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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

४२८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र प्रबन्धस्थेन स्थायिनाऽङ्गिना रसेनाौचित्यापेक्षया विरुद्धैकाश्रयो यो विरोधी यथा वीरेण भयानकः स विभिन्नाश्रयः कार्यः । तस्य वीरस्य य आश्रयः कथानायकस्तद्विपक्षविषये सन्निवेशयितव्यः । तथा सति च तस्य विरोधिनोऽपि यः परिपोषः स निर्दोषः । विपक्ष- विषये हि भयातिशयवर्णने नायकस्य नयपराक्रमादिसम्पत्सुतरामु- द्योतिता भवति । एतच्च ऽमदीयेऽर्जुनचरितेऽर्जुनस्य पातालावतरण- प्रसङ्गे वैशद्येन प्रदर्शितम् । एवमैकाधिकरण्यविरोधिनः प्रबन्धस्थेन स्थायिना रसेनाङ्गभाव- कर देना चाहिए । उस वीर ( रस ) का जो आश्रय कथानायक है उसके विपक्ष ( अर्थात् प्रतिनायक ) में ( उस भयानक रस ) का सन्निवेश करना चाहिए । ऐसी स्थिति में उस विरोधी का भी जो परिपोष है वह निर्दोष है । क्योंकि विपक्ष में अतिशय भय के वर्णन करने पर नायक की नीति, पराक्रम आदि सम्पत्ति सुतरां प्रकाशित हो जाती है । यह मेरे 'अर्जुनचरित' में अर्जुन के पातालावतरण के प्रसंग में स्पष्ट रूप से दिखाया गया है । इस प्रकार ऐकाधिकरण्यविरोधी का प्रबन्ध में रहने वाले स्थायी रस के साथ लोचनम् दिगामित्वेन कार्यः । तस्येति । तस्य विरोधिनोऽपि तथाकृतस्य तथानिबद्धस्य परिपुष्टतायाः प्रत्युत निर्दोषता नायकोत्कर्षाधानात् । अपरिपोषणन्तु दोष एवेति यावत् । अपिशब्दो भिन्नक्रमः । एवमेव वृत्तावपि व्याख्यानात् । ऐकाधिकरण्यमेकाश्रयेण सम्बन्धमात्रम्, तेन विरोधी यथा—भयेनोत्साहः, एकाश्रयत्वेऽपि सम्भवति कश्चिन्निरन्तरत्वेन निर्व्यवधानत्वेन विरोधी, यथा रत्या निर्वेदः । प्रदर्शितमिति । 'समुत्थिते धनुर्ध्वनौ भयावहे किरीटिनो महानुपप्लवोऽभवत्पुरे पुरन्दरद्विषाम् ।' इत्यादिना ॥ २५ ॥ जाने वाला किया जाना चाहिए । उसका— । उस प्रकार निबद्ध उस विरोधी की भी परिपुष्टता के कारण प्रत्युत निर्दोषता होगी, क्योंकि नायक के उत्कर्ष का आधान होता है । अपरिपोषण तो दोष ही होगा । 'भी' शब्द भिन्नक्रम है । क्योंकि इसी प्रकार वृत्ति में भी व्याख्यान है । ऐकाधिकरण्य अर्थात् एक आश्रय से सम्बन्ध मात्र, उससे विरोधी, जैसे भय से उत्साह । एकाश्रयत्व के सम्भव होने पर भी कोई नैरन्तर्य अर्थात् निर्व्यव- धानत्व के कारण विरोधी होता है, जैसे रति से निर्वेद दिखाया गया है— । 'अर्जुन के गाण्डीव की भयावह आवाज के होने पर इन्द्र-शत्रु असुरों के नगर में बड़ी खलबली मच गई' इत्यादि द्वारा ॥ २५ ॥

तृतीय उद्योतः ४२९ ध्वन्यालोकः गमने निर्विरोधित्वं यथा तथा प्रदर्शितम्। द्वितीयस्य तु तत्प्रतिपाद- यितुमुच्यते— एकाश्रयत्वे निर्दोषो नैरन्तर्ये विरोधवान् । रसान्तरव्यवधिना रसो व्यङ्ग्यः सुमेधसा ॥ २६ ॥ यः पुनरेकाधिकरणत्वे निर्विरोधो नैरन्तर्ये तु विरोधी स रसान्त- रव्यवधानेन प्रबन्धे निवेशयितव्यः । यथा शान्तशृङ्गारौ नागानन्दे निवेशितौ । अङ्गभाव प्राप्त करने में निर्विरोधत्व जैसा है वैसा उसे दिखाया । दूसरे का उसे प्रति- पादन करने के लिए कहते हैं— एकाश्रय होने में निर्दोष और नैरन्तर्य में विरोधी रस को सुमेधा (कवि) रसान्तर का व्यवधान करने से व्यञ्जित करे ॥ २६ ॥ जो एकाधिकरण होने में निर्विरोध है, किन्तु नैरन्तर्य में विरोधी है उसे रसान्तर के व्यवधान से प्रबन्ध में निवेशित करना चाहिए । जैसे शान्त और शृङ्गार नागानन्द में निवेशित किए गए हैं । लोचनम् द्वितीयस्येति । नैरन्तर्यविरोधिनः । तदिति । निर्विरोधित्वम् । एकाश्रयत्वेन निमित्तेन यो निर्दोषः न विरोधी किं तु निरन्तरत्वेन निमित्तेन विरोधमेति स तथाविधविरुद्धरसद्वयाविरुद्धेन रसान्तरेण मध्ये निवेशितेन युक्तः कार्य इति कारिकार्थः । प्रबन्ध इति बाहुल्यापेक्षं, मुक्तकेऽपि कदाचिदेवं भवेदपि । यद्वक्ष्यति—‘एकवाक्यस्थयोरपि’ इति । यथेति । तत्र हि—‘रागस्यास्पदमित्य- वैमि न हि मे ध्वंसीति न प्रत्ययः’ इत्यादिनोपक्षेपात्प्रभृति परार्थशरीरवित- रणात्मकनिर्वहणपर्यन्तः शान्तो रसस्तस्य विरुद्धो मलयवतीविषयः शृङ्गार- स्तदुभयाविरुद्धमद्भुतमन्तरीकृत्य क्रमप्रसरसम्भावनाभिप्रायेण कविना दूसरे का—। अर्थात् नैरन्तर्यविरोधी का । उसे—। निर्विरोधित्व को । कारिका का अर्थ यह है कि एकाश्रयत्व रूप कारण से जो निर्दोष अर्थात् विरोधी नहीं है, किन्तु निरन्तरत्व रूप कारण से विरोध ग्रहण करता है उसे उस प्रकार के विरुद्ध दो रसों के बीच अविरुद्ध रसान्तर के साथ युक्त करना चाहिए । प्रबन्ध में—। अपेक्षा करके बहुल रूप से, कदाचित् उस प्रकार मुक्तक में भी हो सकता है । जिसे कहेंगे—‘एक वाक्य में स्थित का भी’ । जैसे—। क्योंकि वहां—‘जिस (शरीर) का राग का आस्पद’ करके समझता हूं, (वह शरीर) मेरा विश्वास नहीं कि ध्वंसशील नहीं है !' इत्यादि ‘उपक्षेप’ से लेकर दूसरे के लिए शरीर का वितरण रूप ‘निर्वहण’ तक शान्त रस है, उसके विरुद्ध मलयवतीविषयक शृङ्गार को, उन दोनों (शान्त और शृङ्गार) के अविरुद्ध अद्भुत

४३० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शान्तश्च तृष्णाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीयत एव । तथा चोक्तम्— और शान्त, तृष्णाक्षय रूप सुख का जो परिपोष है तद्रूप रस प्रतीत होता ही है । जैसा कि कहा है— लोचनम् निबद्धः 'अहो गीतमहो वादित्रम्' इति । एतदर्थमेव 'व्यक्तिर्व्यञ्जनधातुना' इत्यादि नीरसप्रायमप्यत्र निबद्धमद्भुतरसपरिपोषकतयात्यन्तरसरसता- वहमिति 'निर्दोषदर्शनाः कन्यकाः' इति च क्रमप्रसरो निबद्धः । यथाहूः— 'चित्तवृत्तिप्रसरप्रसंख्यानधनाः सांख्याः पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिक- प्रसङ्गेने'ति । अनन्तरं च निमित्तनैमित्तिकप्रसङ्गागतो यः शेखरकवृत्तान्तो- दितहास्यरसोपकृतः शृङ्गारस्तस्य विरुद्धो यो वैराग्यशमपोषको नागीयकलेवरा- स्थिजालावलोकनादिवृत्तान्तः स मित्रावसोः प्रविष्टस्य मलयवतीनिर्गमन- कारिणः 'संसर्पद्भिः समन्तात्' इत्यादि काव्योपनिबद्धक्रोधव्यभिचार्युपकृत- वीररसान्तरितो निवेशितः । ननु नास्त्येव शान्तो रसः तस्य तु स्थाय्येव नोपदिष्टो मुनिनेत्याशङ्क्याह— शान्तश्चेति । तृष्णानां विषयाभिलाषाणां यः क्षयः सर्वतो निवृत्तिरूपो निर्वेदः ( रस ) को मध्य में रखकर कवि ने क्रम से प्रसर की सम्भावना के अभिप्राय से निव- न्धन किया है 'अहो गीतं अहो वादित्रं' । एतदर्थ ही 'व्यक्तिर्व्यञ्जनधातुना' इत्यादि अद्भुत रस के परिपोषक रूप से अत्यन्त रस की रसता का वहन करने वाले इस नीरस- प्राय को भी यहां निबन्धन किया है और 'निर्दोषदर्शनाः कन्यकाः' यह क्रम से प्रसर को भी निबन्धन किया है । जैसे चित्तवृत्ति के प्रसरों में दोषदर्शन करने वाले साङ्ख्य लोग कहते हैं—'निमित्त ( धर्म आदि ) और नैमित्तिक ( स्थूल देह आदि ) के प्रसङ्ग ( सम्बन्ध ) से यह ( लिङ्ग अर्थात् सूक्ष्म शरीर नट की भांति विविध रूप धारण करके ) पुरुषार्थ फल के लिए व्यवस्थित होता है' । अनन्तर जो निमित्त-नैमित्तिक के प्रसङ्ग से आया हुआ, शेखरक के वृत्तान्त से उत्पन्न हास्य-रस से उपकृत शृङ्गार है उसके विरुद्ध जो वैराग्य एवं शम का पोषक, नाग के शरीर में अस्थिजाल का अवलोकन आदि वृत्तान्त है वह मलयवती का निर्गमन करने वाले प्रविष्ट मित्रावसु के 'संसर्पद्भिः समन्तात्' इत्यादि काव्य द्वारा उपनिबद्ध क्रोध के व्यभिचारी से उपकृत रस से अन्तरित होकर रखा गया है । ( शङ्का ) शान्त रस तो है ही नहीं, क्योंकि मुनि ने उसके स्थायी का उपदेश नहीं किया है, यह आशङ्का करके कहते हैं—और शान्त—। विषयाभिलाष रूप तृष्णाओं का जो क्षय अर्थात् सब से निवृत्ति रूप निर्वेद है तद्रूप ही सुख है, स्थायी रूप में उस

तृतीय उद्योतः ४३१ ध्वन्यालोकः यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ लोक में जो कामसुख है और जो दिव्य महान् सुख है, ये दोनों तृष्णाक्षय रूप सुख के षोडशांश भी प्राप्त नहीं करते । लोचनम् तदेव सुखं तस्य स्थायिभूतस्य यः परिपोषो रस्यमानताकृतस्तदेव लक्षणं यस्य स शान्तो रसः । प्रतीयत एवेति । स्वानुभवेनापि निवृत्तभोजनाद्यशेषविषये- च्छाप्रसरतत्काले सम्भाव्यत एव । अन्ये तु सर्वचित्तवृत्तिप्रशम एवास्य स्थायीति मन्यन्ते । तृष्णासद्भावस्य प्रसज्यप्रतिषेधरूपत्वे चेतोवृत्तित्वाभावेन भावत्वायोगात् । पर्युदासे त्वस्मत्पक्ष एवायम् । अन्ये तु— स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद्भावः प्रवर्तते । पुनर्निमित्तापाये तु शान्त एव प्रलीयते ॥ इति भरतवाक्यं दृष्टवन्तः सर्वरससामान्यस्वभावं शान्तमाचक्षाणा अनु- पजातविशेषान्तरचित्तवृत्तिरूपं शान्तस्य स्थायिभावं मन्यन्ते । एतच्च नाती- वास्मत्पक्षाद् दूरम् । प्रागभावप्रध्वंसाभावकृतस्तु विशेषः । युक्तश्च प्रध्वंस एव ( निर्वेद ) का जो रस्यमानताकृत परिपोष है वह रूप है जिसका ऐसा शान्त रस है । प्रतीत होता ही है—। भोजन आदि अशेष विषयों की इच्छा के प्रसरतव के समय अपने अनुभव से भी सम्भावित होता ही है । अन्य लोग सभी चित्तवृत्तियों का प्रशम ही इसका स्थायी है ऐसा मानते हैं । तृष्णा के सद्भाव के प्रसज्यप्रतिषेध ( अर्थात् अत्यन्ताभाव ) होने पर चित्तवृत्ति मात्र के अभाव से भावत्व सम्भव नहीं होगा । पर्युदास के प्रकार से ( मानने पर ) तो हमारा पक्ष ही यह है ( हमें भी यह स्वीकार है कि सभी चित्तवृत्तियों का प्रशम का अर्थ सभी चित्त- वृत्तियों का विरोधी चित्तवृत्तिविशेष है ) । अन्य लोग तो— भाव अपना-अपना निमित्त पाकर शान्त से प्रवृत्त होता है, परन्तु फिर निमित्त के समाप्त होने पर शान्त में ही प्रलीन हो जाता है । इस भरत-वाक्य को देख कर सभी रस के सामान्य स्वरूप का अभाव रूप शान्त को कहते हुए शान्त का स्थायी भाव विशेष में उत्पन्न न होने वाली आन्तर ( अर्थात् आत्मविषयक ) चित्तवृत्ति को मानते हैं । यह भी हमारे पक्ष से अतीव दूर नहीं है । किन्तु भेद प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव का है ( अर्थात् इस मत का प्रागभाव में पर्यव- सान है और हमारे मत का प्रध्वंसाभाव में ) । तृष्णाओं का प्रध्वंसक ही ठीक है ।

४३२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तृष्णानाम् । यथोक्तम्—‘वीतरागजन्मादर्शनात्’ इति । प्रतीयत एवेति । मुनिनाप्यङ्गीक्रियत एव ‘क्वचिच्छमः’ इत्यादि वदता । न च तदीया पर्यन्ता- वस्था वर्णनीया येन सर्वचेष्टोपरमादनुभावाभावेनाप्रतीयमानता स्यात् । ‘शृङ्गारादेरपि फलभूमाववर्णनीयतैव पूर्वभूमौ तु ‘तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्’, ‘तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः’ इति सूत्रद्वयनीत्या चित्राकारा यमनियमादिचेष्टा राज्यधुरोद्वहनादिलक्षणा वा शान्तस्यापि जनकादेर्दृष्टैवेत्यनुभावसद्भावाद्यमनियमादिमध्यसम्भाव्यमानभूयोव्यभिचारिस- द्भावाच्च प्रतीयत एव । ननु न प्रतीयते नास्य विभावाः सन्तीति चेत्—न; प्रतीयत एव तावद्सौ। तस्य च भवितव्यमेव प्राक्तनकुशलपरिपाकपरमेश्वरानुग्रहाध्यात्मरहस्यशास्त्र- वीतरागपरिशीलनादिभिर्विभावैरितीयतैव विभावानुभावव्यभिचारिसद्भावः स्थायी च दर्शितः । ननु तत्र हृदयसंवादाभावाद्रस्यमानतैव नोपपन्ना । क एवमाह स नास्तीति, यतः प्रतीयत एवेत्युक्तम् । जैसा कि कहा है—‘क्योंकि रागरहित (पुरुष) का जन्म नहीं देखा जाता’। प्रतीत होता ही है—। ‘कहीं पर शम है’ इत्यादि कथन करते हुए मुनि ने भी अङ्गीकार किया ही है । उस (शान्त) की पर्यन्त अवस्था का वर्णन नहीं करना चाहिए, जिससे समस्त चेष्टाओं के उपरम हो जाने से उस शान्त की) अप्रतीति हो । फल-भूमि (अर्थात् सुरत आदि पर्यन्त भूमि) में शृङ्गार आदि की भी अवर्णनीयता है ही । ‘तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्’ (अर्थात् उक्त निरोध के संस्कार से वह चित्त विक्षेपरहित होकर प्रशान्त- वाही अर्थात् सदृशप्रवाहपरिणामी हो जाता है) और ‘तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारे- भ्यः’ (अर्थात् उस समाधि में स्थित योगी के छिद्रों = अन्तरालों में प्रत्ययान्तर = व्युत्थान रूप ज्ञान होते हैं अर्थात् प्राग्भूत व्युत्थान के अनुभव से उत्पन्न ‘अहं मम’ इत्याकारक क्षीयमाण संस्कारों से भी व्युत्थान रूप ज्ञान होते हैं) इन दोनों सूत्रों के अनुसार राज्यधुरा के 'उद्वहन रूप यम-नियमादि आश्चर्यकारिणी चेष्टाजनक आदि की भी देखी ही गई है इस कारण अनुभावों के सद्भाव से और यम, नियम आदि के बीच सम्भाव्यमान बहुत से व्यभिचारी भावों के सद्भाव से (शान्त रस) प्रतीत होता ही है । यदि यह कहो कि (शान्त रस) प्रतीत नहीं होता, क्योंकि इसके विभाव नहीं हैं, तो ऐसा; वह तो प्रतीत ही होता है और उसके प्राक्तन कुशल (सत्कर्मों) का विपाक, परमेश्वर का अनुग्रह तथा अध्यात्मरहस्य के शास्त्रों और वीतरागों के सम्बन्ध में परि- शीलन आदि विभाव होने ही चाहिए, इस प्रकार इतने से ही विभाव, अनुभाव, सञ्चारी का सद्भाव और स्थायी दिखाया गया । (शङ्का) उस (शान्त रस) में हृदयसंवाद के न होने से रस्यमानता ही नहीं बनती ! (समाधान) कौन ऐसा कहता है कि वह (हृदयसंवाद) नहीं है, क्योंकि ‘प्रतीत होता ही है’ यह कहा जा चुका है ।

तृतीय उद्योतः ४३३ ध्वन्यालोकः यदि नाम सर्वजनानुभवगोचरता तस्य नास्ति नैतावतासा- वलोकसामान्यमहानुभावचित्तवृत्तिविशेषः प्रतिक्षेप्तुं शक्यः । न च वीरे तस्यान्तर्भावः कर्तुं युक्तः । तस्याभिमानमयत्वेन व्यवस्थापनात् । अस्य चाहङ्कारप्रशमैकरूपतया स्थितेः । तयोश्चैवंविधविशेषसद्भावेऽपि यदि वह (शान्त) सभी लोगों के अनुभव का गोचर नहीं है, इतने से अलोक- सामान्य महापुरुषों के चित्तवृत्तिविशेष को निराकरण नहीं किया जा सकता । और वीर में उसका अन्तर्भाव करना ठीक नहीं । क्योंकि उस (वीर) का अभिमानमय रूप से व्यवस्थापन होता है । और यह (शान्त) अहङ्कार के एकमात्र प्रशमरूप से लोचनम् ननु प्रतीयते सर्वस्य श्लाघास्पदं न भवति । तर्हि वीतरागाणां शृङ्गारो न श्लाघ्य इति सोऽपि रसत्वाच्च्यवतामिति तदाह-यदि नामेति । ननु धर्मप्रधा- नोऽसौ वीर एवेति सम्भावयमान आह-न चेति । तस्येति वीरस्य। अभिमान- मयत्वेनेति । उत्साहो ह्यहमेवंविध इत्येवंप्राण इत्यर्थः । अस्य चेति शान्तस्य । तयोश्चेति । ईहामयत्वनिरीहत्वाभ्यामत्यन्तविरुद्धयोरपीति चशब्दार्थः । वीररौ- द्रयोस्त्वत्यन्तविरोधोऽपि नास्ति । समानं रूपं च धर्मार्थकामार्जनोपयोगित्वम् । नन्वेवं दयावीरो धर्मवीरो दानवीरो वा नासौ कश्चित्, शान्तस्यैवेदं नामान्तरकरणम् । तथा हि मुनिः- दानवीरं धर्मवीरं युद्धवीरं तथैव च । रसवीरमपि प्राह ब्रह्मा त्रिविधसम्मितम् ॥ (शङ्का) प्रतीत तो होता है पर सब की प्रशंसा का पात्र नहीं होता (अर्थात् सब लोग उसे नहीं चाहते) । (समाधान) तब तो वीतराग पुरुषों की दृष्टि में शृङ्गार श्लाघ्य नहीं है तो वह भी रसत्व से च्युत हो जाय ! इसे कहते हैं-यदि-। 'वह (शान्त) धर्मप्रधान वीर ही है' यह सम्भावना करते हुए कहते हैं-वीर में...ठीक नहीं-। 'उसका' अर्थात् वीर का । अभिमानमय रूप से-। अर्थात् 'मैं इस प्रकार का हूँ' एतद्-रूप उत्साह होता है । 'और' शब्द का अर्थ है कि ईहामयत्व और निरी- हत्व से अत्यन्त विरुद्ध भी (उन दोनों में) । वीर और रौद्र का तो अत्यन्त विरोध भी नहीं है। धर्म, अर्थ, काम के अर्जन का उपयोगित्व समान रूप है। (शङ्का) इस प्रकार वह दयावीर, धर्मवीर अथवा दानवीर कोई नहीं, बल्कि यह शान्त का ही दूसरा नामकरण है। जैसा कि मुनि कहते हैं- दानवीर, धर्मवीर और उसी प्रकार युद्धवीर ये रस वीर को ही ब्रह्माजी ने तीन प्रकार से विभक्त करके कहा है । २८ ध्व०

४३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यद्यैक्यं परिकल्प्यते तद्वीररौद्रयोरपि तथा प्रसङ्गः । दयाविरादीनां च चित्तवृत्तिविशेषाणां सर्वाकारमहङ्काररहितत्वेन शान्तरसप्रभेदत्वम् , इतरथा तु वीरप्रभेदत्वमिति व्यवस्थाप्यमाने न कश्चिद्विरोधः । तदेवमस्ति शान्तो रसः । तस्य चाविरुद्धरसव्यवधानेन प्रबन्धे विरोधि- रससमावेशे सत्यपि निर्विरोधत्वम् । यथा प्रदर्शिते विषये । रहता है। और उन दोनों में इस प्रकार के विशेष (भेद) के विद्यमान रहने पर भी यदि ऐक्य (अभेद) की परिकल्पना करते हैं तो वीर और रौद्र में भी उस प्रकार का प्रसङ्ग होगा। और दयावीर आदि चित्तवृत्ति-विशेषों के सब प्रकार से अहङ्काररहित होने के कारण शान्त रस के प्रभेद हो सकते हैं, अन्यथा वीर रस के प्रभेद हैं, इस प्रकार व्यवस्था करने पर कोई विरोध नहीं है। तो इस प्रकार शान्त रस है। और प्रबन्ध में अविरुद्ध रस का व्यवधान करके उसके विरोधी रस का समा- वेश होने पर भी विरोध नहीं होगा। जैसे प्रदर्शित विषय में। लोचनम् इत्यागमपुरःसरं त्रैविध्यमेवाभ्यधात् । तदाह—दयावीरादीनाञ्चेत्यादि- ग्रहणेन । विषयजुगुप्सारूपत्वाद् बीभत्सेऽन्तर्भावः शङ्क्येत । सा त्वस्य व्यभिचारिणी भवति न तु स्थायितामेति, पर्यन्तनिर्वाहे तस्या मूलत एव विच्छेदात्। आधिकारिकत्वेन तु शान्तो रसो न निबद्धव्य इति चन्द्रिकाकारः। तच्चेहास्माभिर्न पर्यालोचितं, प्रसङ्गान्तरात् । मोक्षफलत्वेन चायं परमपुरुषार्थ- निष्ठत्वात्सर्वरसेभ्यः प्रधानतमः । स चायमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन काव्य- कौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुतरकृतनिर्णयपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना ॥ २६ ॥ इस आगम के अनुसार त्रैविध्य ही कहा है। उसे कहते हैं—'और दयावीर आदि' इत्यादि ग्रहण द्वारा । (शान्त रस के स्थायी के) विषयजुगुप्सा रूप होने के कारण वीभत्स में अन्तर्भाव की (कुछ लोग) सम्भावना करते हैं। परन्तु वह (जुगुप्सा) इसकी (शान्त की) व्यभिचारी भाव होती है, न कि स्थायी भाव है, पर्यन्त तक निर्वाह की स्थिति में वह मूल में ही विच्छिन्न हो जाती है। चन्द्रिकाकार का कहना है कि आधिकारिक रूप से शान्त रस को निबन्धन नहीं करना चाहिए। प्रसङ्गान्तर होने के कारण हमने उसका पर्यालोचन नहीं किया है। मोक्ष रूप फल वाला होने के कारण परमपुरुषार्थनिष्ठ होने से यह (शान्त) सभी रसों में प्रधानतम है। उसे हमारे उपाध्याय भट्टतौत ने 'काव्यकौतुक' में और हमने उसके 'विवरण' में पूर्वपक्ष और सिद्धान्त के द्वारा बहुत प्रकार से निर्णय किया है ॥ २६ ॥

तृतीय उद्योतः ४३५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः एतदेव स्थिरीकर्तुमिदमुच्यते— रसान्तरान्तरितयोरेकवाक्यस्थयोरपि । निवर्तते हि रसयोः समावेशे विरोधिता ॥ २७ ॥ रसान्तरव्यवहितयोरेकप्रबन्धस्थयोर्विरोधिता निवर्तत इत्यत्र न काचिद्भ्रान्तिः । यस्मादेकवाक्यस्थयोरपिरसयोरुक्तया नीत्या विरुद्धता निवर्तते । यथा— भूरेणुदिग्धान्नवपारिजातमालारजोवासितबाहुमध्याः । गाढं शिवाभिः परिरभ्यमाणान्सुराङ्गनाश्लिष्टभुजान्तरालाः ॥ सशोणितैः क्रव्यभुजां स्फुरद्भिः पक्षैः खगानामुपवीज्यमानान् । संवीजिताश्चन्दनवारिसेकैः सुगन्धिभिः कल्पलतादुकूलैः ॥ विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः कुतूहलाविष्टतया तदानीम् । निर्दिश्यमानांल्ललनाङ्गुलीभिर्वीराः स्वदेहान् पतितानपश्यन् ॥ इसे ही स्थिर करने के लिए यह कहते हैं— एक ही वाक्य में स्थित रहने वाले होने पर भी दो रसों का दूसरे रस के बीच में होने से समावेश होने पर विरोध नहीं होता ॥ २७ ॥ दूसरे रस के बीच में होने से एक ही प्रबन्ध में रहने वाले भी ( रसों का ) विरोध निवृत्त हो जाता है, इसमें कोई भ्रम नहीं । क्योंकि उक्त नीति के अनुसार एक वाक्य में रहने वाले ( रसों ) का भी विरोध निवृत्त हो जाता है । जैसे— नये पारिजात की माला के पराग से वासित बाहुमध्य वाले, सुराङ्गनाओं द्वारा आलिङ्गन किए जाते हुए भुजमध्य वाले, सुगन्धि चन्दन के पानी के छिड़काव से युक्त कल्पलता के दुकूलों द्वारा झले जाते गए, विमान के पर्यङ्क पर बैठे वीरों ने ललनाओं की उंगलियों से दिखाए जाते हुए पृथ्वी की धूल में सने, सियारियों द्वारा कसकर पकड़े जाते हुए, खून से भिंगे और चमकते हुए मांसभक्षी पक्षियों के पंखों से झले जाते हुए अपने शरीरों को उस समय कुतूहल से आविष्ट होकर देखा । लोचनम् स्थिरीकर्तुमिति । शिष्यबुद्धावित्यर्थः । अपिशब्देन प्रबन्धविषयतया सिद्धो- ऽयमर्थ इति दर्शयति—भूरेण्विति । विशेषणैरतीव दूरापेतत्वमसम्भावनास्पद- स्थिर करने के लिए—। अर्थात् शिष्य की बुद्धि में । 'भी' शब्द से यह बात सिद्ध हो चुकी है' यह दिखाते हैं— नये पारिजात—। विशेषणों से बहुत दूर की बात होना

४३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यादौ । अत्र हि शृङ्गारबीभत्सयोस्तदङ्गयोर्वा वीररसव्यवधानेन समावेशो न विरोधी । विरोधमविरोधं च सर्वत्रेत्थं निरूपयेत् । विशेषतस्तु शृङ्गारे सुकुमारतमो ह्यसौ ॥ २४ ॥ यथोक्तलक्षणानुसारेण विरोधाविरोधौ सर्वेषु रसेषु प्रबन्धेऽन्यत्र च निरूपयेत्सहृदयः; विशेषतस्तु शृङ्गारे । स हि रतिपरिपोषात्मकत्वाद् इत्यादि में। यहाँ शृङ्गार और बीभत्स का अथवा उनके अङ्गों का बीच में वीर रस को रखकर समावेश विरोधी नहीं है। इस प्रकार सभी जगह विरोध और अविरोध का निरूपण करे, किन्तु शृङ्गार में विशेष रूप से; क्योंकि वह सबसे सुकुमार है ॥ २४ ॥ सहृदय (कवि) यथोक्त लक्षण के अनुसार सब रसों में, प्रबन्ध में और अन्यत्र विरोध और अविरोध का निरूपण करे, विशेष रूप से शृङ्गार में; क्योंकि वह रति का लोचनम् मुक्तम् । स्वदेहानित्यनेन देहत्वाभिमानादेव तादात्म्यसम्भावनानिष्पत्तेरेका- श्रयत्वमस्ति, अन्यथा विभिन्नविषयत्वात्को विरोधः । ननु वीर एवात्र रसो न शृङ्गारो न बीभत्स; किन्तु रतिजुगुप्से हि वीरं प्रति व्यभिचारीभूते। भवत्वेवम् , तथापि प्रकृतोदाहरणता तावदुपपन्ना । तदाह—तदङ्गयोर्वेति । तयोरङ्गे तत्स्थायिभावावित्यर्थः। वीररसेति । 'वीराः स्वदेहान्' इत्यादिना तदीयोत्साहाद्य- वगंत्या कर्तृकर्मणोः समस्तवाक्यार्थानुयायितया प्रतीतिरिति मध्यपाठाभावेऽपि सुतरां वीरस्य व्यवधायकतेति भावः ॥ २७ ॥ अन्यत्र चेति मुक्तकादौ । स हि शृङ्गारः सुकुमारतम इति सम्बन्धः । और सम्भावना का आस्पद न होना कहा है। 'अपने शरीरों को' इससे शरीरत्वाभिमान के कारण ही तादात्म्य (अभेद) की सम्भावना निष्पन्न होती है अतः एकाश्रयत्व है, अन्यथा विभिन्न विषय होने के कारण कौन विरोध होता ! (शङ्का) यहां वीर ही रस है, न शृङ्गार है, न बीभत्स है, किन्तु रति और जुगुप्सा वीर के प्रति व्यभिचारी भाव हो गए हैं। (समाधान) इस प्रकार हो भी, तथापि प्रकृत में उदाहरण होना उपपन्न है। उसे कहते हैं—अथवा उनके अङ्गों का—। उनके अङ्ग अर्थात् उनके स्थायी भाव। वीर रस—। भाव यह कि 'वीरों ने अपने शरीरों को' इत्यादि से उनके उत्साह आदि के ज्ञान से कर्ता और कर्म की समस्त वाक्यार्थ में अनुगत रूप से प्रतीति होती है, इसके अनुसार बीच में पाठ न होने पर भी सुतरां वीर ही व्यवधायक है ॥ २७ ॥ और अन्यत्र—। मुक्तक आदि में ! वह शृङ्गार सुकुमारतम है, यह (वाक्य का)

तृतीय उद्योतः ४३७ ध्वन्यालोकः रतेश्च स्वल्पेनापि निमित्तेन भङ्गसम्भवात्सुकुमारतमः सर्वेभ्यो रसेभ्यो मनागपि विरोधिसमावेशं न सहते । अवधानातिशयवान् रसे तत्रैव सत्कविः । भवेत्तस्मिन् प्रमादो हि झटित्येवोपलक्ष्यते ॥ २९ ॥ तत्रैव च रसे सर्वेभ्योऽपि रसेभ्यः सौकुमार्यातिशययोगिनि कविरवधानवान् प्रयत्नवान् स्यात् । तत्र हि प्रमाद्यतस्तस्य सहृदयमध्ये क्षिप्रमेवावज्ञानविषयता भवति । शृङ्गाररसो हि संसारिणां नियमेना- नुभवविषयत्वात् सर्वरसेभ्यः कमनीयतया प्रधानभूतः । एवं च सति— विनेयानुन्मुखीकर्तुं काव्यशोभार्थमेव वा । तद्विरुद्धरसस्पर्शस्तदङ्गानां न दुष्यति ॥ ३० ॥ परिपोषरूप होने से और रति का थोड़े भी निमित्त से भङ्ग सम्भव हो जाने से सब रसों से अधिक सुकुमार होता है, थोड़ा भी विरोधी का समावेश नहीं सहन करता । सत्कवि उसी रस में अतिशय अवधान करे, क्योंकि उसमें प्रमाद झट से लक्षित हो जाता है ॥ २९ ॥ सभी रसों से अतिशय सौकुमार्य रखने वाले उसी रस में कवि अवधान करे, प्रयत्नशील हो । क्योंकि उसमें प्रमाद करते हुए उसका अज्ञान शीघ्र ही सहृदयों के मध्य में विदित हो जायगा । शृङ्गार रस संसारी जनों के नियमतः अनुभव का विषय होने के कारण सभी रसों से कमनीय होने के कारण प्रधानभूत है । और ऐसा होने पर— शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए ही उसके विरुद्ध रसों में उसके अङ्गों का स्पर्श अथवा दूषित नहीं होता ॥ ३० ॥ लोचनम् सुकुमारस्तावद्रसजातीयस्ततोऽपि करुणस्ततोऽपि शृङ्गार इति तम- प्रत्ययः ॥ २८–२६ ॥ एवं चेति । यतोऽसौ सर्वसंवादीत्यर्थः । तदिति । शृङ्गारस्य विरुद्धा ये शान्तादयस्तेष्वपि तदङ्गानां शृङ्गाराङ्गानां सम्बन्धी स्पर्शो न दुष्टः । तया सम्बन्ध है । एक तो रसमात्र सुकुमार होता है, उसमें भी करुण और उसमें भी शृङ्गार इस लिए 'तमप्' प्रत्यय है ॥ २८–२९ ॥ और ऐसा—। अर्थात् जिस कारण वह ( शृङ्गार ) सर्वसंवादी ( अर्थात् सभी सहृदयों के हृदय का संवाद रखने वाला ) है । उसके—। शृङ्गार के विरुद्ध जो शान्त

४३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शृङ्गारविरुद्धरसस्पर्शः शृङ्गाराङ्गानां यः स न केवलमविरोधलक्ष- णयोगे सति न दुष्यति यावद्विनेयानुन्मुखीकर्तुं काव्यशोभार्थमेव वा क्रियमाणो न दुष्यति । शृङ्गाररसाङ्गैरुन्मुखीकृताः सन्तो हि विनेयाः शृङ्गार के विरुद्ध रसों में शृङ्गार के अङ्गों का जो स्पर्श है वह न केवल अविरोध के लक्षणों का योग होने पर नहीं दूषित होता, बल्कि शिष्यों को उन्मुख करने के निमित्त काव्य की शोभा के लिए ही अथवा किया जाता हुआ नहीं दूषित होता । क्योंकि शृङ्गार रस के अङ्गों द्वारा उन्मुख किए जाने पर शिष्य लोग सुखपूर्वक विनय के लोचनम् भङ्ग्या रसान्तरगता अपि विभावानुभावाद्या वर्णनीया यया शृङ्गाराङ्गभाव- मुपागमन् । यथा ममैव स्तोत्रे— त्वां चन्द्रचूडं सहसा स्पृशन्ती प्राणेश्वरं गाढवियोगतप्ता । सा चन्द्रकान्ताकृतिपुत्रिकेव संविद्विलीयापि विलीयते मे ॥ इत्यत्र शान्तविभावानुभावानामपि शृङ्गारभङ्ग्या निरूपणम् । विनेया- नुन्मुखीकर्तुं या काव्यशोभा तदर्थं नैव दुष्यतीति सम्बन्धः । वाग्रहणेन पक्षान्तरमुच्यते । तदेव व्याचष्टे—न केवलमिति । वाशब्दस्यैतद्व्याख्यानम् । अविरोधलक्षणं परिपोषपरिहारादि पूर्वोक्तम् । विनेयानुन्मुखीकर्तुं या काव्य- शोभा तदर्थमपि वा विरुद्धसमावेशः न केवलं पूर्वोक्तैः प्रकारैः, न तु काव्य- शोभा विनेयोन्मुखीकरणमन्तरेणास्ते, व्यवधानाव्यवधाने नापि लभ्येते आदि हैं उनमें भी उस शृङ्गार के अङ्गों का सम्बन्धी स्पर्श दोषयुक्त नहीं। उस अङ्गी से रसान्तरगत भी विभाव, अनुभाव आदि का वर्णन करना चाहिए जिससे (वे) शृङ्गार के अङ्ग बन जाँय । जैसे, मेरे ही स्तोत्र में— चन्द्र का भूषण धारण करने वाले तुम प्राणेश्वर को सहसा स्पर्श करती हुई, गाढ वियोग से तप्त मेरी संवित् (अन्तःकरण अथवा उसकी वृत्ति) चन्द्रकान्त की बनी पुतली की भांति विलीन होकर भी विलीन हो रही है । यहां शान्त के विभाव और अनुभावों का भी शृङ्गार की भङ्गी से निरूपण है। 'शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए नहीं दूषित होता' यह (वाक्य का) सम्बन्ध है । 'अथवा' ग्रहण से पक्षान्तर कहा गया है । उसी का व्याख्यान करते हैं—न केवल—। 'अथवा' शब्द का यह व्याख्यान है। परिपोष परिहार आदि अविरोध के लक्षण पहले कहे जा चुके हैं । शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए भी अथवा विरुद्ध समावेश है, न केवल पूर्वोक्त प्रकारों से (विरुद्ध समावेश नहीं दूषित होता है), न कि काव्य की शोभा शिष्यों को उन्मुख करने के बिना हो सकती है, (बल्कि वह तो रसान्तर से व्यवधान और

तृतीय उद्योतः ४३९ ध्वन्यालोकः सुखं विनयोपदेशान् गृह्णन्ति । सदाचारोपदेशरूपा हि नाटकादिगोष्ठी विनेयजनहितार्थमेव मुनिभिरवतारिता । किं च शृङ्गारस्य सकलजनमनोहराभिरामत्वात्तदङ्गसमावेशः काव्ये शोभातिशयं पुष्यतीत्यनेनापि प्रकारेण विरोधिनि रसे शृङ्गारा- ङ्गसमावेशो न विरोधी । ततश्च— उपदेशों को ग्रहण कर लेते हैं। सदाचार के उपदेशरूप नाटक आदि गोष्ठियों को मुनियों ने शिष्य जनों के हित के लिए ही निकाला है। और भी, शृङ्गार क्योंकि समस्त लोगों के मन को हरण करने वाला एवं सुन्दर होता है इस कारण उसके अङ्गों का समावेश काव्य में अतिशय शोभा को पुष्ट करता है, इस प्रकार भी विरोधी रस में शृङ्गार के अङ्गों का समावेश विरोधी नहीं। और इसलिए— लोचनम् यथान्यैर्व्याख्याते । सुखमिति । रञ्जनापुरःसरमित्यर्थः । ननु काव्यं क्रीडारूपं क च वेदादिगोचरा उपदेशकथा इत्याशङ्कयाह—सदाचारेति । मुनिभिरिति— भरतादिभिरित्यर्थः । एतच्च प्रभुमित्रसम्मितेभ्यः शास्त्रेतिहासेभ्यः प्रीतिपूर्वकं जायासम्मितत्वेन नाट्यकाव्यगतं व्युत्पत्तिकारित्वं पूर्वमेव निरूपितमस्मा- भिरिति न पुनरुक्तभयादिह लिखितम् । ननु शृङ्गाराङ्गताभङ्ग्या यद्विभावादिनिरूपणमेतावत्तैव किं विनेयोन्मुखी- कारः । न; अस्ति प्रकारान्तरं, तदाह—किं चेति । शोभातिशियमिति । अलङ्कार- विशेषमुपमाप्रभृतिं पुष्यति सुन्दरीकरोतीत्यर्थः । यथोक्तम्—‘काव्यशोभायाः अव्यवधान से भी प्राप्त होती है, जैसा कि अन्य लोगों द्वारा किए गए व्याख्यान में । सुखपूर्वक अर्थात् रञ्जनापूर्वक । ‘काव्य तो क्रीडा रूप है फिर वेद आदि में रहने वाली उपदेश की कथा कहां ?' यह आशङ्का करके कहते हैं—सदाचार—। मुनियों ने—। अर्थात् भरत आदि ने । प्रभुसम्मित तथा मित्रसम्मित शास्त्रों और इतिहासों से (अतिरिक्त ही) यह प्रीतिपूर्वक जायासम्मित रूप से नाट्यगत और काव्यगत व्युत्पत्तिकारित्व को हमने पहले ही निरूपण किया है, इसलिए पुनरुक्त होने के भय से यहां नहीं लिखा । ( शङ्का ) शृङ्गार के अङ्ग होने की भङ्गी जो विभाव आदि का निरूपण है उतने से ही ( काम चल जायगा ) शिष्यों को उन्मुख करना क्या ? ( समाधान ) नहीं; प्रका- रान्तर है, उसे कहते हैं—और भी—। अतिशय शोभा को—। अर्थात् उपमा प्रभृति अलङ्कार विशेष को पुष्ट करता है। जैसे, कहा है—‘काव्य की शोभा करने वाले धर्म

४४० सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
सत्यं मनोरमा रामाः सत्यं रम्या विभूतयः ।
किं तु मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ॥
इत्यादिषु नास्ति रसविरोधदोषः ।
विज्ञायेत्थं रसादीनामविरोधविरोधयोः ।
विषयं सुकविः काव्यं कुर्वन्मुह्यति न क्वचित् ॥ ३१ ॥
'यह ठीक है कि स्त्रियां मनोरम होती हैं, यह ठीक है कि विभूतियां रम्य होती
हैं, किन्तु जीवन मतवाली अङ्गना के कटाक्ष-भङ्ग की भांति चञ्चल होता है।'
इत्यादि में रसविरोध का दोष नहीं है ।
इस प्रकार रस आदि के अविरोध और विरोध के विषय को जान कर सुकवि
काव्य निर्माण करता हुआ कहीं पर भ्रमित नहीं होता ॥ ३१ ॥
लोचनम्
कर्तारो धर्मा गुणास्तदतिशयहेतवस्त्वलङ्कारा' इति । मत्ताङ्गनेति । अत्र हि
शान्तविभावे सर्वस्यानित्यत्वे वर्ण्यमाने न कस्यचिद्विभावस्य शृङ्गारभङ्ग्या
निबन्धः कृतः, किं तु सत्यमिति परहृदयानुप्रवेशेनोक्तम्; न खल्वलीक-
वैराग्यकौतुकरुचिं प्रकटयामः, अपि तु यस्य कृते सर्वमभ्यर्थ्यते तदेवेदं
चलमिति; तत्र मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गस्य शृङ्गारं प्रति सम्भाव्यमानविभावा-
नुभावत्वेनाङ्गस्य लोलतायामुपमानतोक्तेति प्रियतमाकटाक्षो हि सर्वस्या-
भिलषणीय इति च तत्प्रीत्या प्रवृत्तिमान् गुडजिह्विकया प्रसक्तानुप्रसक्त-
वस्तुतत्त्वसंवेदनेन वैराग्ये पर्यवस्यति विनेयः ॥ ३० ॥
तदेतदुपसंहरन्नस्योक्तस्य प्रकरणस्य फलमाह—विज्ञायेत्थमिति ॥ ३१ ॥
गुण है और ( शोभा ) को बढ़ाने वाले अलङ्कार हैं'। मतवाली अङ्गना—। यहां सभी
का अनित्यत्व रूप शान्त के विभाव के वर्णन में किसी विभाव का शृङ्गार की भङ्गी से
निबन्धन नहीं किया है, 'किन्तु ठीक है' यह दूसरे के हृदय में अनुप्रवेश के द्वारा कहा
है; हम मिथ्या वैराग्य के कौतुक के प्रति रुचि प्रकट करते हैं, अपितु जिसके लिए सब
कुछ चाहते हैं वही यह ( जीवन ) चञ्चल है; वहां शृङ्गार के प्रति विभाव और अनुभाव
के सम्भाव्यमान होने से अङ्गभूत मतवाली अङ्गना के अपाङ्गभङ्ग की चञ्चलता में उप-
मानता कही गई है, क्यों कि प्रियतमा का कटाक्ष सबका अभिलषणीय है इसलिए
उसकी प्रीति से प्रवृत्त होकर शिष्य गुडजिह्विका द्वारा प्रसक्तानुप्रसक्त वस्तुओं के तत्त्व के
संवेदन से वैराग्य में पर्यवसित होगा ॥ ३० ॥
तो इसका उपसंहार करते हुए इस उक्त प्रकरण का फल कहते हैं—इस प्रकार ॰॰
जानकर ॥ ३१ ॥

तृतीय उद्योतः ४४१

ध्वन्यालोकः इत्थमनेनानन्तरोक्तेन प्रकारेण रसादीनां रसभावतदाभासानां परस्परं विरोधस्याविरोधस्य च विषयं विज्ञाय सुकविः काव्यविषये प्रतिभातिशययुक्तः काव्यं कुर्वन्न क्वचिन्मुह्यति । एवं रसादिषु विरोधाविरोधनिरूपणस्योपयोगित्वं प्रतिपाद्य व्यञ्जकवाच्यवाचकनिरूपणस्यापि तद्विषयस्य तत्प्रतिपाद्यते— वाच्यानां वाचकानां च यदौचित्येन योजनम् । रसादिविषयेणैतत्कर्म मुख्यं महाकवेः ॥ ३२ ॥ वाच्यानामिति वृत्तविशेषाणां वाचकानां च तद्विषयाणां रसादि- इस प्रकार अभी कहे गए प्रकार के अनुसार रस आदि रस, भाव उसके आभास के परस्पर विरोध और अविरोध के विषय को जान कर सुकवि काव्य के विषय में अतिशय प्रतिभा से युक्त होकर काव्य निर्माण करता हुआ कहीं पर भ्रमित नहीं होता । इस प्रकार रस आदि में विरोध और अविरोध के निरूपण की उपयोगिता का प्रतिपादन करके उनके विषय (सम्बन्ध) के व्यञ्जक वाच्य तथा वाचक के निरूपण की भी उस (उपयोगिता) का प्रतिपादन करते हैं— वाच्य और वाचकों का जो रसादिविषयक औचित्य से जोड़ना है महाकवि मुख्य कर्म है ॥ ३२ ॥ वाच्य अर्थात् इतिवृत्त विशेषों का और उनके विषय के वाचकों का रसादिविषयक लोचनम् रसादिषु रसादिविषये व्यञ्जकानि यानि वाच्यानि विभावादीनि वाचकानि च सुप्तिङादीनि तेषां यन्निरूपणं तस्येति । तद्विषयस्येति । रसादिविषयस्य । तदिति उपयोगित्वम् । मुख्यमिति । ‘आलोकार्थी’ इत्यत्र यदुक्तं तदेवोपसंहृतम् । महाकवेरिति सिद्धवत्फलनिरूपणम् । एवं हि महाकवित्वं नान्यथेत्यर्थः । इति- वृत्तविशेषाणामिति । इतिवृत्तं हि प्रबन्धवाच्यं तस्य विशेषाः प्रागुक्ताः— ‘विभावभावानुभाव·सञ्चार्यौचित्यचारुणः । विधिः कथाशरीरस्य’ इत्यादिना । रसादि में अर्थात् रसादि के विषय में जो वाच्य विभावादि और वाचक सुप् तिङ् आदि हैं उनका जो निरूपण है उसका । उनके विषय के—। रसादि के विषय के । उस—। उपयोगिता । मुख्य—। ‘आलोकार्थी’ में जो कहा है उसी का उपसंहार किया है । महाकवि—। सिद्ध की भांति फल का निरूपण है, अर्थात् इस प्रकार महाकवित्व होता है अन्यथा नहीं । इतिवृत्तविशेष—। इतिवृत्त प्रबन्ध का वाच्य होता है, उसके विशेष पहले कहे गए हैं—विभाव, भाव, अनुभाव और सञ्चारी के औचित्य से

४४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः विषयेणौचित्येन यद्योजनमेतन्महाकवेर्मुख्यं कर्म । अयमेव हि महाक- वेर्मुख्यो व्यापारो यद्रसादीनेव मुख्यतया काव्यार्थीकृत्य तद्व्यक्त्य- नुगुणत्वेन शब्दानांमर्थानां चोपनिबन्धनम् । एतच्च रसादितात्पर्येण काव्यनिबन्धनं भरतादावपि सुप्रसिद्ध- मेवेति प्रतिपादयितुमाह — औचित्य के साथ जो जोड़ना है, यह महान् कवि का मुख्य कर्म है । महाकवि का मुख्य यही व्यापार है जो रसादि को मुख्य रूप से काव्य का अर्थ बना कर उनकी व्यञ्जना के अनुगुण रूप से शब्दों और अर्थों का उपनिबन्धन है । और यह रसादि के तात्पर्य से काव्य का निबन्धन भरत आदि में भी सुप्रसिद्ध ही है यह प्रतिपादन करने के लिए कहते हैं— लोचनम् काव्यार्थीकृत्येति ! अन्यथा लौकिकशास्त्रीयवाक्यार्थेभ्यः कः काव्यार्थस्य विशेषः । एतच्च निर्णितमाद्योद्द्योते—'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' इत्यत्रा- न्तरे ॥ ३२ ॥ एतच्चेति । यदस्माभिरुक्तमित्यर्थः । भरतादावित्यादिग्रहणादलङ्कारशास्त्रेषु परुषाद्या वृत्तय इत्युक्तं भवति । द्वयोरपि तयोरिति । वृत्तिलक्षणयोर्व्यवहारयोरि- त्यर्थः । जीवभूता इति । 'वृत्तयः काव्यमातृकाः' इति ब्रुवाणेन मुनिना रसोचिते- तिवृत्तसमाश्रयणोपदेशेन रसस्यैव जीवितत्वमुक्तम् । भामहादिभिश्च— स्वादुकाव्यरसोन्मिश्रं वाक्यार्थमुपभुञ्जते । प्रथमालीढमधवः पिबन्ति कटुभेषजम् ॥ सुन्दर कथाशरीर का विधान०' इत्यादि द्वारा । काव्य का अर्थ बनाकर—। अन्यथा लौकिक और शास्त्रीय वाक्यार्थों से काव्यार्थ का विशेष ( भेद ) कौन होगा ? यह प्रथम उद्योत में निर्णय कर चुके हैं—'काव्य का आत्मा वही अर्थ है' इस प्रसङ्ग में ॥ ३२ ॥ और यह—। अर्थात् जिसे हमने कहा है । 'भरत आदि में' इस ग्रहण से यह बात कही गई कि अलङ्कार शास्त्रों में परुषा आदि वृत्तियां हैं । उन दोनों के भी—। अर्थात् दोनों वृत्ति रूप व्यवहारों के । जीवभूत—। 'वृत्तियां काव्य की माताएं होती हैं' यह कथन करते हुए मुनि ने रसोचित वृत्ति के समाश्रय के उपदेश द्वारा रस का ही जीवि- तत्व कथन किया है । और भामह आदि ने— स्वादु काव्य के रस से मिले वाक्यार्थ का उपयोग करते हैं, ( इसका मतलब हुआ कि ) पहले मधु का आलेहन करके कटु औषध का पान करते हैं ।

तृतीय उद्योतः ४४३ ध्वन्यालोकः रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः । औचित्यवान्यस्ता एता वृत्तयो द्विविधाः स्थिताः ॥३३॥ व्यवहारो हि वृत्तिरित्युच्यते । तत्र रसानुगुण औचित्यवान् वाच्याश्रयो यो व्यवहारस्ता एताः कैशिक्याद्या वृत्तयः । वाचकाश्रया- श्चोपनागरिकाद्याः । वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण संनिवेशिताः कामपि नाट्यस्य काव्यस्य च च्छायामावहन्ति । रसादयो हि द्वयोरपि तयोर्जीवभूताः । इतिवृत्तादि तु शरीरभूतमेव । अत्र केचिदाहुः—‘गुणगुणिव्यवहारो रसादीनामितिवृत्तादिभिः सह युक्तः, न तु जीवशरीरव्यवहारः । रसादिमयं हि वाच्यं प्रतिभासते न तु रसादिभिः पृथग्भूतम्’ इति । अत्रोच्यते—यदि रसादिमयमेव अर्थ और शब्द का रसादि के अनुगुण रूप से जो औचित्यवान् व्यवहार है वह ये दो प्रकार की वृत्तियां मानी गई हैं ॥ ३३ ॥ व्यवहार 'वृत्ति' कहलाता है । वहां रस के अनुगुण औचित्यवान् वाच्याश्रित जो व्यवहार है वे ये कैशिकी आदि वृत्तियां हैं । और वाचकाश्रित (वृत्तियां) उपनाग- रिका आदि हैं । वृत्तियां रसादि के तात्पर्य से संनिवेशित होकर नाट्य और काव्य की अपूर्व शोभा कर देती हैं । रसादि उन दोनों के भी जीवभूत हैं । इतिवृत्त आदि तो शरीरभूत ही हैं । यहां कुछ लोग कहते हैं—'रसादि का इतिवृत्त आदि के साथ गुणगुणिव्यवहार ठीक है न कि जीव-शरीरव्यवहार । क्यों कि वाच्य रसादिमय प्रतीत होता है न कि रसादि से पृथग्भूत (प्रतीत होता है)' । यहां कहते हैं—यदि वाच्य रसादिमय ही लोचनम् इत्यादिना रसोपयोगजीवितः शब्दवृत्तिलक्षणो व्यवहार उक्तः । शरीरभूत- मिति । 'इतिवृत्तं हि नाट्यस्य शरीरं' इति मुनिः । नाट्यं च रस एवेत्युक्तं प्राक् । गुणगुणिव्यवहार इति । अत्यन्तसम्मिश्रतया प्रतिभासनाद्धर्मधर्मिव्यवहारो युक्तः । न त्विति । क्रमस्यासंवेदनादिति भावः । इत्यादि द्वारा रस के उपयोग से जीवित शब्दवृत्तिरूप व्यवहार कहा गया है । शरीरभूत—। मुनि के अनुसार 'इतिवृत्त नाट्य का शरीर है' । और नाट्य रस ही है यह पहले कह चुके हैं । गुणगुणिव्यवहार—। अत्यन्त मिले-जुले (सम्मिश्र) रूप से मालूम पड़ने के कारण धर्मधर्मिव्यवहार ठीक है । न कि—। भाव यह कि क्रम मालूम नहीं पड़ता ।

४४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यं यथा गौरत्वमयं शरीरम्। एवं सति यथा शरीरे प्रतिभासमाने नियमेनैव गौरत्वं प्रतिभासते सर्वस्य तथा वाच्येन सहैव रसादयोऽपि सहृदयस्यासहृदयस्य च प्रतिभासेरन्। न चैवम्; तथा चैतत्प्रतिपादि- तमेव प्रथमोद्द्योते। स्यान्मतम्; रत्नानामिव जात्यत्वं प्रतिपत्तृविशेषतः संवेद्यं वाच्यानां है, जैसे शरीर गौरत्वमय है। ऐसा होने पर जैसे शरीर के प्रतीत होने पर नियमतः ही गौरत्व सबको प्रतीत होता है उस प्रकार वाच्य के साथ ही रसादि भी सहृदय और असहृदय को प्रतीत होने चाहिए। और ऐसा नहीं होता, जैसा कि प्रथम उद्योत में प्रतिपादन किया ही जा चुका है। यह कह सकते हैं कि रत्नों के जात्यत्व की भांति वाच्यों का रसादिरूपत्व प्रति- लोचनम् प्रथमेति। 'शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते' इत्यादिना प्रतिपादितमदः। ननु यद्यस्य धर्मरूपं तत्तत्प्रतिभाने सर्वस्य नियमेन भातीत्यनैकान्तिकमेतत्। माणिक्यधर्मो हि जात्यत्वलक्षणो विशेषो न तत्प्रतिभासेऽपि सर्वस्य नियमेन भातीत्याशङ्कते-स्यादिति। एतत्परिहरति-नैवमिति। एतदुक्तं भवति- अत्यन्तोन्मग्नस्वभावत्वे सति तद्धर्मत्वादिति विशेषणमस्माभिः कृतम्। उन्मग्न- रूपता च न रूपवज्जात्यत्वस्य, अत्यन्तलीनस्वभावत्वात्। रसादीनां चोन्म- ग्नतास्त्येवेत्येवं केचिदेतं ग्रन्थमनेषुः। अस्मद्गुरवस्त्वाहुः-अत्रोच्यत इत्य- नेनेदमुच्यते-यदि रसादयो वाच्यानां धर्मास्तथा सति द्वौ पक्षौ रूपादिसदृशा प्रथम-। 'शब्द और अर्थ के शासन के ज्ञान मात्र से नहीं जाना जाता है' इत्यादि द्वारा यह प्रतिपादन किया जा चुका है। (शङ्का) जो (गौरत्वादि) जिस (शरीरादि) का धर्मरूप है, वह (गौरत्वादि) उस (शरीरादि) के प्रतीत होने पर सब को नियमतः प्रतीत होते हैं, यह (नियम) अनैकान्तिक (व्यभिचारी) है, क्योंकि माणिक्य का धर्म जात्यत्वरूप विशेष उस (माणिक्य) के प्रतीत होने पर भी सबको नियमतः प्रतीत नहीं होता, यह आशङ्का करते हैं-यह कह सकते हैं-। इसका परिहार करते हैं-ऐसा नहीं-। बात यह कही गई-'हमने यह विशेषण बनाया है कि उसका धर्म अत्यन्त उन्मग्न स्वभाव वाला होना चाहिए (अर्थात् धर्म को वस्तु से अत्यन्त भिन्न रूप से प्रतीत होना चाहिए)। और जात्यत्व में रूप की भांति उन्मग्नरूपता (वस्तु से भिन्नरूपता) नहीं, क्योंकि वह अत्यन्त लीन स्वभाव का है। और रसादि में उन्मग्नता है ही' इस प्रकार इसको कुछ लोगों ने लगाया है। परन्तु हमारे गुरु कहते हैं-'यहां कहते हैं' इससे यह बात कही गई है-यदि रसादि वाच्यों के धर्म हैं, ऐसा होने पर दो पक्ष होंगे (तो वे रसादि

तृतीय उद्योतः ४४५ ध्वन्यालोकः रसादिरूपत्वमिति। नैवम्; यतो यथा जात्यत्वेन प्रतिभासमाने रत्ने रत्नस्वरूपानतिरिक्तत्वमेव तस्य लक्ष्यते तथा रसादीनामपि विभावा- नुभावादिरूपवाच्याव्यतिरिक्तत्वमेव लक्ष्येत । न चैवम्; न हि विभावानुभावव्यभिचारिण एव रसा इति कस्यचिदवगमः । अत एव च विभावादिप्रतीत्यविनाभाविनी रसादीनां प्रतीतिरिति तत्प्रतीत्योः पत्ता विशेष द्वारा संवेद्य है । ( किन्तु ) ऐसा नहीं; क्योंकि जिस प्रकार जात्यत्व रूप से प्रतिभासमान रत्न में उस ( जात्यत्व ) को रत्न के स्वरूप से अनतिरिक्तता लक्षित होती है उस प्रकार रसादि की भी विभाव, अनुभाव आदि रूप वाच्य से अव्यति- रिक्तता ही लक्षित होनी चाहिए । किन्तु ऐसा नहीं होता, क्योंकि किसी के ऐसी प्रतीति नहीं होती कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी ही रस हैं । और इसलिए विभावादि की प्रतीति की अविनाभाविनी रसादि की प्रतीति है, इस प्रकार उन लोचनम् वा स्युर्माणिक्यगतजात्यत्वसदृशा वा । न तावत्प्रथमः पक्षः, सर्वान् प्रति तथा- नवभासात् । नापि द्वितीयः, जात्यत्ववदनतिरिक्तत्वेनाप्रकाशनात् । एष च हेतुराद्येऽपि पक्षे सङ्गच्छत एव । तदाह—स्यान्मतमित्यादिना न चैवमित्य- न्तेन । एतदेव समर्थयति—न हीति । अत एव चेति । यतो न वाच्यधर्मत्वेन रसादीनां प्रतीतिः, यतश्च तत्प्रतीतौ वाच्यप्रतीतिः सर्वथानुपयोगिनी तत एव हेतोः क्रमेणावश्यं भाव्यं, सहभूतयोरुपकाराद्योगात् । स तु सहृदयभावना- भ्यासान्न लक्ष्यते अन्यथा तु लक्ष्येतापीत्युक्तं प्राक् । यस्यापि प्रतीतिविशेषा- त्मैव रस इत्युक्तिः, प्राक्तस्यापि व्यपदेशिवद्भाद्रसादीनां प्रतीतिरित्‍येवमन्यत्र । धर्म ) रूपादि के सदृश हैं अथवा माणिक्य में रहने वाले जात्यत्व के सदृश हैं । प्रथम पक्ष नहीं होगा, क्योंकि ( रसादि धर्म ) सब को उस प्रकार प्रतीत नही होते । दूसरा भी नहीं होगा, क्योंकि जात्यत्व की भांति अनतिरिक्त रूप से प्रकाशित नहीं होते । यह हेतु प्रथम पक्ष में संगत होता ही है । उसे कहते हैं—'यह कह सकते हैं' इत्यादि द्वारा 'ऐसा नहीं इस ( ग्रन्थ ) तक । इसी का समर्थन करते हैं—नहीं होती कि—। और इसलिए—। जिस कारण वाच्य के धर्म के रूप में रसादि की प्रतीति नहीं है और जिस कारण उस ( रसादि ) की प्रतीति में वाच्य की प्रतीति सर्वथा अनुपयोगिनी है उसी कारण से क्रम को अवश्य होना चाहिए । क्योंकि साथ में उत्पन्न होने वाले एक दूसरे का उपकार नहीं कर सकते । परन्तु वह क्रम सहृदयों की भावना के अभ्यास से नहीं लक्षित होता अन्यथा लक्षित भी होता यह पहले कह चुके हैं । पहले जिसकी भी यह उक्ति है कि रस प्रतीतिविशेष रूप ही है उसकी भी रसादि की प्रतीति ( 'राहु का सिर' की भांति ) व्यपदेशिवद्भाव ( भेदारोप ) से होगी । इसी प्रकार अन्यत्र भी ।

४४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कार्यकारणभावेन व्यवस्थानात्क्रमोऽवश्यम्भावी। स तु लाघवान्न प्रकाश्यते 'इत्यलक्ष्यक्रमा एव सन्तो व्यङ्ग्या रसादयः' इत्युक्तम्। ननु शब्द एव प्रकरणाद्यवच्छिन्नो वाच्यव्यङ्ग्ययोः सममेव प्रतीतिमुपजनयतीति किं तत्र क्रमकल्पनया। न हि शब्दस्य वाच्य- प्रतीतिपरामर्श एव व्यञ्जकत्वे निवन्धनम्। तथा हि गीतादिशब्देभ्यो- ऽपि रसाभिव्यक्तिरस्ति। न च तेषामन्तरा वाच्यपरामर्शः। अत्रापि प्रतीतियों में कार्यकारणभाव के होने से क्रम अवश्यम्भावी है, परन्तु वह लाघव के कारण प्रकाशित नहीं होता, इस लिए 'अलक्ष्यक्रम होते हुए ही रसादि व्यङ्ग्य होते हैं' यह कहा गया है। (शङ्का) शब्द ही प्रकरणादि से सहकृत होकर वाच्य और व्यङ्ग्य की साथ ही प्रतीति उत्पन्न करता है, वहाँ क्रम की कल्पना से क्या ? वाच्य की प्रतीति का परामर्श ही शब्द के व्यञ्जक होने में कारण तो है नहीं। जैसा कि गीत आदि शब्दों से भी रस की अभिव्यक्ति है, न कि बीच में उन (गीतादि शब्दों) के वाच्य का लोचनम् ननु भवन्तु वाच्यादतिरिक्ता रसाद्यस्तत्रापि क्रमो न लक्ष्यत इति ताव- त्त्वयैवोक्तम्। तत्कल्पने च प्रमाणं नास्ति। अन्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थप्रतीति- मन्तरेण रसप्रतीत्युदयस्य पदविरहितस्वरालापगीतादौ शब्दमात्रोपयोगकृतस्य दर्शनात्। ततश्चैकयैव सामग्र्या सहैव वाच्यं व्यङ्ग्याभिमतं च रसादि भातीति वचनव्यञ्जनव्यापारद्वयेन न किञ्चिदिति तदाह—नन्विति। यत्रापि गीतशब्दानामर्थोऽस्ति तत्रापि तत्प्रतीतिरनुपयोगिनी ग्रामरागानुसारेणापहस्ति- तवाच्यानुसारतया रसोदयदर्शनात्। न चापि सा सर्वत्र भवन्ती दृश्यते, तदेतदाह—न चेति। तेषामिति गीतादिशब्दानाम्। आदिशब्देन वाद्यविल- मानते हैं कि रसादि वाच्य से अतिरिक्त हैं, उनमें भी क्रम लक्षित नहीं होता यह बात तुमने ही कही है। उस (क्रम) की कल्पना में प्रमाण नहीं है। क्योंकि अन्वय- व्यतिरेक से अर्थ की प्रतीति के बिना, पदविरहित स्वरालाप वाले गीतादि में शब्दमात्र के उपयोग से हुआ रस-प्रतीति का उदय देखा जाता है। तब एक ही सामग्री से साथ ही वाच्य और व्यङ्ग्य के रूप में अभिमत रसादि प्रतीत होता है, इस प्रकार दो वचन और व्यञ्जन व्यापार से कुछ नहीं होता, उसे कहते हैं—(शङ्का)—। जहां भी गीत के शब्दों का अर्थ है वहां भी उसकी प्रतीति का उपयोग नहीं, क्योंकि ग्राम्य, राग के अनुसार वाच्य का अनुसरण छोड़ देने से रस का उदय देखा जाता है। ऐसा नहीं कि वह (वाच्य की प्रतीति) सब जगह होती देखी जाती है, इसलिए यह कहते हैं—न कि—। 'उनका' गीतादि शब्दों का। 'आदि' शब्द से वाद्य शब्द, विलपित शब्द आदि

तृतीय उद्योतः ४४७ ध्वन्यालोकः ब्रूमः—प्रकरणाद्यवच्छेदेन व्यञ्जकत्वं शब्दानामित्यनुमतमेवैतदस्मा- कम् । किं तु तद्व्यञ्जकत्वं तेषां कदाचित्स्वरूपविशेषनिबन्धनं कदाचि- द्वाचकशक्तिनिबन्धनम् । तत्र येषां वाचकशक्तिनिबन्धनं तेषां यदि वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव स्वरूपप्रतीत्या निष्पन्नं तद्भवेन्न तर्हि वाचक- शक्तिनिबन्धनम् । अथ तन्निबन्धनं तन्नियमेनैव वाच्यवाचकभाव- प्रतीत्युत्तरकालत्वं व्यङ्ग्यप्रतीतेः प्राप्तमेव । परामर्श होता है । (समाधान) यहां भी हम कहते हैं—प्रकरण आदि के सहकार से शब्दों का व्यञ्जकत्व है यह हमें अनुमत ही है । किन्तु वह व्यञ्जकत्व उनका कभी स्वरूप विशेष के कारण और कभी वाचक शक्ति के कारण है। उनमें जिनका वाचक शक्ति के कारण है उनके यदि वाच्य की प्रतीति के बिना ही स्वरूप की प्रतीति से वह निष्पन्न हो तो वाचकशक्तिमूलक नहीं है और यदि वाचकशक्ति- मूलक है तो नियमतः ही व्यङ्ग्य की प्रतीति का वाच्यवाचकभाव की प्रतीति के उत्तरकाल में होना प्राप्त ही है। लोचनम् पितशब्दादयो निर्दिष्टाः । अनुमतमिति । ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति ह्यवोचामेति भावः । न तर्हीति । ततश्च गीतवदेवार्थावगमं विनैव रसावभासः स्यात्काव्य- शब्देभ्यः, न चैवमिति वाचकशक्तिरपि तत्रापेक्षणीया; सा च वाच्यनिष्ठैवेति प्राग्वाच्ये प्रतिपत्तिरित्युपगन्तव्यम् । तदाह—अथेति । तदिति वाचकशक्तिः । वाच्यवाचकभावेति । सैव वाचकशक्तिरित्युच्यते । एतदुक्तं भवति—मा भूद्वाच्यं रसादिव्यञ्जकम्; अस्तु शब्दादेव तत्प्रतीति- स्तथापि तेन स्ववाचकशक्तिस्तस्यां कर्तव्यायां सहकारितयावश्यापेक्षणीये- त्यायातं वाच्यप्रतीतेः पूर्वभावित्वमिति । ननु गीतशब्दवदेव वाचकशक्तिरत्रा- निर्दिष्ट हैं । अनुमत—। भाव यह कि ‘जहां अर्थ अथवा शब्द’० यह हमने कहा है । तो वाचकशक्तिमूलक नहीं है—। तब तो गीत ही की भांति अर्थज्ञान के बिना ही काव्य-शब्दों से रस की प्रतीति होगी, पर ऐसा नहीं, इसलिए वहां वाचकशक्ति की अपेक्षा है; और वह वाच्यनिष्ठ ही है, अतः पहले वाक्य का ज्ञान मानना चाहिए । उसे कहते हैं—यदि—। ‘वह’ अर्थात् वाचकशक्ति । वाच्यवाचकभाव—। वही वाचकशक्ति कहलाता है । बात यह कही गई—वाच्य रसादि का व्यञ्जक मत हो; शब्द ही से उनकी प्रतीति हो, तथापि उसे (शब्द को) अपनी वाचकशक्ति की उसे (रसादि की प्रतीति को) उत्पन्न करने में अवश्य अपेक्षा करनी होगी, इस कारण वाच्य की प्रतीति का पहले उत्पन्न होने की बात आ जाती है । (शङ्का) गीत शब्दों की भांति ही यहां भी वाचक-