भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 487, कुल 680 में से

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पृष्ठ 487

तृतीय उद्योतः ४२७ ध्वन्यालोकः भवति इति दर्शनं तन्मतेनोच्यते । मतान्तरेऽपि रसानां स्थायिनो भावा उपचाराद्रसशब्देनोक्तास्तेषामङ्गत्वं निर्विरोधमेव ॥ २४ ॥ एवमविरोधिनां विरोधिनां च प्रबन्धस्थेनाङ्गिना रसेन समावेशे साधारणमविरोधोपायं प्रतिपाद्येदानीं विरोधिविषयमेव तं प्रतिपाद- यितुमिदमुच्यते— विरुद्धैकाश्रयो यस्तु विरोधी स्थायिनो भवेत् । स विभिन्नाश्रयः कार्यस्तस्य पोषेऽप्यदोषता ॥ २५ ॥ ऐकाधिकरण्यविरोधी नैरन्तर्यविरोधी चेति द्विविधो विरोधी । चारी होता है। किन्तु मतान्तर में भी रसों के स्थायी भाव उपचार से (लक्षणा द्वारा) 'रस' शब्द से कहे गए हैं, उनका अङ्गत्व निर्विरोध ही है ॥ २४ ॥ इस प्रकार अविरोधी और विरोधी (रसों) का प्रबन्ध में रहने वाले अङ्गी रस के साथ समावेश में अविरोध का साधारण उपाय प्रतिपादन करके अब उस विरोधी (रस) के उसे ही प्रतिपादन करने के लिए यह कहते हैं— स्थायी का जो विरोधी एकाश्रय रूप से विरोधी हो उसे विभिन्नाश्रय कर देना चाहिए, (ऐसी स्थिति में) उसके परिपोष होने पर भी दोष नहीं ॥ २५ ॥ विरोधी (रस) दो प्रकार का है—ऐकाधिकरण्यविरोधी और नैरन्तर्यविरोधी । विरुद्ध एक आश्रय वाला जो विरोधी है, जैसे वीर के साथ भयानक, उसे विभिन्नाश्रय लोचनम् मिति समासं पठन्ति । तदाह—मतान्तरेऽपीति । रसशब्देनेति । 'रसान्तर- समावेशः प्रस्तुतस्य रसस्य यः' इत्यादिप्राक्तनकारिकानिविष्टेनेत्यर्थः ॥ २४ ॥ अथ साधारणं प्रकारमुपसंहरन्नसाधारणमासूत्रयति—एवमिति । तमित्यवि- रोधोपायम् । विरुद्धेति विशेषणं हेतुगर्भम् । यस्तु स्थायी स्थाय्यन्तरेणासंभाव्य- मानैकाश्रयत्वाद्विरोधी भवेद्यथोत्साहेन भयं स विभिन्नाश्रयत्वेन नायकविपक्षा- समास पढ़ते हैं। उसे कहते हैं—मतान्तर में भी—। 'रस' शब्द से—। अर्थात् 'प्रस्तुत रस का जो रसान्तर में समावेश है' इत्यादि प्राचीन कारिका में निविष्ट ('रस' शब्द से) ॥ २४ ॥ अब साधारण प्रकार का उपसंहार करते हुए असाधारण (प्रकार) का सूत्र बनाते हैं—इस प्रकार—। 'उसे' अर्थात् अविरोध का उपाय । 'विरुद्ध' यह हेतुगर्भ विशेषण है। जो स्थायी अन्य स्थायी के साथ एकाश्रय रूप से रहने में सम्भव न होने कारण विरोधी हो, जैसे उत्साह के साथ भय, वह विभिन्नाश्रय रूप से नायक के विपक्ष आदि में