है, इस अभिप्राय से कहते हैं—और भी—। मुख्य वृत्ति अर्थात् अभिधा व्यापार को छोड़कर अर्थात् परिसमाप्त कर, लक्षणारूप गुणवृत्ति से अमुख्य अर्थ की प्रत्यायना ( बोधन ) है, वह जिस फल या कर्मभूत प्रयोजन को उद्देश्य करके की जाती
१५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र हि चारुत्वातिशयविशिष्टार्थप्रकाशनलक्षणे प्रयोजने कर्तव्ये यदि शब्दस्यामुख्यता तदा तस्य प्रयोगे दुष्टतैव स्यात् । न चैवम्; तस्मात्- क्योंकि वहाँ चारुत्वातिशय से विशिष्ट अर्थ के प्रकाशन रूप प्रयोजन के कर्त्तव्य होने पर यदि शब्द की अमुख्यता ही रह गई तो उसके प्रयोग में दुष्टता ही होगी । परन्तु ऐसा नहीं है इस कारण- लोचनम् तावद् द्वितीयो व्यापारः । न चासौ लक्षणैव; यतः स्खलन्ती बाधकव्यापारेण विधुरीक्रियमाणा गतिरवबोधनशक्तिर्यस्य शब्दस्य तदीयो व्यापारो लक्षणा । न च प्रयोजनमवगमयतः शब्दस्य बाधकयोगः । तथाभावे तत्रापि निमित्ता- न्तरस्य प्रयोजनान्तरस्य चान्वेषणोनानवस्थानात् । तेनायं लक्षणलक्षणाया न विषय इति भावः । दर्शनमिति ण्यन्तो निर्देशः । कर्तव्य इति । अवगमयि- तव्य इत्यर्थः । अमुख्यतेति । बाधकेन विधुरीकृततेत्यर्थः । तस्येति शब्दस्य । दुष्टतैवेति । प्रयोजनावगमस्य सुखसम्पत्तये हि स शब्दः प्रयुज्यते तस्मिन्न- मुख्यार्थे । यदि च 'सिंहो वटुः' इति शौर्यातिशयेऽप्यवगमयितव्ये स्खलद्गतित्वं शब्दस्य तर्हि तत्प्रतीतिं नैव कुर्यादिति किमर्थं तस्य प्रयोगः । उपचारेण करि- ष्यतीति चेत्तत्रापि प्रयोजनान्तरमन्वेष्यं तत्राप्युपचार इत्यनवस्था । अथ न तत्र स्खलद्गतित्वं, तर्हि प्रयोजनेऽवगमयितव्ये न लक्षणाख्यो व्यापारः तत्सा- है, उस प्रयोजन में दूसरा व्यापार है। वह लक्षणा ही नहीं है, क्योंकि स्खलित होती हुई अर्थात् बाधक व्यापार से कुंठित हो रही गति अर्थात् अवबोधनशक्ति जिस शब्द की है, उसका व्यापार लक्षणा है। परन्तु जो शब्द प्रयोजन का बोध कर रहा है, उसका बाधक के साथ योग नहीं है। वैसा होने पर (अर्थात् यदि बाधक को स्वीकार करते हैं तो) वहाँ भी दूसरे निमित्त या दूसरे प्रयोजन का अन्वेषण किया जायगा, ऐसी स्थिति में अनवस्था होगी। तब (जब कि बाधकयोग नहीं है) यह लक्षणलक्षणा का विषय नहीं है, यह तात्पर्य है। 'दर्शन' यह ण्यन्त निर्देश है (अर्थात् दिखाना या बोधन करना)। कर्तव्य अर्थात् अवगमयितव्य। अमुख्यता-। अर्थात् बाधक से विधुर (कुंठित) हो जाना। उस शब्द के। दुष्टता ही-। सुखपूर्वक प्रयोजन का अवगम हो इसलिए वह शब्द अमुख्य अर्थ में प्रयुक्त होता है। और यदि 'सिंहो वटुः' यहाँ बोधनीय शौर्यातिशय में भी शब्द का स्खलद्गतित्व (बाधकयोग) है, तब तो (लक्षक शब्द) उस शौर्यातिशय की प्रतीति को नहीं उत्पन्न करेगा, ऐसी स्थिति में उसका प्रयोग ही क्योंकर होगा? यदि कहिए कि 'उपचार' से करेगा, तब तो वहाँ भी दूसरा प्रयोजन ढूँढ़ना चाहिए, फिर वहाँ भी उपचार होगा, इस प्रकार अनवस्था होगी। जब स्खलद्गतित्व (बाधकयोग) नहीं है, तब तो प्रयोजन के बोधन में 'लक्षणा' नाम का
प्रथम उद्योतः १५९ ध्वन्यालोकः वाचकत्वाश्रयेणैव गुणवृत्तिर्व्यवस्थिता । व्यञ्जकत्वैकमूलस्य ध्वनेः स्याल्लक्षणं कथम् ॥ १८ ॥ तस्मादन्यो ध्वनिरन्या च गुणवृत्तिः । अव्याप्तिरप्यस्य लक्षणस्य । 'वाचकत्व (अर्थात् अभिधा व्यापार) के आश्रय से ही गुणवृत्ति (या लक्षणा) व्यवस्थित है, फिर व्यञ्जकत्व (व्यञ्जना व्यापार) जिसका एकमात्र मूल है, उस ध्वनि का वह लक्षण कैसे हो सकती है ? इस कारण ध्वनि भिन्न है और गुणवृत्ति भिन्न है। इस लक्षण की अव्याप्ति लोचनम् मग्र्यभावात् । न च नास्ति व्यापारः। न चासावभिधा, समयस्य तत्राभावात् । यद्व्यापारान्तरमभिधालक्षणातिरिक्तं स ध्वननव्यापारः। न चैवमिति । न च प्रयोगे दुष्टता काचित्, प्रयोजनस्याविघ्नेनैव प्रतीतेः। तेनाभिधैव मुख्येऽर्थे बाधकेन प्रविवित्सुर्निरुध्यमाना सती अचरितार्थत्वादन्यत्र प्रसरति । अत एव अमुख्योऽस्यायमर्थ इति व्यवहारः । तथैव चामुख्यतया संकेतग्रहणमपि तत्रा- स्तीत्यभिधापुच्छभूतैव लक्षणा ॥ १७ ॥ उपसंहरति—तस्मादिति । यतोऽभिधापुच्छभूतैव लक्षणा, ततो हेतोर्वाच- कत्वमभिधाव्यापारमाश्रिता तद्बाधनेनोत्थानात्तत्पुच्छभूतत्वाच्च गुणवृत्तिः गौणलाक्षणिकप्रकार इत्यर्थः । सा कथं ध्वनेर्व्यञ्जनात्मनो लक्षणं स्यात् ? भिन्नविषयत्वादिति । एतदुपसंहरति—तस्मादिति । यतोऽतिव्याप्तिरुक्ता तत्प्रसङ्गेन च भिन्नविषयत्वं तस्मादित्यर्थः । एवम् व्यापार नहीं है, क्योंकि उसकी सामग्री वहाँ नहीं है । ऐसा नहीं कह सकते कि (वहाँ) व्यापार ही नहीं । फिर वह व्यापार अभिधा नहीं, क्योंकि 'समय' (सङ्केत) का वहाँ अभाव है । जो अभिधा और लक्षणा से अतिरिक्त व्यापार है, वह ध्वनन व्यापार है। परन्तु ऐसा नहीं—। न कि प्रयोग में कोई दोष है, क्योंकि प्रयोजन की बिना किसी विघ्न के, प्रतीति हो जाती है । इसलिए अभिधा ही मुख्य अर्थ में बाधक के कारण बोध की इच्छा रखनेवालों द्वारा रोक दी गई होकर अचरितार्थ होने के कारण अन्यत्र (दूसरे अर्थ में) फैलती है । इसलिए 'यह इसका मुख्य अर्थ है' यह व्यवहार चलता है । उसी प्रकार अमुख्यरूप से संकेत ग्रहण भी वहाँ है, इस प्रकार लक्षणा अभिधा की पुच्छभूत ही है । उपसंहार करते हैं—इस कारण से—। जिस कारण लक्षणा अभिधा की पुच्छभूत ही है, उस कारण वाचकत्वरूप अभिधाव्यापार पर आश्रित, उसके (अभिधा को) पुच्छभूत होने के कारण गुणवृत्ति अर्थात् गौण-लाक्षणिक प्रकार है। वह (गुणवृत्ति) व्यञ्जनारूप 'ध्वनि' का लक्षण कैसे हो सकती है ? क्योंकि (उसका) विषय भिन्न है। इसका उपसंहार करते हैं—उस कारण—। अर्थात् जिस कारण अतिव्याप्ति कही गई
१६० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् ‘अतिव्याप्तेरथाव्याप्तेर्न चासौ लक्ष्यते तया’ इति कारिकागतामतिव्याप्तिं व्याख्यायाव्याप्तिं व्याचष्टे—अव्याप्तिरप्यस्येति । अस्य गुणवृत्तिरूपस्येत्यर्थः । यत्र यत्र ध्वनिस्तत्र तत्र यदि भक्तिर्भवेन्न स्यादव्याप्तिः । न चैवम्; अविवक्षितवाच्येऽस्ति भक्तिः 'सुवर्णपुष्पाम्' इत्यादौ । 'शिखरिणि' इत्यादौ तु सा कथम् । ननु लक्षणा तावद्द्रौणमपि व्याप्नोति । केवलं शब्दस्तमर्थं लक्षयित्वा तेनैव सह सामानाधिकरण्यं भजते-'सिंहो बटुः' इति । अर्थो वाऽर्थान्तरं लक्षयित्वा स्ववाचकेन तद्वाचकं समानाधिकरणं करोति । शब्दार्थौ वा युगपत्तं लक्षयित्वा अन्याभ्यामेव शब्दार्थाभ्यां मिश्रीभवत इत्येवं लाक्षणिकाद् गौणस्य भेदः । यदाह—‘गौणे शब्दप्रयोगः, न लक्षणायाम्' इति, तत्रापि लक्षणास्त्येवेति सर्वत्र सैव व्यापिका । सा च पञ्चविधा । तद्यथा—अभिधेयेन संयोगात्; द्विरेफशब्दस्य हि योऽभिधेयो भ्रमरशब्दः द्वौ रेफौ यस्येति कृत्वा तेन भ्रमरशब्देन यस्य संयोगः सम्बन्धः षट्पदलक्षणस्यार्थस्य सोऽर्थो द्विरेफशब्देन लक्ष्यते, अभिधेयसम्बन्धं व्याख्या- तरूपं निमित्तीकृत्य । सामीप्यात् 'गङ्गायां घोषः' समवायादिति सम्बन्धा- और उसके प्रसंग से (गुणवृत्ति और ध्वनि का) भिन्न-विषयत्व है उस कारण । इस प्रकार 'अतिव्याप्ति' और अव्याप्ति के कारण वह ध्वनि उस (भक्ति) से लक्षित नहीं हो सकता (अर्थात् 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती)' इस 'कारिका' में आई हुई अतिव्याप्ति का व्याख्यान करके अव्याप्ति (लक्ष्य में लक्षण की अप्राप्ति) का व्याख्यान करते हैं—अव्याप्ति भी इसका—। इसका अर्थात् गुणवृत्तिरूप (लक्षण) का जहाँ-जहाँ 'ध्वनि' है वहाँ-वहाँ 'भक्ति' हो तो अव्याप्ति न हो। पर ऐसा नहीं है; अविवक्षितवाच्य में 'भक्ति' है; जैसे 'सुवर्णपुष्पाम्०' इत्यादि में। 'शिखरिणि०' इत्यादि में वह कैसे है ? शङ्का है कि लक्षणा गौण स्थल को भी व्याप्त करती है। केवल ('सिंह') आदि शब्द उस ('बटु' आदि) अर्थ को लक्षित करके उसी ('बटु' आदि शब्द) के साथ सामानाधिकरण्य को प्राप्त करता है। अथवा, ('सिंह' आदि) अर्थ ('बटु' आदि) अर्थान्तर को लक्षित करके अपने वाचक से उसके वाचक को समाना- धिकरण कर देता है। अथवा शब्द और अर्थ दोनों एक ही काल में उस 'बटु' आदि अर्थ को लक्षित करके दूसरे शब्द और अर्थ के साथ मिल जाते हैं। इस प्रकार लाक्षणिक से गौण का भेद है। जैसा कि कहते हैं—'गौण में शब्दप्रयोग होता है, लक्षणा में नहीं।' उस (गौण स्थल) में भी लक्षणा है ही, इस प्रकार वही सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली है। वह पाँच प्रकार की है, वह जैसे कि, अभिधेय के साथ संयोग होने से; 'द्विरेफ' शब्द का जो अभिधेय 'भ्रमर' शब्द है ('दो रेफ हैं जिसके' इसके अनुसार) उस 'भ्रमर' शब्द के साथ जिसका संयोग अर्थात् सम्बन्ध (वाच्यवाचकभावरूप सम्बन्ध) 'षट्पद' रूप अर्थ का है, वह अर्थ व्याख्यात अभिधेय सम्बन्ध को निमित्त करके द्विरेफ' शब्द द्वारा लक्षित होता है। सामीप्य से; जैसे 'गङ्गा में घोष है'। समवाय
प्रथम उद्योतः १६१ ध्वन्यालोकः न हि ध्वनिप्रभेदो विवक्षितान्यपरवाच्यलक्षणः। अन्ये च बहवः प्रकारा भक्त्या व्याप्यन्तः तस्माद्भक्तिरलक्षणम् ॥ १८ ॥ (अपने लक्ष्य में न संगत होना) भी है, क्योंकि विवक्षितान्यपरवाच्य रूप (अभि- धामूल) ध्वनि का प्रभेद और अन्य बहुत से (ध्वनि के) प्रकार भक्ति (लक्षणा) से व्याप्त नहीं हैं, अतः भक्ति ध्वनि का लक्षण नहीं है ॥ १८ ॥ लोचनम् दित्यर्थः, 'यष्टीः प्रवेशय' इति यथा। वैपरीत्यात् यथा-शत्रुमुद्दिश्य कश्चिद् ब्रवीति-'किमिवापकृतं न तेन मम' इति। क्रियायोगादिति कार्यकारणभावा- दित्यर्थः। यथा-अन्नापहारिणि व्यवहारः प्राणानयं हरति इति। एवमनया लक्षणया पञ्चविधया विश्वमेव व्याप्तम्। तथाहि-'शिखरिणि' इत्यत्राकस्मि- कप्रश्नविशेषादिबाधकानुप्रवेशे सादृश्याल्लक्षणास्त्येव। नन्वत्राङ्गीकृतैव मध्ये लक्षणा, कथं तर्ह्युक्तं विवक्षितान्यपरेति ? तद्भेदोऽत्र मुख्योऽसंलक्ष्यक्रमआत्मा विवक्षितः। तद्भेदशब्देन च रसभावतदाभासतत्प्रशमभेदास्तदवान्तरभेदाश्च, न च तेषु लक्षणाया उपपत्तिः। तथाहि-विभावानुभावप्रतिपादके काव्ये मुख्येऽर्थे तावद्बाधकानुप्रवेशोऽप्यसम्भाव्य इति को लक्षणावकाशः ? ननु किं बाधया, इयदेव लक्षणास्वरूपम्-'अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिर्लक्ष- णोच्यते !' इति। इह चाभिधेयानां विभावानुभावादीनामविनाभूता रसादय इति लक्ष्यन्ते, विभावानुभावयोः कार्यकारणरूपत्वात्, व्यभिचारिणां च तत्सह- अर्थात् सम्बन्ध से, जैसे 'लाठियों को प्रवेश करो।' वैपरीत्य से, जैसे-शत्रु को उद्देश्य करके कोई कहता है 'क्या नहीं उसने मेरा उपकार किया है !' क्रियायोग से अर्थात् कार्यकारणभाव से; जैसे-अन्न को चुरानेवाले के प्रति यह व्यवहार करते हैं कि 'यह प्राणहरण करता है'। इस प्रकार इस पंचविध लक्षणा से सारा विश्व ही व्याप्त हो जाता है। जैसा कि 'शिखरिणि०' इस स्थल में आकस्मिक प्रश्न-विशेष आदि बाधक का योग करने पर (भी) सादृश्य से लक्षणा है ही। (इस पर पूछते हैं कि) अगर यहाँ मध्य में लक्षणा मान भी लिया तो यह कहिए कैसे फिर 'विवक्षितान्यपर' ऐसा कहा है (क्योंकि लक्षणा के होने पर वाच्य का विवक्षित होना सम्भव नहीं)। उस विवक्षि- तान्यपरवाच्य का मुख्य भेद असंलक्ष्यक्रमरूप विवक्षित है। 'तद्भेद' शब्द से रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रशम आदि उसके अवान्तरभेद भी हैं, उनमें लक्षणा की उपपत्ति नहीं है। इस प्रकार-विभावानुभाव का प्रतिपादन करनेवाले काव्य में मुख्य अर्थ में बाधक का योग भी सम्भावनीय नहीं, ऐसी स्थिति में लक्षणा का अवसर ही क्या है ? शङ्का है कि बाधा की क्या जरूरत ? लक्षणा का इतना ही स्वरूप है-'अभिधेय के साथ अविनाभूत की (अर्थात् किसी भी सम्बन्ध से सम्बद्ध की) प्रतीति (या प्रतीति का हेतु) लक्षणा है।' और यहाँ रसादि विभाव-अनुभाव आदि अभिधेयों के अविनाभूत ११ ध्व०
१६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् कारित्वादिति चेत्—मैवम् ; धूमशब्दाद् धूमे प्रतिपन्ने ह्यग्निस्मृतिरपि लक्षणा- कृतैव स्यात्, ततोऽग्नेः शीतापनोदस्मृतिरित्यादिरपर्यवसितः शब्दार्थः स्यात् । धूमशब्दस्य स्वार्थविश्रान्तत्वान्न तावति व्यापार इति चेत्, आयातं तर्हि मुख्यार्थबाधो लक्षणाया जीवितमिति, सति तस्मिन्स्वार्थविश्रान्त्यभावात् । न च विभावादिप्रतिपादने बाधकं किञ्चिदस्ति । नन्वेवं धूमावगमनानन्तराग्निस्र्मरणवद्विभावादिप्रतिपत्त्यनन्तरं रत्यादिचित्त- वृत्तिप्रतिपत्तिरिति शब्दव्यापार एवात्र नास्ति । इदं तावदयं प्रतीतिस्वरूपज्ञो मीमांसकः प्रष्टव्यः—किमत्र परचित्तवृत्तिमात्रे प्रतिपत्तिरेव रसप्रतिपत्तिरभि- मता भवतः ? न चैवं भ्रमितव्यम्; एवं हि लोकगतचित्तवृत्त्यनुमानमात्रमिति का रसता ? यस्त्वलौकिकचमत्कारात्मा रसास्वादः काव्यगतविभावादिचर्वणा- प्राणो नासौ स्मरणानुमानादिसाम्येन खिलीकारपात्रीकर्तव्यः । किं तु लौकि- केन कार्यकारणानुमानादिना संस्कृतहृदयो विभावादिकं प्रतिपद्यमान एव न तटस्थ्येन प्रतिपद्यते, अपि तु हृदयसंवादापरपर्यायसहृदयत्वपरवशीकृततया हैं अतः लक्षित होते हैं, क्योंकि रसादि के विभाव और अनुभाव क्रमशः कारण एवं कार्य हैं, और व्यभिचारी भाव उस रसादि के सहकारी हैं। (इस पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं—) इस प्रकार नहीं, क्योंकि ऐसी स्थिति में 'धूम' शब्द से धूम के ज्ञात होने पर अग्नि की स्मृति भी लक्षणाकृत होने लगेगी, तब अग्नि के द्वारा शीतापनोद की स्मृति होने लगेगी, इस प्रकार ('धूम') शब्द का अर्थ पर्यवसित (विश्रान्त) नहीं होगा। यदि कहिए कि 'धूम' शब्द के अपने अर्थ (धूमत्व या धूमविशिष्ट अर्थ) में विश्रान्त होने के कारण अग्नि आदि के अर्थ में व्यापार नहीं है, तब तो मुख्यार्थबाध लक्षणा का जीवित है, यह बात आ गई, उस (मुख्यार्थबाध) के रहते अपने अर्थ में विश्रान्ति नहीं हो सकती। और विभाव आदि के प्रतिपादन में कोई बाधक नहीं है। शङ्का है कि जिस प्रकार धूम के ज्ञान के पश्चात् अग्नि का स्मरण होता है उसी प्रकार विभाव आदि की प्रतीति के पश्चात् रत्यादि चित्तवृत्ति की प्रतीति होती है, इस प्रकार यहाँ शब्द का व्यापार ही नहीं है। (इस शंका पर) प्रतीति के इस स्वरूप को जानने वाले मीमांसक (विचारक) से यह पूछना चाहिये—क्या यहाँ आपको दूसरे की चित्तवृत्ति मात्र (के सम्बन्ध) में जो प्रतीति होती है वही इसकी प्रतीति के रूप में आपको अभिमत है? परन्तु इस प्रकार आपको भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये, क्योंकि ऐसी स्थिति में लोकगत चित्तवृत्ति का (यह) अनुमानमात्र है, रसता कैसी ? जो कि अलौकिक चमत्कार रूप रसास्वाद, जिसका प्राण विभाव आदि की चर्वणा है, वह स्मरणजनित अनुमान के समान खिलीकार (असम्मान) का पात्र करना नहीं चाहिये। किन्तु लौकिक कार्य और कारण के अनुमान आदि से संस्कृत हृदय वाला व्यक्ति विभावादि को (काव्य या नाट्य से) अवगत करता हुआ तटस्थभाव से (अर्थात् ये दूसरे के हैं मेरे नहीं, इस भाव से) अवगम नहीं करता। अपितु हृदय-संवाद नामक
प्रथम उद्योतः १६३ लोचनम् पूर्णीभविष्यद्रसास्वादाङ्कुरीभावेनानुमानस्मरणादिसरणिमनारूढैव तन्मयीभ- वनोचितचर्वणाप्राणतया । न चासौ चर्वणा प्रमाणान्तरतो जाता पूर्वं, येने- दानीं स्मृतिः स्यात् । न चाधुना कुतश्चित्प्रमाणान्तरादुत्पन्ना, अलौकिके प्रत्यक्षाद्यव्यापारात् । अत एवालौकिक एव विभावादिव्यवहारः । यदाह— ‘विभावो विज्ञानार्थः लोके कारणमेवाभिधीयते न विभावः । अनुभावोऽप्य- लौकिक एव । ‘यदयमनुभावयति वागङ्गसत्त्वकृतोऽभिनयस्तस्मादनुभाव’ इति । तच्चित्तवृत्तितन्मयीभवनमेव ह्यनुभवनम् । लोके तु कार्यमेवोच्यते नानुभावः । अत एव परकीया न चित्तवृत्तिर्गम्यत इत्यभिप्रायेण ‘विभावानु- भावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’ इति सूत्रे स्थायिग्रहणं न कृतम् । तत्प्र- त्युत शल्यभूतं स्यात् । स्थायिनस्तु रसीभाव औचित्यादुच्यते, तद्विभावानु- भावोचितचित्तवृत्तिसंस्कारसुन्दरचर्वणोदयात् । हृदयसंवादोपयोगिलोकचित्त- वृत्तिपरिज्ञानावस्थायामुद्यानपुलकादिभिः स्थायीभूतरत्याद्यवगमाच्च । व्यभि- चारी तु चित्तवृत्त्यात्मत्वेऽपि मुख्यचित्तवृत्तिपरवश एव चर्व्यत इति विभावा- नुभावमध्ये गणितः । अत एव रस्यमानताया एषैव निष्पत्तिः, यत्प्रबन्धप्रवृत्त- सहृदयत्व के परवश होने के कारण पूर्णता को प्राप्त करने वाले रसास्वाद के अंकुरी- भाव से, अनुमान और स्मरण आदि की सरणि पर आरूढ़ हुये बिना ही, तन्मय होने के उचित चर्वणा के उपयोग से (विभावादि को अवगत करता है)। पहले वह ‘चर्वणा’ प्रमाणान्तर से उत्पन्न नहीं हो चुकी होती है, जिससे इस समय उसे ‘स्मृति’ कहते, और न कि इस समय प्रमाणान्तर से उत्पन्न हो रही है, क्योंकि अलौकिक वस्तु में प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों का व्यवहार नहीं होता। जैसा कि कहा है—विभाव विशेष ज्ञान की वस्तु है—वह लोक में ‘कारण’ ही कहा जाता है, विभाव नहीं । अनुभाव भी अलौकिक ही होता है। जो कि यह वाणी, अङ्ग और सत्त्व से किया हुआ अभिनय अनुभवन कराता है, उस कारण अनुभाव है।’ उन चित्तवृत्तियों से तन्मय हो जाना ही अनुभवन है। उसे लोक में कार्य ही कहते हैं, न कि अनुभाव। इसीलिये परकीय चित्तवृत्ति को (सामाजिक लोग) नहीं अनुभव करते, इस अभिप्राय से ‘विभाव’ अनुभाव और व्यभिचारी के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है’ इस सूत्र में स्थायी का ग्रहण नहीं किया। उसका ग्रहण प्रत्युत शल्यभूत (विरुद्ध) हो जाता । स्थायी भाव का रसीभाव (रस के रूप में परिणत होना) औचित्य के कारण कहा जाता है, क्योंकि वह (औचित्य) विभाव, अनुभाव और उचित चित्तवृत्ति के संस्कार से सुन्दर चर्वणा के उदय से होता है। और हृदय-संवाद की उपयोगिनी लोक-चित्तवृत्ति के परिज्ञान की अवस्था में उद्यान और पुलक आदि द्वारा स्थायीभूत रति आदि के अवगम से (औचित्य) होता है। चित्तवृत्ति रूप होने पर भी व्यभिचारी मुख्य चित्तवृत्ति के परवश ही होकर चर्वित होता है, अतः उसकी गणना विभाव-अनुभाव के बीच ही की गई है। अतएव रस्यमानता की यही निष्पत्ति है कि जो समय से प्रवृत्त बन्धु-समागम आदि कारण से
लोचनम् बन्धुसमागमादिकारणोदितहर्षादिलौकिकचित्तवृत्तिन्यग्भावेन चर्वणारूप- त्वम्। अतश्चर्वणात्राभिव्यञ्जनमेव, न तु ज्ञापनम्, प्रमाणव्यापारवत्। नाप्यु- त्पादनम्, हेतुव्यापारवत्। ननु यदि नेयं ज्ञप्तिर्न वा निष्पत्तिः, तर्हि किमेतत् ? न न्वयमसावलौकिको रसः। ननु विभावादिरत्र किं ज्ञापको हेतुः, उत कारकः ? न ज्ञापको न कारकः, अपि तु चर्वणोपयोगी। ननु क्वैतद् दृष्टमन्यत्र। यत एव न दृष्टं तत एवालौकि- कमित्युक्तम्। नन्वेवं रसोऽप्रमाणं स्यात्; अस्तु, किं ततः ? तच्चर्वणात एव प्रीतिव्युत्पत्तिसिद्धेः किमन्यदर्थनीयम्। नन्वप्रमाणकमेतत्; न, स्वसंवेदन- सिद्धत्वात्। ज्ञानविशेषस्यैव चर्वणात्मकत्वात् इत्यलं बहुना। अतश्च रसोऽयम- लौकिकः। येन ललितपरुषानुप्रासस्यार्थाभिधानानुपयोगिनोऽपि रसं प्रति व्यञ्जकत्वम्; का तत्र लक्षणायाः शङ्कापि ? काव्यात्मकशब्दनिष्पीडनेनैव तच्चर्वणा दृश्यते। दृश्यते हि तदेव काव्यं पुनः पुनः पठंश्चर्व्यमाणश्च सहृदयो लोकः, न तु काव्यस्य; तत्र ‘उपादायापि ये हेया' इति न्यायेन कृतप्रतीतिक- स्यानुपयोग एवेति शब्दस्यापीह ध्वननव्यापारः। अत एवालक्ष्यक्रमता। उत्पन्न हर्ष आदि लौकिक चित्तवृत्ति के न्यग्भाव से चर्वणा की स्थिति है। इसलिये चर्वणा यहाँ अभिव्यंजन ही है न कि ज्ञापन, (इन्द्रिय आदि) प्रमाणों के व्यापार की भाँति, और (चर्वणा) उत्पादन रूप (व्यापार) भी नहीं है, (दण्ड, चक्र आदि) हेतु के व्यापार की भांति। शङ्का है कि यदि यह (रसचर्वणा) न ज्ञप्ति है और न तो निष्पत्ति है, तो फिर है क्या ? (उत्तर में कहते हैं कि) रस तो अलौकिक है। तब जब प्रश्न उठता है कि विभावादि यहाँ ज्ञापक हेतु है अथवा कारक हेतु ? (इसका उत्तर यह है कि) वह न तो ज्ञापक हेतु है और न तो कारक, बल्कि वह चर्वणा का उपयोगी है। (तब प्रश्न है कि) यह कहाँ देखा है ? (इसका उत्तर यह है कि) जिस कारण नहीं देखा उसी कारण ‘अलौकिक' कहा। तब तो इस प्रकार रस अप्रमाण होगा ! (उत्तर है कि) हो, उससे क्या ? जब उसकी चर्वणा से ही प्रीति और व्युत्पत्ति सिद्ध हो जाती हैं तो और क्या चाहिये ? (शङ्का है कि) इस कथन का कोई प्रमाण नहीं, (समाधान है) कि नहीं, यह बात अपने संवेदन से सिद्ध है, क्योंकि चर्वणा ज्ञानविशेष रूप ही है। अब बहुत कहना व्यर्थ है। इसलिये यह रस अलौकिक है। जिस कारण अर्थ के अभिधान के उपयोगी न होने वाले ललित एवं परुष अनुप्रास का भी रस के प्रति व्यंजकत्व है फिर लक्षणा की शंका भी कैसे सम्भव है। काव्यात्मक शब्द के निष्पीडन से ही रस की चर्वणा देखी जाती है। क्योंकि सहृदय को बार-बार काव्य पढ़ते हुये और चर्वणा करते हुये देखते हैं, न कि काव्य रूप शब्द का (चर्वण करते हुये देखते हैं); इस प्रकार वहाँ ‘उपादान करके भी जो त्याज्य हैं' इस न्याय के अनुसार जिसकी प्रतीति कर ली गई उसका उपयोग ही नहीं, इसलिये शब्द का भी ‘ध्वनन' व्यापार
प्रथम उद्योतः १६५ लोचनम् यत्तु वाक्यभेदः स्यादिति केनचिदुक्तम्, तदनभिज्ञतया। शास्त्रं हि सकृदुच्चा- रितं समयबलेनार्थं प्रतिपादयद्युगपद्विरुद्धानेकसमयस्मृत्ययोगात्कथमर्थद्वयं प्रत्याययेत्। अविरुद्धत्वे वा तावानेको वाक्यार्थः स्यात्। क्रमेणापि विरम्य- व्यापारायोगः। पुनरुच्चारितेऽपि वाक्ये स एव, समयप्रकरणादेस्तादवस्थ्यात्। प्रकरणसमयप्राप्यार्थतिरस्कारेणार्थान्तरप्रत्यायकत्वे नियमाभाव इति तेन 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति श्रुतौ 'खादेच्छ्वमांसमित्येष नार्थ इत्यत्र का प्रमे'ति प्रसज्यते। तत्रापि न काचिदियत्तेत्यनाश्वासता इत्येवं वाक्यभेदो दूषणम्। इह तु विभावाद्येव प्रतिपाद्यमानं चर्वणाविषयतोन्मुखमिति समया- द्युपयोगाभावः। न च नियुक्तोऽहमत्र करवाणि, कृतार्थोऽहमिति शास्त्रीयप्रती- तिसदृशमदः। तत्रोत्तरकर्तव्योन्मुख्येन लौकिकत्वात्। इह तु विभावादिचर्व- णाद्भूतपुष्पवत्तत्कालसारैवोदिता न तु पूर्वापरकालानुबन्धिनीति लौकिकादा- स्वादाद्योगिविषयाच्चान्य एवायं रसास्वादः। अत एव 'शिखरिणि' इत्यादावपि मुख्यार्थबाधादिक्रममनपेक्ष्यैव सहृदया वक्त्रभिप्रायं चाटुप्रीत्यात्मकं संवेदयन्ते। है। अतएव उसकी अलक्ष्यक्रमता है। जो कि वाक्यभेद होगा (अर्थात् एक ही काव्य- वाक्य के वाच्य और व्यंग्य दोनों अर्थों के बोधक होने के कारण वाक्यभेद होगा) यह किसी ने कहा है, वह अनभिज्ञता के कारण है, क्योंकि शास्त्र एक बार उच्चरित होकर समय (संकेत) के बल से अर्थ का प्रतिपादन करता हुआ एक ही काल में विरुद्ध अनेक संकेतों की स्मृति के न होने के कारण कैसे दो अर्थों का प्रत्यायन करेगा ! अविरुद्ध होने पर उतना एक ही वाक्यार्थ होगा। क्रम से भी, एक व्यापार के विरत हो जाने के पश्चात् व्यापार नहीं होता। यदि पुनः वाक्य का उच्चारण कीजिएगा तब भी वही समय (संकेत) और प्रकरण आदि उसी प्रकार बने रहेंगे। प्रकरण और समय (संकेत) से प्राप्त होनेवाले अर्थ को तिरस्कार करके दूसरे अर्थ के प्रत्यायक (बोधक) होने में कोई नियम नहीं है। इस कारण 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इस वेदवाक्य में 'श्वमांस का भक्षण करे' यह अर्थ नहीं है, यहाँ कौन प्रमा है यह बात प्रसक्त होगी। वहाँ दूसरे अर्थ में भी कोई इयत्ता नहीं है, इस प्रकार (अनिश्चितार्थक होने के कारण वाक्य में बोधकता नहीं, इस प्रकार) वाक्यभेद दोष ठहरता है। यहाँ (काव्य में) विभावादि ही प्रतिपाद्यमान होकर चर्वणा के विषय होने के लिए उन्मुख हैं, ऐसी स्थिति में संकेत आदि का कोई उपयोग नहीं। 'मैं इसमें नियुक्त हूँ', 'मैं कर रहा हूँ', 'मैं कर चुका' इस प्रकार की शास्त्रीय प्रतीति के समान काव्यजन्य प्रतीति नहीं है, क्योंकि शास्त्रीय प्रतीति में उत्तरकाल में जो कर्त्तव्य है उसके प्रति उन्मुखता होने के कारण लौकिकता है। परन्तु यहाँ (काव्य में) ऐन्द्रजालिक पुष्प की भाँति विभावादि चर्वणा उसी समय ही पूर्णरूप से उदित होती है, न कि पूर्वापरकाल की अनुबन्धिनी है, इस प्रकार यह रसास्वाद लौकिक आस्वाद से और योगी के विषय से दूसरा ही है। इसीलिए 'शिखरिणि०' इत्यादि पद्य में भी मुख्यार्थ के बाध आदि की
१६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् अत एव ग्रन्थकारः सामान्येन विवक्षितान्यपरवाच्ये ध्वनौ भक्तेरभावमभ्य- धात्। अस्माभिस्तु दुर्दुरूढं प्रत्याययितुमुक्तम्-भवत्वत्र लक्षणा, अलक्ष्यक्रमे तु कुपितोऽपि किं करिष्यसीति । यदि तु न कुप्यते 'सुवर्णपुष्पाम्' इत्यादावविव- क्षितवाच्येऽपि मुख्यार्थबाधादिलक्षणासामग्रीमनपेक्ष्यैव व्यङ्ग्यार्थविश्रान्तिरि- त्यलं बहुना । उपसंहरति—तस्माद्भक्तिरिति ॥ १८ ॥ अपेक्षा न करके ही सहृदय लोग चाटुप्रतीतिरूप वक्ता के अभिप्राय को समझते हैं। अतएव ग्रन्थकार ने सामान्यरूप से विवक्षितान्यपरवाच्य¹ ध्वनि में भक्ति का अभाव कहा है। हमने तो नास्तिकता की वाणी के ग्रह से ग्रस्त व्यक्ति को समझाने के लिए कहा है—'हो यहाँ लक्षणा, परन्तु अलक्ष्यक्रमध्वनि में कुपित होकर भी क्या करोगे ? यदि कुपित नहीं होते हो तो 'सुवर्णपुष्पाम्०' इत्यादि अविवक्षितवाच्य ध्वनि में भी मुख्यार्थबाध आदि लक्षणा की सामग्री की अपेक्षा न करके ही व्यङ्ग्य अर्थ की विश्रान्ति हो जाती है। बहुत कहना व्यर्थ है। उपसंहार करते हैं—इसलिए भक्ति—। १. विस्तृत 'लोचन' का कुछ स्पष्टीकरण यह है कि लक्षणा का वही विषय हो सकता है जहाँ किसी प्रकार का बाधक उपस्थित होता है। जैसे 'गङ्गा में घोष' इस स्थल में गङ्गा और घोष में आधाराधेयभाव की अनुपपत्तिरूप बाधक का योग है अतः यहाँ लक्षणा व्यापार क्रियाशील होता है। अब यदि चतुर्थ व्यञ्जना व्यापार के विषय प्रयोजन को भी तृतीय लक्षणा व्यापार का विषय बनाने की चेष्टा करते हैं तो कहिए कि यहाँ बाधक का योग या स्खलद्गति क्या है ? स्वयं 'प्रयोजन' शब्द ही इस बात का सूचक है कि यहाँ कोई बाधा नहीं, क्यों कि जिस उद्देश्य को सूचित करने के लिए कोई बाधित बात कही जाय तो स्वयं उद्देश्य कैसे बाधक-योग से युक्त होगा ? किसी प्रकार यदि 'प्रयोजन' में भी लक्षणा को ही मानते हैं तब प्रयोजन के प्रयोजन की बात उपस्थित होती है, इस प्रकार अनवस्था होगी अतः 'प्रयोजन' को एक मात्र व्यञ्जना का ही विषय मानना होगा, न कि लक्षणा का। यह विषय 'काव्यप्रकाश' में भी निर्दिष्ट है। लक्षणा को अभिधा का 'पुच्छभूत' कहा है। क्योंकि जब अभिधा मुख्य अर्थ में बाधक से रोक दी जाती है तब स्वयं एक प्रकार से अचरितार्थ हो कर अन्य अर्थ की ओर चल पड़ती है। इस प्रकार लक्षणा उपस्थित होकर अमुख्य अर्थ को बोधित करती है। वहाँ भी अमुख्य रूप से संकेत ग्रहण होता है। ऐसी स्थिति में बिना अभिधा के लक्षणा का कोई अवसर ही नहीं, इस कारण लक्षणा अभिधापुच्छभूत कही जाती है। कहने का तात्पर्य यह कि जब लक्षणा अभिधा की पूंछ बन कर रहती है तब वह व्यञ्जन रूप ध्वनि का मुकाबला क्या कर सकती है? अतः लक्षणा (भक्ति) को ध्वनि का लक्षण नहीं माना जा सकता। ध्वनि का विषय भिन्न होता है और लक्षणा का भिन्न। इस प्रकार लक्ष्य से अतिरिक्त स्थल में भी लक्षण की प्राप्तिरूप अतिव्याप्ति दोष ध्वनि का लक्षण 'भक्ति' को मानने पर होगा। तथा ऐसा करने पर लक्ष्य में अप्राप्तिरूप अव्याप्ति भी होगी। जैसे विवक्षितान्यपरवाच्य रूप ध्वनि में लक्षणा का प्रसंग न होने के कारण ध्वनि का 'भक्ति' रूप लक्षण अव्याप्त होगा। पुनश्च, 'लोचन' में लक्षणा के इन पाँच रूपों का निर्देश आचार्य ने उदाहरण के साथ किया है—
प्रथम उद्योतः १६७ ध्वन्यालोकः कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम् । वह ध्वनि के किसी भेद का उपलक्षण हो सकती है। लोचनम् ननु मा भूद् ध्वनिरिति भक्तिरिति चैकं रूपम्। मा च भूद्भक्तिर्ध्वनेर्लक्षणम्। उपलक्षणं तु भविष्यति; यत्र ध्वनिर्भवति, तत्र भक्तिरप्यस्तीति भक्त्युपलक्षितो ध्वनिः। न तावदेतत्सर्वत्रास्ति, इयता च किं परस्य सिद्धं ? किं वा नः त्रुटितम् ? शङ्का है कि ध्वनि और भक्ति दोनों एकरूप न हों और 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण भी न हो, परन्तु उपलक्षण तो होगी ? जहाँ ध्वनि है वहाँ भक्ति भी है, इस प्रकार ध्वनि भक्ति से उपलक्षित है । ( इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि ) यह ( उपलक्षण ) अभिधेयेन सामीप्यात् संयोगात्समवायतः । वैपरीत्यात् क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ॥ इस प्रकार 'शिखरिणि०' इस श्लोक में आकस्मिक प्रश्न-विशेष आदि रूप बाधक को लेकर सादृश्य से लक्षणा होगी, ऐसी स्थिति में लक्षणा या भक्ति को विवक्षितान्यपरवाच्य रूप में ध्वनि के स्थल में भी व्याप्त होने पर अव्याप्ति न होगी । इस पर 'लोचनकार' ने विशेष रूप से अन्त में यह कहा है कि यहाँ यद्यपि मुख्यार्थ का बाध सम्भव है किन्तु सहृदय को उसकी अपेक्षा ही नहीं होती, बल्कि वे लोग यहाँ वक्ता के—चाटु प्रीति रूप अभिप्राय को ही यहाँ विदित करते हैं। अतः यहाँ लक्षणा के प्रसंग की कल्पना अनावश्यक है। असल में ध्वनि के जिस स्थल में लक्षणा का कोई सम्पर्क सम्भावित नहीं, वह है असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य, अर्थात् रसादि ध्वनि । काव्य द्वारा विभावानु- भाव का जो प्रतिपादन होता है वहाँ रंचमात्र भी बाधक का अनुप्रवेश नहीं। ऐसी स्थिति में 'भक्ति' रूप लक्षण अपने लक्ष्य में प्राप्त न होने से अव्याप्त होगा । तब मीमांसक-पक्ष से शङ्का करते हैं, कि हमें 'लक्षणा' पूर्वोक्त स्वरूप की मान्य नहीं, बल्कि, लक्षणा अभिधेय की अविनाभूतप्रतीति है। अर्थात् अभिधेय के साथ किसी न किसी सम्बन्ध से सम्बद्ध की प्रतीति ही लक्षणा है। इस प्रकार अभिधेय रूप विभाव-अनुभाव के अविनाभूत रसादि लक्षणा का विषय होंगे। फिर यह समस्या नहीं जाती है कि असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य में लक्षणा की प्राप्ति नहीं है । उसके उत्तर में आचार्य ने पहले 'लक्षणा' के इस लक्षण का ही खण्डन किया । उनके अनुसार जब अभिधेय की अविनाभूतप्रतीति ही लक्षणा होगी तब तो 'धूम' शब्द से धूम के ज्ञान होने पर उससे अविनाभूत अग्निस्मृति को भी आप लक्षणा का कार्य ही स्वीकार करेंगे और तत्पश्चात् अग्नि से शीतापनोदन की स्मृति को भी 'धूम' का शब्दार्थ मानेंगे, इस प्रकार इतने शब्दार्थों की कल्पना करनी पड़ेगी कि जिसका कोई अन्त नहीं । अन्ततोगत्वा आपको मुख्यार्थ बाध को लक्षणा का बीज मानना ही पड़ेगा। इस प्रकार विभाव आदि में बाधक का अभाव होने से लक्षणा का सम्पर्क नहीं है, यह बात तदवस्थ रहती है ।