ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
पृष्ठ 488, कुल 680 में से
संदर्भ में पढ़ें४२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र प्रबन्धस्थेन स्थायिनाऽङ्गिना रसेनाौचित्यापेक्षया विरुद्धैकाश्रयो यो विरोधी यथा वीरेण भयानकः स विभिन्नाश्रयः कार्यः । तस्य वीरस्य य आश्रयः कथानायकस्तद्विपक्षविषये सन्निवेशयितव्यः । तथा सति च तस्य विरोधिनोऽपि यः परिपोषः स निर्दोषः । विपक्ष- विषये हि भयातिशयवर्णने नायकस्य नयपराक्रमादिसम्पत्सुतरामु- द्योतिता भवति । एतच्च ऽमदीयेऽर्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालावतरण- प्रसङ्गे वैशद्येन प्रदर्शितम् । एवमैकाधिकरण्यविरोधिनः प्रबन्धस्थेन स्थायिना रसेनाङ्गभाव- कर देना चाहिए । उस वीर ( रस ) का जो आश्रय कथानायक है उसके विपक्ष ( अर्थात् प्रतिनायक ) में ( उस भयानक रस ) का सन्निवेश करना चाहिए । ऐसी स्थिति में उस विरोधी का भी जो परिपोष है वह निर्दोष है । क्योंकि विपक्ष में अतिशय भय के वर्णन करने पर नायक की नीति, पराक्रम आदि सम्पत्ति सुतरां प्रकाशित हो जाती है । यह मेरे 'अर्जुनचरित' में अर्जुन के पातालावतरण के प्रसंग में स्पष्ट रूप से दिखाया गया है । इस प्रकार ऐकाधिकरण्यविरोधी का प्रबन्ध में रहने वाले स्थायी रस के साथ लोचनम् दिगामित्वेन कार्यः । तस्येति । तस्य विरोधिनोऽपि तथाकृतस्य तथानिबद्धस्य परिपुष्टतायाः प्रत्युत निर्दोषता नायकोत्कर्षाधानात् । अपरिपोषणन्तु दोष एवेति यावत् । अपिशब्दो भिन्नक्रमः । एवमेव वृत्तावपि व्याख्यानात् । ऐकाधिकरण्यमेकाश्रयेण सम्बन्धमात्रम्, तेन विरोधी यथा—भयेनोत्साहः, एकाश्रयत्वेऽपि सम्भवति कश्चिन्निरन्तरत्वेन निर्व्यवधानत्वेन विरोधी, यथा रत्या निर्वेदः । प्रदर्शितमिति । 'समुत्थिते धनुर्ध्वनौ भयावहे किरीटिनो महानुपप्लवोऽभवत्पुरे पुरन्दरद्विषाम् ।' इत्यादिना ॥ २५ ॥ जाने वाला किया जाना चाहिए । उसका— । उस प्रकार निबद्ध उस विरोधी की भी परिपुष्टता के कारण प्रत्युत निर्दोषता होगी, क्योंकि नायक के उत्कर्ष का आधान होता है । अपरिपोषण तो दोष ही होगा । 'भी' शब्द भिन्नक्रम है । क्योंकि इसी प्रकार वृत्ति में भी व्याख्यान है । ऐकाधिकरण्य अर्थात् एक आश्रय से सम्बन्ध मात्र, उससे विरोधी, जैसे भय से उत्साह । एकाश्रयत्व के सम्भव होने पर भी कोई नैरन्तर्य अर्थात् निर्व्यव- धानत्व के कारण विरोधी होता है, जैसे रति से निर्वेद दिखाया गया है— । 'अर्जुन के गाण्डीव की भयावह आवाज के होने पर इन्द्र-शत्रु असुरों के नगर में बड़ी खलबली मच गई' इत्यादि द्वारा ॥ २५ ॥