भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 493

तृतीय उद्योतः ४३३ ध्वन्यालोकः यदि नाम सर्वजनानुभवगोचरता तस्य नास्ति नैतावतासा- वलोकसामान्यमहानुभावचित्तवृत्तिविशेषः प्रतिक्षेप्तुं शक्यः । न च वीरे तस्यान्तर्भावः कर्तुं युक्तः । तस्याभिमानमयत्वेन व्यवस्थापनात् । अस्य चाहङ्कारप्रशमैकरूपतया स्थितेः । तयोश्चैवंविधविशेषसद्भावेऽपि यदि वह (शान्त) सभी लोगों के अनुभव का गोचर नहीं है, इतने से अलोक- सामान्य महापुरुषों के चित्तवृत्तिविशेष को निराकरण नहीं किया जा सकता । और वीर में उसका अन्तर्भाव करना ठीक नहीं । क्योंकि उस (वीर) का अभिमानमय रूप से व्यवस्थापन होता है । और यह (शान्त) अहङ्कार के एकमात्र प्रशमरूप से लोचनम् ननु प्रतीयते सर्वस्य श्लाघास्पदं न भवति । तर्हि वीतरागाणां शृङ्गारो न श्लाघ्य इति सोऽपि रसत्वाच्च्यवतामिति तदाह-यदि नामेति । ननु धर्मप्रधा- नोऽसौ वीर एवेति सम्भावयमान आह-न चेति । तस्येति वीरस्य। अभिमान- मयत्वेनेति । उत्साहो ह्यहमेवंविध इत्येवंप्राण इत्यर्थः । अस्य चेति शान्तस्य । तयोश्चेति । ईहामयत्वनिरीहत्वाभ्यामत्यन्तविरुद्धयोरपीति चशब्दार्थः । वीररौ- द्रयोस्त्वत्यन्तविरोधोऽपि नास्ति । समानं रूपं च धर्मार्थकामार्जनोपयोगित्वम् । नन्वेवं दयावीरो धर्मवीरो दानवीरो वा नासौ कश्चित्, शान्तस्यैवेदं नामान्तरकरणम् । तथा हि मुनिः- दानवीरं धर्मवीरं युद्धवीरं तथैव च । रसवीरमपि प्राह ब्रह्मा त्रिविधसम्मितम् ॥ (शङ्का) प्रतीत तो होता है पर सब की प्रशंसा का पात्र नहीं होता (अर्थात् सब लोग उसे नहीं चाहते) । (समाधान) तब तो वीतराग पुरुषों की दृष्टि में शृङ्गार श्लाघ्य नहीं है तो वह भी रसत्व से च्युत हो जाय ! इसे कहते हैं-यदि-। 'वह (शान्त) धर्मप्रधान वीर ही है' यह सम्भावना करते हुए कहते हैं-वीर में...ठीक नहीं-। 'उसका' अर्थात् वीर का । अभिमानमय रूप से-। अर्थात् 'मैं इस प्रकार का हूँ' एतद्-रूप उत्साह होता है । 'और' शब्द का अर्थ है कि ईहामयत्व और निरी- हत्व से अत्यन्त विरुद्ध भी (उन दोनों में) । वीर और रौद्र का तो अत्यन्त विरोध भी नहीं है। धर्म, अर्थ, काम के अर्जन का उपयोगित्व समान रूप है। (शङ्का) इस प्रकार वह दयावीर, धर्मवीर अथवा दानवीर कोई नहीं, बल्कि यह शान्त का ही दूसरा नामकरण है। जैसा कि मुनि कहते हैं- दानवीर, धर्मवीर और उसी प्रकार युद्धवीर ये रस वीर को ही ब्रह्माजी ने तीन प्रकार से विभक्त करके कहा है । २८ ध्व०