ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यद्यैक्यं परिकल्प्यते तद्वीररौद्रयोरपि तथा प्रसङ्गः । दयाविरादीनां च चित्तवृत्तिविशेषाणां सर्वाकारमहङ्काररहितत्वेन शान्तरसप्रभेदत्वम् , इतरथा तु वीरप्रभेदत्वमिति व्यवस्थाप्यमाने न कश्चिद्विरोधः । तदेवमस्ति शान्तो रसः । तस्य चाविरुद्धरसव्यवधानेन प्रबन्धे विरोधि- रससमावेशे सत्यपि निर्विरोधत्वम् । यथा प्रदर्शिते विषये । रहता है। और उन दोनों में इस प्रकार के विशेष (भेद) के विद्यमान रहने पर भी यदि ऐक्य (अभेद) की परिकल्पना करते हैं तो वीर और रौद्र में भी उस प्रकार का प्रसङ्ग होगा। और दयावीर आदि चित्तवृत्ति-विशेषों के सब प्रकार से अहङ्काररहित होने के कारण शान्त रस के प्रभेद हो सकते हैं, अन्यथा वीर रस के प्रभेद हैं, इस प्रकार व्यवस्था करने पर कोई विरोध नहीं है। तो इस प्रकार शान्त रस है। और प्रबन्ध में अविरुद्ध रस का व्यवधान करके उसके विरोधी रस का समा- वेश होने पर भी विरोध नहीं होगा। जैसे प्रदर्शित विषय में। लोचनम् इत्यागमपुरःसरं त्रैविध्यमेवाभ्यधात् । तदाह—दयावीरादीनाञ्चेत्यादि- ग्रहणेन । विषयजुगुप्सारूपत्वाद् बीभत्सेऽन्तर्भावः शङ्क्येत । सा त्वस्य व्यभिचारिणी भवति न तु स्थायितामेति, पर्यन्तनिर्वाहे तस्या मूलत एव विच्छेदात्। आधिकारिकत्वेन तु शान्तो रसो न निबद्धव्य इति चन्द्रिकाकारः। तच्चेहास्माभिर्न पर्यालोचितं, प्रसङ्गान्तरात् । मोक्षफलत्वेन चायं परमपुरुषार्थ- निष्ठत्वात्सर्वरसेभ्यः प्रधानतमः । स चायमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन काव्य- कौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुतरकृतनिर्णयपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना ॥ २६ ॥ इस आगम के अनुसार त्रैविध्य ही कहा है। उसे कहते हैं—'और दयावीर आदि' इत्यादि ग्रहण द्वारा । (शान्त रस के स्थायी के) विषयजुगुप्सा रूप होने के कारण वीभत्स में अन्तर्भाव की (कुछ लोग) सम्भावना करते हैं। परन्तु वह (जुगुप्सा) इसकी (शान्त की) व्यभिचारी भाव होती है, न कि स्थायी भाव है, पर्यन्त तक निर्वाह की स्थिति में वह मूल में ही विच्छिन्न हो जाती है। चन्द्रिकाकार का कहना है कि आधिकारिक रूप से शान्त रस को निबन्धन नहीं करना चाहिए। प्रसङ्गान्तर होने के कारण हमने उसका पर्यालोचन नहीं किया है। मोक्ष रूप फल वाला होने के कारण परमपुरुषार्थनिष्ठ होने से यह (शान्त) सभी रसों में प्रधानतम है। उसे हमारे उपाध्याय भट्टतौत ने 'काव्यकौतुक' में और हमने उसके 'विवरण' में पूर्वपक्ष और सिद्धान्त के द्वारा बहुत प्रकार से निर्णय किया है ॥ २६ ॥