ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय उद्योतः ४२९ ध्वन्यालोकः गमने निर्विरोधित्वं यथा तथा प्रदर्शितम्। द्वितीयस्य तु तत्प्रतिपाद- यितुमुच्यते— एकाश्रयत्वे निर्दोषो नैरन्तर्ये विरोधवान् । रसान्तरव्यवधिना रसो व्यङ्ग्यः सुमेधसा ॥ २६ ॥ यः पुनरेकाधिकरणत्वे निर्विरोधो नैरन्तर्ये तु विरोधी स रसान्त- रव्यवधानेन प्रबन्धे निवेशयितव्यः । यथा शान्तशृङ्गारौ नागानन्दे निवेशितौ । अङ्गभाव प्राप्त करने में निर्विरोधत्व जैसा है वैसा उसे दिखाया । दूसरे का उसे प्रति- पादन करने के लिए कहते हैं— एकाश्रय होने में निर्दोष और नैरन्तर्य में विरोधी रस को सुमेधा (कवि) रसान्तर का व्यवधान करने से व्यञ्जित करे ॥ २६ ॥ जो एकाधिकरण होने में निर्विरोध है, किन्तु नैरन्तर्य में विरोधी है उसे रसान्तर के व्यवधान से प्रबन्ध में निवेशित करना चाहिए । जैसे शान्त और शृङ्गार नागानन्द में निवेशित किए गए हैं । लोचनम् द्वितीयस्येति । नैरन्तर्यविरोधिनः । तदिति । निर्विरोधित्वम् । एकाश्रयत्वेन निमित्तेन यो निर्दोषः न विरोधी किं तु निरन्तरत्वेन निमित्तेन विरोधमेति स तथाविधविरुद्धरसद्वयाविरुद्धेन रसान्तरेण मध्ये निवेशितेन युक्तः कार्य इति कारिकार्थः । प्रबन्ध इति बाहुल्यापेक्षं, मुक्तकेऽपि कदाचिदेवं भवेदपि । यद्वक्ष्यति—‘एकवाक्यस्थयोरपि’ इति । यथेति । तत्र हि—‘रागस्यास्पदमित्य- वैमि न हि मे ध्वंसीति न प्रत्ययः’ इत्यादिनोपक्षेपात्प्रभृति परार्थशरीरवित- रणात्मकनिर्वहणपर्यन्तः शान्तो रसस्तस्य विरुद्धो मलयवतीविषयः शृङ्गार- स्तदुभयाविरुद्धमद्भुतमन्तरीकृत्य क्रमप्रसरसम्भावनाभिप्रायेण कविना दूसरे का—। अर्थात् नैरन्तर्यविरोधी का । उसे—। निर्विरोधित्व को । कारिका का अर्थ यह है कि एकाश्रयत्व रूप कारण से जो निर्दोष अर्थात् विरोधी नहीं है, किन्तु निरन्तरत्व रूप कारण से विरोध ग्रहण करता है उसे उस प्रकार के विरुद्ध दो रसों के बीच अविरुद्ध रसान्तर के साथ युक्त करना चाहिए । प्रबन्ध में—। अपेक्षा करके बहुल रूप से, कदाचित् उस प्रकार मुक्तक में भी हो सकता है । जिसे कहेंगे—‘एक वाक्य में स्थित का भी’ । जैसे—। क्योंकि वहां—‘जिस (शरीर) का राग का आस्पद’ करके समझता हूं, (वह शरीर) मेरा विश्वास नहीं कि ध्वंसशील नहीं है !' इत्यादि ‘उपक्षेप’ से लेकर दूसरे के लिए शरीर का वितरण रूप ‘निर्वहण’ तक शान्त रस है, उसके विरुद्ध मलयवतीविषयक शृङ्गार को, उन दोनों (शान्त और शृङ्गार) के अविरुद्ध अद्भुत