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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

४३४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यद्यैक्यं परिकल्प्यते तद्वीररौद्रयोरपि तथा प्रसङ्गः । दयाविरादीनां च चित्तवृत्तिविशेषाणां सर्वाकारमहङ्काररहितत्वेन शान्तरसप्रभेदत्वम् , इतरथा तु वीरप्रभेदत्वमिति व्यवस्थाप्यमाने न कश्चिद्विरोधः । तदेवमस्ति शान्तो रसः । तस्य चाविरुद्धरसव्यवधानेन प्रबन्धे विरोधि- रससमावेशे सत्यपि निर्विरोधत्वम् । यथा प्रदर्शिते विषये । रहता है। और उन दोनों में इस प्रकार के विशेष (भेद) के विद्यमान रहने पर भी यदि ऐक्य (अभेद) की परिकल्पना करते हैं तो वीर और रौद्र में भी उस प्रकार का प्रसङ्ग होगा। और दयावीर आदि चित्तवृत्ति-विशेषों के सब प्रकार से अहङ्काररहित होने के कारण शान्त रस के प्रभेद हो सकते हैं, अन्यथा वीर रस के प्रभेद हैं, इस प्रकार व्यवस्था करने पर कोई विरोध नहीं है। तो इस प्रकार शान्त रस है। और प्रबन्ध में अविरुद्ध रस का व्यवधान करके उसके विरोधी रस का समा- वेश होने पर भी विरोध नहीं होगा। जैसे प्रदर्शित विषय में। लोचनम् इत्यागमपुरःसरं त्रैविध्यमेवाभ्यधात् । तदाह—दयावीरादीनाञ्चेत्यादि- ग्रहणेन । विषयजुगुप्सारूपत्वाद् बीभत्सेऽन्तर्भावः शङ्क्येत । सा त्वस्य व्यभिचारिणी भवति न तु स्थायितामेति, पर्यन्तनिर्वाहे तस्या मूलत एव विच्छेदात्। आधिकारिकत्वेन तु शान्तो रसो न निबद्धव्य इति चन्द्रिकाकारः। तच्चेहास्माभिर्न पर्यालोचितं, प्रसङ्गान्तरात् । मोक्षफलत्वेन चायं परमपुरुषार्थ- निष्ठत्वात्सर्वरसेभ्यः प्रधानतमः । स चायमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन काव्य- कौतुके, अस्माभिश्च तद्विवरणे बहुतरकृतनिर्णयपूर्वपक्षसिद्धान्त इत्यलं बहुना ॥ २६ ॥ इस आगम के अनुसार त्रैविध्य ही कहा है। उसे कहते हैं—'और दयावीर आदि' इत्यादि ग्रहण द्वारा । (शान्त रस के स्थायी के) विषयजुगुप्सा रूप होने के कारण वीभत्स में अन्तर्भाव की (कुछ लोग) सम्भावना करते हैं। परन्तु वह (जुगुप्सा) इसकी (शान्त की) व्यभिचारी भाव होती है, न कि स्थायी भाव है, पर्यन्त तक निर्वाह की स्थिति में वह मूल में ही विच्छिन्न हो जाती है। चन्द्रिकाकार का कहना है कि आधिकारिक रूप से शान्त रस को निबन्धन नहीं करना चाहिए। प्रसङ्गान्तर होने के कारण हमने उसका पर्यालोचन नहीं किया है। मोक्ष रूप फल वाला होने के कारण परमपुरुषार्थनिष्ठ होने से यह (शान्त) सभी रसों में प्रधानतम है। उसे हमारे उपाध्याय भट्टतौत ने 'काव्यकौतुक' में और हमने उसके 'विवरण' में पूर्वपक्ष और सिद्धान्त के द्वारा बहुत प्रकार से निर्णय किया है ॥ २६ ॥

तृतीय उद्योतः ४३५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः एतदेव स्थिरीकर्तुमिदमुच्यते— रसान्तरान्तरितयोरेकवाक्यस्थयोरपि । निवर्तते हि रसयोः समावेशे विरोधिता ॥ २७ ॥ रसान्तरव्यवहितयोरेकप्रबन्धस्थयोर्विरोधिता निवर्तत इत्यत्र न काचिद्भ्रान्तिः । यस्मादेकवाक्यस्थयोरपिरसयोरुक्तया नीत्या विरुद्धता निवर्तते । यथा— भूरेणुदिग्धान्नवपारिजातमालारजोवासितबाहुमध्याः । गाढं शिवाभिः परिरभ्यमाणान्सुराङ्गनाश्लिष्टभुजान्तरालाः ॥ सशोणितैः क्रव्यभुजां स्फुरद्भिः पक्षैः खगानामुपवीज्यमानान् । संवीजिताश्चन्दनवारिसेकैः सुगन्धिभिः कल्पलतादुकूलैः ॥ विमानपर्यङ्कतले निषण्णाः कुतूहलाविष्टतया तदानीम् । निर्दिश्यमानांल्ललनाङ्गुलीभिर्वीराः स्वदेहान् पतितानपश्यन् ॥ इसे ही स्थिर करने के लिए यह कहते हैं— एक ही वाक्य में स्थित रहने वाले होने पर भी दो रसों का दूसरे रस के बीच में होने से समावेश होने पर विरोध नहीं होता ॥ २७ ॥ दूसरे रस के बीच में होने से एक ही प्रबन्ध में रहने वाले भी ( रसों का ) विरोध निवृत्त हो जाता है, इसमें कोई भ्रम नहीं । क्योंकि उक्त नीति के अनुसार एक वाक्य में रहने वाले ( रसों ) का भी विरोध निवृत्त हो जाता है । जैसे— नये पारिजात की माला के पराग से वासित बाहुमध्य वाले, सुराङ्गनाओं द्वारा आलिङ्गन किए जाते हुए भुजमध्य वाले, सुगन्धि चन्दन के पानी के छिड़काव से युक्त कल्पलता के दुकूलों द्वारा झले जाते गए, विमान के पर्यङ्क पर बैठे वीरों ने ललनाओं की उंगलियों से दिखाए जाते हुए पृथ्वी की धूल में सने, सियारियों द्वारा कसकर पकड़े जाते हुए, खून से भिंगे और चमकते हुए मांसभक्षी पक्षियों के पंखों से झले जाते हुए अपने शरीरों को उस समय कुतूहल से आविष्ट होकर देखा । लोचनम् स्थिरीकर्तुमिति । शिष्यबुद्धावित्यर्थः । अपिशब्देन प्रबन्धविषयतया सिद्धो- ऽयमर्थ इति दर्शयति—भूरेण्विति । विशेषणैरतीव दूरापेतत्वमसम्भावनास्पद- स्थिर करने के लिए—। अर्थात् शिष्य की बुद्धि में । 'भी' शब्द से यह बात सिद्ध हो चुकी है' यह दिखाते हैं— नये पारिजात—। विशेषणों से बहुत दूर की बात होना

४३६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यादौ । अत्र हि शृङ्गारबीभत्सयोस्तदङ्गयोर्वा वीररसव्यवधानेन समावेशो न विरोधी । विरोधमविरोधं च सर्वत्रेत्थं निरूपयेत् । विशेषतस्तु शृङ्गारे सुकुमारतमो ह्यसौ ॥ २४ ॥ यथोक्तलक्षणानुसारेण विरोधाविरोधौ सर्वेषु रसेषु प्रबन्धेऽन्यत्र च निरूपयेत्सहृदयः; विशेषतस्तु शृङ्गारे । स हि रतिपरिपोषात्मकत्वाद् इत्यादि में। यहाँ शृङ्गार और बीभत्स का अथवा उनके अङ्गों का बीच में वीर रस को रखकर समावेश विरोधी नहीं है। इस प्रकार सभी जगह विरोध और अविरोध का निरूपण करे, किन्तु शृङ्गार में विशेष रूप से; क्योंकि वह सबसे सुकुमार है ॥ २४ ॥ सहृदय (कवि) यथोक्त लक्षण के अनुसार सब रसों में, प्रबन्ध में और अन्यत्र विरोध और अविरोध का निरूपण करे, विशेष रूप से शृङ्गार में; क्योंकि वह रति का लोचनम् मुक्तम् । स्वदेहानित्यनेन देहत्वाभिमानादेव तादात्म्यसम्भावनानिष्पत्तेरेका- श्रयत्वमस्ति, अन्यथा विभिन्नविषयत्वात्को विरोधः । ननु वीर एवात्र रसो न शृङ्गारो न बीभत्स; किन्तु रतिजुगुप्से हि वीरं प्रति व्यभिचारीभूते। भवत्वेवम् , तथापि प्रकृतोदाहरणता तावदुपपन्ना । तदाह—तदङ्गयोर्वेति । तयोरङ्गे तत्स्थायिभावावित्यर्थः। वीररसेति । 'वीराः स्वदेहान्' इत्यादिना तदीयोत्साहाद्य- वगंत्या कर्तृकर्मणोः समस्तवाक्यार्थानुयायितया प्रतीतिरिति मध्यपाठाभावेऽपि सुतरां वीरस्य व्यवधायकतेति भावः ॥ २७ ॥ अन्यत्र चेति मुक्तकादौ । स हि शृङ्गारः सुकुमारतम इति सम्बन्धः । और सम्भावना का आस्पद न होना कहा है। 'अपने शरीरों को' इससे शरीरत्वाभिमान के कारण ही तादात्म्य (अभेद) की सम्भावना निष्पन्न होती है अतः एकाश्रयत्व है, अन्यथा विभिन्न विषय होने के कारण कौन विरोध होता ! (शङ्का) यहां वीर ही रस है, न शृङ्गार है, न बीभत्स है, किन्तु रति और जुगुप्सा वीर के प्रति व्यभिचारी भाव हो गए हैं। (समाधान) इस प्रकार हो भी, तथापि प्रकृत में उदाहरण होना उपपन्न है। उसे कहते हैं—अथवा उनके अङ्गों का—। उनके अङ्ग अर्थात् उनके स्थायी भाव। वीर रस—। भाव यह कि 'वीरों ने अपने शरीरों को' इत्यादि से उनके उत्साह आदि के ज्ञान से कर्ता और कर्म की समस्त वाक्यार्थ में अनुगत रूप से प्रतीति होती है, इसके अनुसार बीच में पाठ न होने पर भी सुतरां वीर ही व्यवधायक है ॥ २७ ॥ और अन्यत्र—। मुक्तक आदि में ! वह शृङ्गार सुकुमारतम है, यह (वाक्य का)

तृतीय उद्योतः ४३७ ध्वन्यालोकः रतेश्च स्वल्पेनापि निमित्तेन भङ्गसम्भवात्सुकुमारतमः सर्वेभ्यो रसेभ्यो मनागपि विरोधिसमावेशं न सहते । अवधानातिशयवान् रसे तत्रैव सत्कविः । भवेत्तस्मिन् प्रमादो हि झटित्येवोपलक्ष्यते ॥ २९ ॥ तत्रैव च रसे सर्वेभ्योऽपि रसेभ्यः सौकुमार्यातिशययोगिनि कविरवधानवान् प्रयत्नवान् स्यात् । तत्र हि प्रमाद्यतस्तस्य सहृदयमध्ये क्षिप्रमेवावज्ञानविषयता भवति । शृङ्गाररसो हि संसारिणां नियमेना- नुभवविषयत्वात् सर्वरसेभ्यः कमनीयतया प्रधानभूतः । एवं च सति— विनेयानुन्मुखीकर्तुं काव्यशोभार्थमेव वा । तद्विरुद्धरसस्पर्शस्तदङ्गानां न दुष्यति ॥ ३० ॥ परिपोषरूप होने से और रति का थोड़े भी निमित्त से भङ्ग सम्भव हो जाने से सब रसों से अधिक सुकुमार होता है, थोड़ा भी विरोधी का समावेश नहीं सहन करता । सत्कवि उसी रस में अतिशय अवधान करे, क्योंकि उसमें प्रमाद झट से लक्षित हो जाता है ॥ २९ ॥ सभी रसों से अतिशय सौकुमार्य रखने वाले उसी रस में कवि अवधान करे, प्रयत्नशील हो । क्योंकि उसमें प्रमाद करते हुए उसका अज्ञान शीघ्र ही सहृदयों के मध्य में विदित हो जायगा । शृङ्गार रस संसारी जनों के नियमतः अनुभव का विषय होने के कारण सभी रसों से कमनीय होने के कारण प्रधानभूत है । और ऐसा होने पर— शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए ही उसके विरुद्ध रसों में उसके अङ्गों का स्पर्श अथवा दूषित नहीं होता ॥ ३० ॥ लोचनम् सुकुमारस्तावद्रसजातीयस्ततोऽपि करुणस्ततोऽपि शृङ्गार इति तम- प्रत्ययः ॥ २८–२६ ॥ एवं चेति । यतोऽसौ सर्वसंवादीत्यर्थः । तदिति । शृङ्गारस्य विरुद्धा ये शान्तादयस्तेष्वपि तदङ्गानां शृङ्गाराङ्गानां सम्बन्धी स्पर्शो न दुष्टः । तया सम्बन्ध है । एक तो रसमात्र सुकुमार होता है, उसमें भी करुण और उसमें भी शृङ्गार इस लिए 'तमप्' प्रत्यय है ॥ २८–२९ ॥ और ऐसा—। अर्थात् जिस कारण वह ( शृङ्गार ) सर्वसंवादी ( अर्थात् सभी सहृदयों के हृदय का संवाद रखने वाला ) है । उसके—। शृङ्गार के विरुद्ध जो शान्त

४३८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शृङ्गारविरुद्धरसस्पर्शः शृङ्गाराङ्गानां यः स न केवलमविरोधलक्ष- णयोगे सति न दुष्यति यावद्विनेयानुन्मुखीकर्तुं काव्यशोभार्थमेव वा क्रियमाणो न दुष्यति । शृङ्गाररसाङ्गैरुन्मुखीकृताः सन्तो हि विनेयाः शृङ्गार के विरुद्ध रसों में शृङ्गार के अङ्गों का जो स्पर्श है वह न केवल अविरोध के लक्षणों का योग होने पर नहीं दूषित होता, बल्कि शिष्यों को उन्मुख करने के निमित्त काव्य की शोभा के लिए ही अथवा किया जाता हुआ नहीं दूषित होता । क्योंकि शृङ्गार रस के अङ्गों द्वारा उन्मुख किए जाने पर शिष्य लोग सुखपूर्वक विनय के लोचनम् भङ्ग्या रसान्तरगता अपि विभावानुभावाद्या वर्णनीया यया शृङ्गाराङ्गभाव- मुपागमन् । यथा ममैव स्तोत्रे— त्वां चन्द्रचूडं सहसा स्पृशन्ती प्राणेश्वरं गाढवियोगतप्ता । सा चन्द्रकान्ताकृतिपुत्रिकेव संविद्विलीयापि विलीयते मे ॥ इत्यत्र शान्तविभावानुभावानामपि शृङ्गारभङ्ग्या निरूपणम् । विनेया- नुन्मुखीकर्तुं या काव्यशोभा तदर्थं नैव दुष्यतीति सम्बन्धः । वाग्रहणेन पक्षान्तरमुच्यते । तदेव व्याचष्टे—न केवलमिति । वाशब्दस्यैतद्व्याख्यानम् । अविरोधलक्षणं परिपोषपरिहारादि पूर्वोक्तम् । विनेयानुन्मुखीकर्तुं या काव्य- शोभा तदर्थमपि वा विरुद्धसमावेशः न केवलं पूर्वोक्तैः प्रकारैः, न तु काव्य- शोभा विनेयोन्मुखीकरणमन्तरेणास्ते, व्यवधानाव्यवधाने नापि लभ्येते आदि हैं उनमें भी उस शृङ्गार के अङ्गों का सम्बन्धी स्पर्श दोषयुक्त नहीं। उस अङ्गी से रसान्तरगत भी विभाव, अनुभाव आदि का वर्णन करना चाहिए जिससे (वे) शृङ्गार के अङ्ग बन जाँय । जैसे, मेरे ही स्तोत्र में— चन्द्र का भूषण धारण करने वाले तुम प्राणेश्वर को सहसा स्पर्श करती हुई, गाढ वियोग से तप्त मेरी संवित् (अन्तःकरण अथवा उसकी वृत्ति) चन्द्रकान्त की बनी पुतली की भांति विलीन होकर भी विलीन हो रही है । यहां शान्त के विभाव और अनुभावों का भी शृङ्गार की भङ्गी से निरूपण है। 'शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए नहीं दूषित होता' यह (वाक्य का) सम्बन्ध है । 'अथवा' ग्रहण से पक्षान्तर कहा गया है । उसी का व्याख्यान करते हैं—न केवल—। 'अथवा' शब्द का यह व्याख्यान है। परिपोष परिहार आदि अविरोध के लक्षण पहले कहे जा चुके हैं । शिष्यों को उन्मुख करने के लिए जो काव्य की शोभा है उसके लिए भी अथवा विरुद्ध समावेश है, न केवल पूर्वोक्त प्रकारों से (विरुद्ध समावेश नहीं दूषित होता है), न कि काव्य की शोभा शिष्यों को उन्मुख करने के बिना हो सकती है, (बल्कि वह तो रसान्तर से व्यवधान और

तृतीय उद्योतः ४३९ ध्वन्यालोकः सुखं विनयोपदेशान् गृह्णन्ति । सदाचारोपदेशरूपा हि नाटकादिगोष्ठी विनेयजनहितार्थमेव मुनिभिरवतारिता । किं च शृङ्गारस्य सकलजनमनोहराभिरामत्वात्तदङ्गसमावेशः काव्ये शोभातिशयं पुष्यतीत्यनेनापि प्रकारेण विरोधिनि रसे शृङ्गारा- ङ्गसमावेशो न विरोधी । ततश्च— उपदेशों को ग्रहण कर लेते हैं। सदाचार के उपदेशरूप नाटक आदि गोष्ठियों को मुनियों ने शिष्य जनों के हित के लिए ही निकाला है। और भी, शृङ्गार क्योंकि समस्त लोगों के मन को हरण करने वाला एवं सुन्दर होता है इस कारण उसके अङ्गों का समावेश काव्य में अतिशय शोभा को पुष्ट करता है, इस प्रकार भी विरोधी रस में शृङ्गार के अङ्गों का समावेश विरोधी नहीं। और इसलिए— लोचनम् यथान्यैर्व्याख्याते । सुखमिति । रञ्जनापुरःसरमित्यर्थः । ननु काव्यं क्रीडारूपं क च वेदादिगोचरा उपदेशकथा इत्याशङ्कयाह—सदाचारेति । मुनिभिरिति— भरतादिभिरित्यर्थः । एतच्च प्रभुमित्रसम्मितेभ्यः शास्त्रेतिहासेभ्यः प्रीतिपूर्वकं जायासम्मितत्वेन नाट्यकाव्यगतं व्युत्पत्तिकारित्वं पूर्वमेव निरूपितमस्मा- भिरिति न पुनरुक्तभयादिह लिखितम् । ननु शृङ्गाराङ्गताभङ्ग्या यद्विभावादिनिरूपणमेतावत्तैव किं विनेयोन्मुखी- कारः । न; अस्ति प्रकारान्तरं, तदाह—किं चेति । शोभातिशियमिति । अलङ्कार- विशेषमुपमाप्रभृतिं पुष्यति सुन्दरीकरोतीत्यर्थः । यथोक्तम्—‘काव्यशोभायाः अव्यवधान से भी प्राप्त होती है, जैसा कि अन्य लोगों द्वारा किए गए व्याख्यान में । सुखपूर्वक अर्थात् रञ्जनापूर्वक । ‘काव्य तो क्रीडा रूप है फिर वेद आदि में रहने वाली उपदेश की कथा कहां ?' यह आशङ्का करके कहते हैं—सदाचार—। मुनियों ने—। अर्थात् भरत आदि ने । प्रभुसम्मित तथा मित्रसम्मित शास्त्रों और इतिहासों से (अतिरिक्त ही) यह प्रीतिपूर्वक जायासम्मित रूप से नाट्यगत और काव्यगत व्युत्पत्तिकारित्व को हमने पहले ही निरूपण किया है, इसलिए पुनरुक्त होने के भय से यहां नहीं लिखा । ( शङ्का ) शृङ्गार के अङ्ग होने की भङ्गी जो विभाव आदि का निरूपण है उतने से ही ( काम चल जायगा ) शिष्यों को उन्मुख करना क्या ? ( समाधान ) नहीं; प्रका- रान्तर है, उसे कहते हैं—और भी—। अतिशय शोभा को—। अर्थात् उपमा प्रभृति अलङ्कार विशेष को पुष्ट करता है। जैसे, कहा है—‘काव्य की शोभा करने वाले धर्म

४४० सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
सत्यं मनोरमा रामाः सत्यं रम्या विभूतयः ।
किं तु मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम् ॥
इत्यादिषु नास्ति रसविरोधदोषः ।
विज्ञायेत्थं रसादीनामविरोधविरोधयोः ।
विषयं सुकविः काव्यं कुर्वन्मुह्यति न क्वचित् ॥ ३१ ॥
'यह ठीक है कि स्त्रियां मनोरम होती हैं, यह ठीक है कि विभूतियां रम्य होती
हैं, किन्तु जीवन मतवाली अङ्गना के कटाक्ष-भङ्ग की भांति चञ्चल होता है।'
इत्यादि में रसविरोध का दोष नहीं है ।
इस प्रकार रस आदि के अविरोध और विरोध के विषय को जान कर सुकवि
काव्य निर्माण करता हुआ कहीं पर भ्रमित नहीं होता ॥ ३१ ॥
लोचनम्
कर्तारो धर्मा गुणास्तदतिशयहेतवस्त्वलङ्कारा' इति । मत्ताङ्गनेति । अत्र हि
शान्तविभावे सर्वस्यानित्यत्वे वर्ण्यमाने न कस्यचिद्विभावस्य शृङ्गारभङ्ग्या
निबन्धः कृतः, किं तु सत्यमिति परहृदयानुप्रवेशेनोक्तम्; न खल्वलीक-
वैराग्यकौतुकरुचिं प्रकटयामः, अपि तु यस्य कृते सर्वमभ्यर्थ्यते तदेवेदं
चलमिति; तत्र मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गस्य शृङ्गारं प्रति सम्भाव्यमानविभावा-
नुभावत्वेनाङ्गस्य लोलतायामुपमानतोक्तेति प्रियतमाकटाक्षो हि सर्वस्या-
भिलषणीय इति च तत्प्रीत्या प्रवृत्तिमान् गुडजिह्विकया प्रसक्तानुप्रसक्त-
वस्तुतत्त्वसंवेदनेन वैराग्ये पर्यवस्यति विनेयः ॥ ३० ॥
तदेतदुपसंहरन्नस्योक्तस्य प्रकरणस्य फलमाह—विज्ञायेत्थमिति ॥ ३१ ॥
गुण है और ( शोभा ) को बढ़ाने वाले अलङ्कार हैं'। मतवाली अङ्गना—। यहां सभी
का अनित्यत्व रूप शान्त के विभाव के वर्णन में किसी विभाव का शृङ्गार की भङ्गी से
निबन्धन नहीं किया है, 'किन्तु ठीक है' यह दूसरे के हृदय में अनुप्रवेश के द्वारा कहा
है; हम मिथ्या वैराग्य के कौतुक के प्रति रुचि प्रकट करते हैं, अपितु जिसके लिए सब
कुछ चाहते हैं वही यह ( जीवन ) चञ्चल है; वहां शृङ्गार के प्रति विभाव और अनुभाव
के सम्भाव्यमान होने से अङ्गभूत मतवाली अङ्गना के अपाङ्गभङ्ग की चञ्चलता में उप-
मानता कही गई है, क्यों कि प्रियतमा का कटाक्ष सबका अभिलषणीय है इसलिए
उसकी प्रीति से प्रवृत्त होकर शिष्य गुडजिह्विका द्वारा प्रसक्तानुप्रसक्त वस्तुओं के तत्त्व के
संवेदन से वैराग्य में पर्यवसित होगा ॥ ३० ॥
तो इसका उपसंहार करते हुए इस उक्त प्रकरण का फल कहते हैं—इस प्रकार ॰॰
जानकर ॥ ३१ ॥

तृतीय उद्योतः ४४१

ध्वन्यालोकः इत्थमनेनानन्तरोक्तेन प्रकारेण रसादीनां रसभावतदाभासानां परस्परं विरोधस्याविरोधस्य च विषयं विज्ञाय सुकविः काव्यविषये प्रतिभातिशययुक्तः काव्यं कुर्वन्न क्वचिन्मुह्यति । एवं रसादिषु विरोधाविरोधनिरूपणस्योपयोगित्वं प्रतिपाद्य व्यञ्जकवाच्यवाचकनिरूपणस्यापि तद्विषयस्य तत्प्रतिपाद्यते— वाच्यानां वाचकानां च यदौचित्येन योजनम् । रसादिविषयेणैतत्कर्म मुख्यं महाकवेः ॥ ३२ ॥ वाच्यानामिति वृत्तविशेषाणां वाचकानां च तद्विषयाणां रसादि- इस प्रकार अभी कहे गए प्रकार के अनुसार रस आदि रस, भाव उसके आभास के परस्पर विरोध और अविरोध के विषय को जान कर सुकवि काव्य के विषय में अतिशय प्रतिभा से युक्त होकर काव्य निर्माण करता हुआ कहीं पर भ्रमित नहीं होता । इस प्रकार रस आदि में विरोध और अविरोध के निरूपण की उपयोगिता का प्रतिपादन करके उनके विषय (सम्बन्ध) के व्यञ्जक वाच्य तथा वाचक के निरूपण की भी उस (उपयोगिता) का प्रतिपादन करते हैं— वाच्य और वाचकों का जो रसादिविषयक औचित्य से जोड़ना है महाकवि मुख्य कर्म है ॥ ३२ ॥ वाच्य अर्थात् इतिवृत्त विशेषों का और उनके विषय के वाचकों का रसादिविषयक लोचनम् रसादिषु रसादिविषये व्यञ्जकानि यानि वाच्यानि विभावादीनि वाचकानि च सुप्तिङादीनि तेषां यन्निरूपणं तस्येति । तद्विषयस्येति । रसादिविषयस्य । तदिति उपयोगित्वम् । मुख्यमिति । ‘आलोकार्थी’ इत्यत्र यदुक्तं तदेवोपसंहृतम् । महाकवेरिति सिद्धवत्फलनिरूपणम् । एवं हि महाकवित्वं नान्यथेत्यर्थः । इति- वृत्तविशेषाणामिति । इतिवृत्तं हि प्रबन्धवाच्यं तस्य विशेषाः प्रागुक्ताः— ‘विभावभावानुभाव·सञ्चार्यौचित्यचारुणः । विधिः कथाशरीरस्य’ इत्यादिना । रसादि में अर्थात् रसादि के विषय में जो वाच्य विभावादि और वाचक सुप् तिङ् आदि हैं उनका जो निरूपण है उसका । उनके विषय के—। रसादि के विषय के । उस—। उपयोगिता । मुख्य—। ‘आलोकार्थी’ में जो कहा है उसी का उपसंहार किया है । महाकवि—। सिद्ध की भांति फल का निरूपण है, अर्थात् इस प्रकार महाकवित्व होता है अन्यथा नहीं । इतिवृत्तविशेष—। इतिवृत्त प्रबन्ध का वाच्य होता है, उसके विशेष पहले कहे गए हैं—विभाव, भाव, अनुभाव और सञ्चारी के औचित्य से

४४२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः विषयेणौचित्येन यद्योजनमेतन्महाकवेर्मुख्यं कर्म । अयमेव हि महाक- वेर्मुख्यो व्यापारो यद्रसादीनेव मुख्यतया काव्यार्थीकृत्य तद्व्यक्त्य- नुगुणत्वेन शब्दानांमर्थानां चोपनिबन्धनम् । एतच्च रसादितात्पर्येण काव्यनिबन्धनं भरतादावपि सुप्रसिद्ध- मेवेति प्रतिपादयितुमाह — औचित्य के साथ जो जोड़ना है, यह महान् कवि का मुख्य कर्म है । महाकवि का मुख्य यही व्यापार है जो रसादि को मुख्य रूप से काव्य का अर्थ बना कर उनकी व्यञ्जना के अनुगुण रूप से शब्दों और अर्थों का उपनिबन्धन है । और यह रसादि के तात्पर्य से काव्य का निबन्धन भरत आदि में भी सुप्रसिद्ध ही है यह प्रतिपादन करने के लिए कहते हैं— लोचनम् काव्यार्थीकृत्येति ! अन्यथा लौकिकशास्त्रीयवाक्यार्थेभ्यः कः काव्यार्थस्य विशेषः । एतच्च निर्णितमाद्योद्द्योते—'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' इत्यत्रा- न्तरे ॥ ३२ ॥ एतच्चेति । यदस्माभिरुक्तमित्यर्थः । भरतादावित्यादिग्रहणादलङ्कारशास्त्रेषु परुषाद्या वृत्तय इत्युक्तं भवति । द्वयोरपि तयोरिति । वृत्तिलक्षणयोर्व्यवहारयोरि- त्यर्थः । जीवभूता इति । 'वृत्तयः काव्यमातृकाः' इति ब्रुवाणेन मुनिना रसोचिते- तिवृत्तसमाश्रयणोपदेशेन रसस्यैव जीवितत्वमुक्तम् । भामहादिभिश्च— स्वादुकाव्यरसोन्मिश्रं वाक्यार्थमुपभुञ्जते । प्रथमालीढमधवः पिबन्ति कटुभेषजम् ॥ सुन्दर कथाशरीर का विधान०' इत्यादि द्वारा । काव्य का अर्थ बनाकर—। अन्यथा लौकिक और शास्त्रीय वाक्यार्थों से काव्यार्थ का विशेष ( भेद ) कौन होगा ? यह प्रथम उद्योत में निर्णय कर चुके हैं—'काव्य का आत्मा वही अर्थ है' इस प्रसङ्ग में ॥ ३२ ॥ और यह—। अर्थात् जिसे हमने कहा है । 'भरत आदि में' इस ग्रहण से यह बात कही गई कि अलङ्कार शास्त्रों में परुषा आदि वृत्तियां हैं । उन दोनों के भी—। अर्थात् दोनों वृत्ति रूप व्यवहारों के । जीवभूत—। 'वृत्तियां काव्य की माताएं होती हैं' यह कथन करते हुए मुनि ने रसोचित वृत्ति के समाश्रय के उपदेश द्वारा रस का ही जीवि- तत्व कथन किया है । और भामह आदि ने— स्वादु काव्य के रस से मिले वाक्यार्थ का उपयोग करते हैं, ( इसका मतलब हुआ कि ) पहले मधु का आलेहन करके कटु औषध का पान करते हैं ।

तृतीय उद्योतः ४४३ ध्वन्यालोकः रसाद्यनुगुणत्वेन व्यवहारोऽर्थशब्दयोः । औचित्यवान्यस्ता एता वृत्तयो द्विविधाः स्थिताः ॥३३॥ व्यवहारो हि वृत्तिरित्युच्यते । तत्र रसानुगुण औचित्यवान् वाच्याश्रयो यो व्यवहारस्ता एताः कैशिक्याद्या वृत्तयः । वाचकाश्रया- श्चोपनागरिकाद्याः । वृत्तयो हि रसादितात्पर्येण संनिवेशिताः कामपि नाट्यस्य काव्यस्य च च्छायामावहन्ति । रसादयो हि द्वयोरपि तयोर्जीवभूताः । इतिवृत्तादि तु शरीरभूतमेव । अत्र केचिदाहुः—‘गुणगुणिव्यवहारो रसादीनामितिवृत्तादिभिः सह युक्तः, न तु जीवशरीरव्यवहारः । रसादिमयं हि वाच्यं प्रतिभासते न तु रसादिभिः पृथग्भूतम्’ इति । अत्रोच्यते—यदि रसादिमयमेव अर्थ और शब्द का रसादि के अनुगुण रूप से जो औचित्यवान् व्यवहार है वह ये दो प्रकार की वृत्तियां मानी गई हैं ॥ ३३ ॥ व्यवहार 'वृत्ति' कहलाता है । वहां रस के अनुगुण औचित्यवान् वाच्याश्रित जो व्यवहार है वे ये कैशिकी आदि वृत्तियां हैं । और वाचकाश्रित (वृत्तियां) उपनाग- रिका आदि हैं । वृत्तियां रसादि के तात्पर्य से संनिवेशित होकर नाट्य और काव्य की अपूर्व शोभा कर देती हैं । रसादि उन दोनों के भी जीवभूत हैं । इतिवृत्त आदि तो शरीरभूत ही हैं । यहां कुछ लोग कहते हैं—'रसादि का इतिवृत्त आदि के साथ गुणगुणिव्यवहार ठीक है न कि जीव-शरीरव्यवहार । क्यों कि वाच्य रसादिमय प्रतीत होता है न कि रसादि से पृथग्भूत (प्रतीत होता है)' । यहां कहते हैं—यदि वाच्य रसादिमय ही लोचनम् इत्यादिना रसोपयोगजीवितः शब्दवृत्तिलक्षणो व्यवहार उक्तः । शरीरभूत- मिति । 'इतिवृत्तं हि नाट्यस्य शरीरं' इति मुनिः । नाट्यं च रस एवेत्युक्तं प्राक् । गुणगुणिव्यवहार इति । अत्यन्तसम्मिश्रतया प्रतिभासनाद्धर्मधर्मिव्यवहारो युक्तः । न त्विति । क्रमस्यासंवेदनादिति भावः । इत्यादि द्वारा रस के उपयोग से जीवित शब्दवृत्तिरूप व्यवहार कहा गया है । शरीरभूत—। मुनि के अनुसार 'इतिवृत्त नाट्य का शरीर है' । और नाट्य रस ही है यह पहले कह चुके हैं । गुणगुणिव्यवहार—। अत्यन्त मिले-जुले (सम्मिश्र) रूप से मालूम पड़ने के कारण धर्मधर्मिव्यवहार ठीक है । न कि—। भाव यह कि क्रम मालूम नहीं पड़ता ।

४४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः वाच्यं यथा गौरत्वमयं शरीरम्। एवं सति यथा शरीरे प्रतिभासमाने नियमेनैव गौरत्वं प्रतिभासते सर्वस्य तथा वाच्येन सहैव रसादयोऽपि सहृदयस्यासहृदयस्य च प्रतिभासेरन्। न चैवम्; तथा चैतत्प्रतिपादि- तमेव प्रथमोद्द्योते। स्यान्मतम्; रत्नानामिव जात्यत्वं प्रतिपत्तृविशेषतः संवेद्यं वाच्यानां है, जैसे शरीर गौरत्वमय है। ऐसा होने पर जैसे शरीर के प्रतीत होने पर नियमतः ही गौरत्व सबको प्रतीत होता है उस प्रकार वाच्य के साथ ही रसादि भी सहृदय और असहृदय को प्रतीत होने चाहिए। और ऐसा नहीं होता, जैसा कि प्रथम उद्योत में प्रतिपादन किया ही जा चुका है। यह कह सकते हैं कि रत्नों के जात्यत्व की भांति वाच्यों का रसादिरूपत्व प्रति- लोचनम् प्रथमेति। 'शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते' इत्यादिना प्रतिपादितमदः। ननु यद्यस्य धर्मरूपं तत्तत्प्रतिभाने सर्वस्य नियमेन भातीत्यनैकान्तिकमेतत्। माणिक्यधर्मो हि जात्यत्वलक्षणो विशेषो न तत्प्रतिभासेऽपि सर्वस्य नियमेन भातीत्याशङ्कते-स्यादिति। एतत्परिहरति-नैवमिति। एतदुक्तं भवति- अत्यन्तोन्मग्नस्वभावत्वे सति तद्धर्मत्वादिति विशेषणमस्माभिः कृतम्। उन्मग्न- रूपता च न रूपवज्जात्यत्वस्य, अत्यन्तलीनस्वभावत्वात्। रसादीनां चोन्म- ग्नतास्त्येवेत्येवं केचिदेतं ग्रन्थमनेषुः। अस्मद्गुरवस्त्वाहुः-अत्रोच्यत इत्य- नेनेदमुच्यते-यदि रसादयो वाच्यानां धर्मास्तथा सति द्वौ पक्षौ रूपादिसदृशा प्रथम-। 'शब्द और अर्थ के शासन के ज्ञान मात्र से नहीं जाना जाता है' इत्यादि द्वारा यह प्रतिपादन किया जा चुका है। (शङ्का) जो (गौरत्वादि) जिस (शरीरादि) का धर्मरूप है, वह (गौरत्वादि) उस (शरीरादि) के प्रतीत होने पर सब को नियमतः प्रतीत होते हैं, यह (नियम) अनैकान्तिक (व्यभिचारी) है, क्योंकि माणिक्य का धर्म जात्यत्वरूप विशेष उस (माणिक्य) के प्रतीत होने पर भी सबको नियमतः प्रतीत नहीं होता, यह आशङ्का करते हैं-यह कह सकते हैं-। इसका परिहार करते हैं-ऐसा नहीं-। बात यह कही गई-'हमने यह विशेषण बनाया है कि उसका धर्म अत्यन्त उन्मग्न स्वभाव वाला होना चाहिए (अर्थात् धर्म को वस्तु से अत्यन्त भिन्न रूप से प्रतीत होना चाहिए)। और जात्यत्व में रूप की भांति उन्मग्नरूपता (वस्तु से भिन्नरूपता) नहीं, क्योंकि वह अत्यन्त लीन स्वभाव का है। और रसादि में उन्मग्नता है ही' इस प्रकार इसको कुछ लोगों ने लगाया है। परन्तु हमारे गुरु कहते हैं-'यहां कहते हैं' इससे यह बात कही गई है-यदि रसादि वाच्यों के धर्म हैं, ऐसा होने पर दो पक्ष होंगे (तो वे रसादि

तृतीय उद्योतः ४४५ ध्वन्यालोकः रसादिरूपत्वमिति। नैवम्; यतो यथा जात्यत्वेन प्रतिभासमाने रत्ने रत्नस्वरूपानतिरिक्तत्वमेव तस्य लक्ष्यते तथा रसादीनामपि विभावा- नुभावादिरूपवाच्याव्यतिरिक्तत्वमेव लक्ष्येत । न चैवम्; न हि विभावानुभावव्यभिचारिण एव रसा इति कस्यचिदवगमः । अत एव च विभावादिप्रतीत्यविनाभाविनी रसादीनां प्रतीतिरिति तत्प्रतीत्योः पत्ता विशेष द्वारा संवेद्य है । ( किन्तु ) ऐसा नहीं; क्योंकि जिस प्रकार जात्यत्व रूप से प्रतिभासमान रत्न में उस ( जात्यत्व ) को रत्न के स्वरूप से अनतिरिक्तता लक्षित होती है उस प्रकार रसादि की भी विभाव, अनुभाव आदि रूप वाच्य से अव्यति- रिक्तता ही लक्षित होनी चाहिए । किन्तु ऐसा नहीं होता, क्योंकि किसी के ऐसी प्रतीति नहीं होती कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी ही रस हैं । और इसलिए विभावादि की प्रतीति की अविनाभाविनी रसादि की प्रतीति है, इस प्रकार उन लोचनम् वा स्युर्माणिक्यगतजात्यत्वसदृशा वा । न तावत्प्रथमः पक्षः, सर्वान् प्रति तथा- नवभासात् । नापि द्वितीयः, जात्यत्ववदनतिरिक्तत्वेनाप्रकाशनात् । एष च हेतुराद्येऽपि पक्षे सङ्गच्छत एव । तदाह—स्यान्मतमित्यादिना न चैवमित्य- न्तेन । एतदेव समर्थयति—न हीति । अत एव चेति । यतो न वाच्यधर्मत्वेन रसादीनां प्रतीतिः, यतश्च तत्प्रतीतौ वाच्यप्रतीतिः सर्वथानुपयोगिनी तत एव हेतोः क्रमेणावश्यं भाव्यं, सहभूतयोरुपकाराद्योगात् । स तु सहृदयभावना- भ्यासान्न लक्ष्यते अन्यथा तु लक्ष्येतापीत्युक्तं प्राक् । यस्यापि प्रतीतिविशेषा- त्मैव रस इत्युक्तिः, प्राक्तस्यापि व्यपदेशिवद्भाद्रसादीनां प्रतीतिरित्‍येवमन्यत्र । धर्म ) रूपादि के सदृश हैं अथवा माणिक्य में रहने वाले जात्यत्व के सदृश हैं । प्रथम पक्ष नहीं होगा, क्योंकि ( रसादि धर्म ) सब को उस प्रकार प्रतीत नही होते । दूसरा भी नहीं होगा, क्योंकि जात्यत्व की भांति अनतिरिक्त रूप से प्रकाशित नहीं होते । यह हेतु प्रथम पक्ष में संगत होता ही है । उसे कहते हैं—'यह कह सकते हैं' इत्यादि द्वारा 'ऐसा नहीं इस ( ग्रन्थ ) तक । इसी का समर्थन करते हैं—नहीं होती कि—। और इसलिए—। जिस कारण वाच्य के धर्म के रूप में रसादि की प्रतीति नहीं है और जिस कारण उस ( रसादि ) की प्रतीति में वाच्य की प्रतीति सर्वथा अनुपयोगिनी है उसी कारण से क्रम को अवश्य होना चाहिए । क्योंकि साथ में उत्पन्न होने वाले एक दूसरे का उपकार नहीं कर सकते । परन्तु वह क्रम सहृदयों की भावना के अभ्यास से नहीं लक्षित होता अन्यथा लक्षित भी होता यह पहले कह चुके हैं । पहले जिसकी भी यह उक्ति है कि रस प्रतीतिविशेष रूप ही है उसकी भी रसादि की प्रतीति ( 'राहु का सिर' की भांति ) व्यपदेशिवद्भाव ( भेदारोप ) से होगी । इसी प्रकार अन्यत्र भी ।

४४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः कार्यकारणभावेन व्यवस्थानात्क्रमोऽवश्यम्भावी। स तु लाघवान्न प्रकाश्यते 'इत्यलक्ष्यक्रमा एव सन्तो व्यङ्ग्या रसादयः' इत्युक्तम्। ननु शब्द एव प्रकरणाद्यवच्छिन्नो वाच्यव्यङ्ग्ययोः सममेव प्रतीतिमुपजनयतीति किं तत्र क्रमकल्पनया। न हि शब्दस्य वाच्य- प्रतीतिपरामर्श एव व्यञ्जकत्वे निवन्धनम्। तथा हि गीतादिशब्देभ्यो- ऽपि रसाभिव्यक्तिरस्ति। न च तेषामन्तरा वाच्यपरामर्शः। अत्रापि प्रतीतियों में कार्यकारणभाव के होने से क्रम अवश्यम्भावी है, परन्तु वह लाघव के कारण प्रकाशित नहीं होता, इस लिए 'अलक्ष्यक्रम होते हुए ही रसादि व्यङ्ग्य होते हैं' यह कहा गया है। (शङ्का) शब्द ही प्रकरणादि से सहकृत होकर वाच्य और व्यङ्ग्य की साथ ही प्रतीति उत्पन्न करता है, वहाँ क्रम की कल्पना से क्या ? वाच्य की प्रतीति का परामर्श ही शब्द के व्यञ्जक होने में कारण तो है नहीं। जैसा कि गीत आदि शब्दों से भी रस की अभिव्यक्ति है, न कि बीच में उन (गीतादि शब्दों) के वाच्य का लोचनम् ननु भवन्तु वाच्यादतिरिक्ता रसाद्यस्तत्रापि क्रमो न लक्ष्यत इति ताव- त्त्वयैवोक्तम्। तत्कल्पने च प्रमाणं नास्ति। अन्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थप्रतीति- मन्तरेण रसप्रतीत्युदयस्य पदविरहितस्वरालापगीतादौ शब्दमात्रोपयोगकृतस्य दर्शनात्। ततश्चैकयैव सामग्र्या सहैव वाच्यं व्यङ्ग्याभिमतं च रसादि भातीति वचनव्यञ्जनव्यापारद्वयेन न किञ्चिदिति तदाह—नन्विति। यत्रापि गीतशब्दानामर्थोऽस्ति तत्रापि तत्प्रतीतिरनुपयोगिनी ग्रामरागानुसारेणापहस्ति- तवाच्यानुसारतया रसोदयदर्शनात्। न चापि सा सर्वत्र भवन्ती दृश्यते, तदेतदाह—न चेति। तेषामिति गीतादिशब्दानाम्। आदिशब्देन वाद्यविल- मानते हैं कि रसादि वाच्य से अतिरिक्त हैं, उनमें भी क्रम लक्षित नहीं होता यह बात तुमने ही कही है। उस (क्रम) की कल्पना में प्रमाण नहीं है। क्योंकि अन्वय- व्यतिरेक से अर्थ की प्रतीति के बिना, पदविरहित स्वरालाप वाले गीतादि में शब्दमात्र के उपयोग से हुआ रस-प्रतीति का उदय देखा जाता है। तब एक ही सामग्री से साथ ही वाच्य और व्यङ्ग्य के रूप में अभिमत रसादि प्रतीत होता है, इस प्रकार दो वचन और व्यञ्जन व्यापार से कुछ नहीं होता, उसे कहते हैं—(शङ्का)—। जहां भी गीत के शब्दों का अर्थ है वहां भी उसकी प्रतीति का उपयोग नहीं, क्योंकि ग्राम्य, राग के अनुसार वाच्य का अनुसरण छोड़ देने से रस का उदय देखा जाता है। ऐसा नहीं कि वह (वाच्य की प्रतीति) सब जगह होती देखी जाती है, इसलिए यह कहते हैं—न कि—। 'उनका' गीतादि शब्दों का। 'आदि' शब्द से वाद्य शब्द, विलपित शब्द आदि

तृतीय उद्योतः ४४७ ध्वन्यालोकः ब्रूमः—प्रकरणाद्यवच्छेदेन व्यञ्जकत्वं शब्दानामित्यनुमतमेवैतदस्मा- कम् । किं तु तद्व्यञ्जकत्वं तेषां कदाचित्स्वरूपविशेषनिबन्धनं कदाचि- द्वाचकशक्तिनिबन्धनम् । तत्र येषां वाचकशक्तिनिबन्धनं तेषां यदि वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव स्वरूपप्रतीत्या निष्पन्नं तद्भवेन्न तर्हि वाचक- शक्तिनिबन्धनम् । अथ तन्निबन्धनं तन्नियमेनैव वाच्यवाचकभाव- प्रतीत्युत्तरकालत्वं व्यङ्ग्यप्रतीतेः प्राप्तमेव । परामर्श होता है । (समाधान) यहां भी हम कहते हैं—प्रकरण आदि के सहकार से शब्दों का व्यञ्जकत्व है यह हमें अनुमत ही है । किन्तु वह व्यञ्जकत्व उनका कभी स्वरूप विशेष के कारण और कभी वाचक शक्ति के कारण है। उनमें जिनका वाचक शक्ति के कारण है उनके यदि वाच्य की प्रतीति के बिना ही स्वरूप की प्रतीति से वह निष्पन्न हो तो वाचकशक्तिमूलक नहीं है और यदि वाचकशक्ति- मूलक है तो नियमतः ही व्यङ्ग्य की प्रतीति का वाच्यवाचकभाव की प्रतीति के उत्तरकाल में होना प्राप्त ही है। लोचनम् पितशब्दादयो निर्दिष्टाः । अनुमतमिति । ‘यत्रार्थः शब्दो वा’ इति ह्यवोचामेति भावः । न तर्हीति । ततश्च गीतवदेवार्थावगमं विनैव रसावभासः स्यात्काव्य- शब्देभ्यः, न चैवमिति वाचकशक्तिरपि तत्रापेक्षणीया; सा च वाच्यनिष्ठैवेति प्राग्वाच्ये प्रतिपत्तिरित्युपगन्तव्यम् । तदाह—अथेति । तदिति वाचकशक्तिः । वाच्यवाचकभावेति । सैव वाचकशक्तिरित्युच्यते । एतदुक्तं भवति—मा भूद्वाच्यं रसादिव्यञ्जकम्; अस्तु शब्दादेव तत्प्रतीति- स्तथापि तेन स्ववाचकशक्तिस्तस्यां कर्तव्यायां सहकारितयावश्यापेक्षणीये- त्यायातं वाच्यप्रतीतेः पूर्वभावित्वमिति । ननु गीतशब्दवदेव वाचकशक्तिरत्रा- निर्दिष्ट हैं । अनुमत—। भाव यह कि ‘जहां अर्थ अथवा शब्द’० यह हमने कहा है । तो वाचकशक्तिमूलक नहीं है—। तब तो गीत ही की भांति अर्थज्ञान के बिना ही काव्य-शब्दों से रस की प्रतीति होगी, पर ऐसा नहीं, इसलिए वहां वाचकशक्ति की अपेक्षा है; और वह वाच्यनिष्ठ ही है, अतः पहले वाक्य का ज्ञान मानना चाहिए । उसे कहते हैं—यदि—। ‘वह’ अर्थात् वाचकशक्ति । वाच्यवाचकभाव—। वही वाचकशक्ति कहलाता है । बात यह कही गई—वाच्य रसादि का व्यञ्जक मत हो; शब्द ही से उनकी प्रतीति हो, तथापि उसे (शब्द को) अपनी वाचकशक्ति की उसे (रसादि की प्रतीति को) उत्पन्न करने में अवश्य अपेक्षा करनी होगी, इस कारण वाच्य की प्रतीति का पहले उत्पन्न होने की बात आ जाती है । (शङ्का) गीत शब्दों की भांति ही यहां भी वाचक-

४४८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स तु क्रमो यदि लाघवान्न लक्ष्यते तत्किं क्रियते । यदि च वाच्यप्रतीतिमन्तरेणैव प्रकरणाद्यवच्छिन्नशब्दमात्रसाध्या रसादिप्रतीतिः स्यात्तदनवधारितप्रकरणानां वाच्यवाचकभावे च स्वयमव्युत्पन्नानां प्रतिपत्तॄणां काव्यमात्रश्रवणादेवासौ भवेत् । सहभावे च वाच्यप्रतीते- वह क्रम यदि लाघव के कारण लक्षित नहीं होता तो क्या किया जाय ? और यदि वाच्य-प्रतीति के बिना ही प्रकरणादि से सहकृत शब्दमात्र से साध्य रसादि की प्रतीति हो तो प्रकरण को नहीं समझे और स्वयं वाच्यवाचकभाव में व्युत्पत्तिरहित ज्ञाताओं को काव्यमात्र के सुनने से वह ( रसादि की प्रतीति ) होनी चाहिए । (वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति के) साथ होने पर वाच्य की प्रतीति का कोई उपयोग लोचनम् प्यनुपयोगिनी, यत्तु क्वचिच्छ्रुतेऽपि काव्ये रसप्रतीतिर्न भवति तत्रोचितः प्रक- रणावगमादिः सहकारी नास्तीत्याशङ्क्याह - यदि चेति । प्रकरणावगमो हि क उच्यते ? किं वाक्यान्तरसहायत्वम् ? अथ वाक्यान्तराणां सम्बन्धित्वाच्यम् । उभयपरिज्ञानेऽपि न भवति प्रकृतवाक्यार्थावेदने रसोदयः । स्वयमिति । प्रक- रणमात्रमेव परेण केनचिद्येषां व्याख्यातमिति भावः । न चान्वयव्यतिरेकवर्ती वाच्यप्रतीतिमपह्नुत्यादृष्टसद्भावाभावौ शरणत्वेनाश्रितौ मात्सर्यादधिकं किञ्चि- त्पुष्णीत इत्यभिप्रायः । नन्वस्तु वाच्यप्रतीतेरुपयोगः क्रमाश्रयेण किं प्रयोजनम् , सहभावमात्रमेव ह्युपयोग एकसामग्र्यधीनतालक्षणमित्याशङ्क्याह - सहेति । एवं ह्युपयोग इति अनुपकारके सञ्ज्ञाकरणमात्रं वस्तुशून्यं स्यादिति भावः । उपकारिणो हि पूर्व- शक्ति का कोई उपयोग नहीं, किन्तु जो कहा पर काव्य के सुनने पर भी रस की प्रतीति नहीं होती है वहां उचित प्रकरण-ज्ञान आदि सहकारी नहीं है, यह आशङ्का करके कहते हैं—और यदि—। प्रकरण-ज्ञान किसको कहते हैं ? सहकारी वाक्यान्तर क्या है ? यदि वाक्यान्तरों का वाच्य है तो दोनों के ( वाक्यान्तर और उसका वाच्य ) परिज्ञान से भी प्रकृत वाक्य के अर्थ का ज्ञान करने पर रस का उदय नहीं होता। स्वयं—। भाव यह कि किसी दूसरे ने किन्हीं ( ज्ञाताओं ) का प्रकरणमात्र ही व्याख्यान किया है । अभिप्राय यह कि यदि अन्वय-व्यतिरेक वाली वाच्यप्रतीति का अपह्नव करके प्रयोजक रूप से अदृष्ट के सद्भाव और अभाव को मानते हैं तो वे मात्सर्य से अधिक और की पुष्टि नहीं करते हैं । अच्छा, वाच्य की प्रतीति का उपयोग तो माना, पर क्रम के आश्रयण से क्या प्रयोजन है ? एक सामग्री की अधीनतारूप सहभावमात्र ही उपयोग है, यह आशङ्का करके कहते हैं—सहभाव—। भाव यह कि इस प्रकार यदि उपयोग है तो अनुपकारक का सिर्फ नामकरण वस्तुशून्य होगा । क्योंकि आपने भी अङ्गीकार किया है कि जो

तृतीय उद्योतः ४४९

ध्वन्यालोकः
रनुपयोगः, उपयोगे वा न सहभावः । येषामपि स्वरूपविशेषप्रतीति-
निमित्तं व्यञ्जकत्वं यथा गीतादिशब्दानां तेषामपि स्वरूपप्रतीतेर्व्यङ्ग्य-
प्रतीतेश्च नियमभावी क्रमः । तत्तु शब्दस्य क्रियापौर्वापर्यमनन्यसाध्य-
तत्फलघटनास्वाशुभाविनीषु वाच्येनाविरोधिन्यभिधेयान्तरविलक्षणे
रसादौ न प्रतीयते ।
नहीं है और यदि उपयोग है तो ( उन दोनों का ) सहभाव नहीं होगा । और
जिनका भी स्वरूपविशेष प्रतीतिमूलक व्यञ्जकत्व है, जैसे गीतादि शब्दों का, उनकी
भी स्वरूपप्रतीति और व्यङ्ग्यप्रतीति का नियमतः क्रम है । किन्तु वह शब्द की
क्रियाओं का पौर्वापर्य अनन्यसाध्य उस फल वाली आशुभाविनी घटनाओं में वाच्य से
विरोध न रखने वाले तथा अन्य वाच्य से विलक्षण रसादि में प्रतीत नहीं होता है ।
लोचनम्
भावितेति त्वयाप्यङ्गीकृतमित्याह—येषामिति । त्वद्दृष्टान्तेनैव वयं वाच्य-
प्रतीतेरपि पूर्वभावितां समर्थयिष्याम इति भावः । ननु संलक्ष्यक्रमः किं न लक्ष्यत
इत्याशङ्क्याह- तत्त्विति । क्रियापौर्वापर्यमित्यनेन क्रमस्य स्वरूपमाह—क्रियते
इति । क्रिये वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीती यदि वाभिधाव्यापारो व्यञ्जनापर्यायो
ध्वननव्यापारश्चेति क्रिये तयोः पौर्वापर्यं न प्रतीयते । क्वत्याह—रसादौ विषये ।
कीदृशि ? अभिधेयान्तरात्तदभिधेयविशेषाद्विलक्षणे सर्वथैवानभिधेये अनेन
भवितव्यं तावत्क्रमेणोत्युक्तम् । तथा वाच्येनाविरोधिनि, विरोधिनि तु लक्ष्यत
एवेत्यर्थः । कुतो न लक्ष्यते इति निमित्तसप्तमीनिर्दिष्टं हेत्वन्तरगर्भं हेतुमाह—
आशुभाविनीष्विति । अनन्यसाध्यतत्फलघटनासु घटनाः पूर्वं माधुर्यादिलक्षणाः
उपकारी होता है वह पहले होता है, यह कहते हैं— जिनका—। भाव यह कि तुम्हारे
दृष्टान्त से ही हम वाच्य-प्रतीति का भी पूर्व में होना समर्थन करेंगे । तो यदि क्रम है
तो क्यों नहीं लक्षित होता, यह आशङ्का करके कहते हैं— किन्तु वह—। ‘क्रियाओं
का पौर्वापर्य’ इसके द्वारा क्रम का स्वरूप कहते हैं—क्रिया—। ‘जो की जांय’ वे क्रिया
हैं, यहां वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीतियां ( क्रिया ) हैं, अथवा अभिधाव्यापार और
व्यञ्नाख्य ध्वनन व्यापार, ये क्रियायें हैं, उनका पौर्वापर्य प्रतीत नहीं होता । कहां ?
इस पर कहते हैं—रसादि विषय में । किस प्रकार के ? उस अभिधेय विशेष अभिधेया-
न्तर से विलक्षण, अर्थात् उसे सर्वथा ही अनभिधेय होना चाहिए इसलिए ‘क्रम से’ यह
कहा है । अर्थात् वह भी वाच्य से विरोध वाले ( रसादि में ), अविरोध वाले में तो
लक्षित ही हो जाता है । किस कारण लक्षित नहीं होता, इस ( प्रश्न के समाधान में )
निमित्तसप्तमी के द्वारा निर्देश करके दूसरा हेतु देते हुए हेतु कहते हैं—आशुभाविनी—।
‘अनन्यसाध्य उस फल वाली घटनाओं में’ पहले गुणनिरूपण के अवसर में प्रतिपादित
२६ ध्व०

४५० सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम् प्रतिपादिता गुणनिरूपणावसरे ताश्च तत्फलाः रसादिप्रतीतिः फलं यासाम् , तथा अनन्यत्तदेव साध्यं यासाम्, न ह्योजोघटनायाः करुणादिप्रतीतिः साध्या । एतदुक्तं भवति—यतो गुणवति काव्येऽसंकीर्णविषयतया सङ्घटना प्रयुक्ता ततः क्रमो न लक्ष्यते । ननु भवत्वेवं सङ्घटनानां स्थितिः, क्रमस्तु किं न लक्ष्यते अत आह—आशुभाविनीषु । वाच्यप्रतीतिकालप्रतीक्षणेन विनैव झटित्येव ता रसादीन् भावयन्ति तदास्वादं विदधतीत्यर्थः । एतदुक्तं भवति— सङ्घटनाव्यङ्ग्यत्वाद्रसादीनामनुपयुक्तेऽप्यर्थविज्ञाने पूर्वमेवोचितसङ्घटनाश्रवण एव यत आसूत्रितो रसास्वादस्तेन वाच्यप्रतीत्युत्तरकालभवेन परिस्फुटास्वाद- युक्तोऽपि पश्चादुत्पन्नत्वेन न भाति । अभ्यस्ते हि विषयेऽविनाभावप्रतीतिक्रम इत्थमेव न लक्ष्यते । अभ्यासो ह्ययमेव यत्प्रणिधानादिनापि विनैव संस्कारस्य बलवत्त्वात्सदैव प्रबुभुत्सुतया अवस्थापनमित्येवं यत्र धूमस्तत्राग्निरिति हृदय- स्थितत्वाद्ध्याप्तेः पक्षधर्मज्ञानमात्रमेवोपयोगि भवतीति परामर्शस्थानमाक्रमति, झटित्युत्पन्ने हि धूमज्ञाने तद्व्याप्तिस्मृत्युपकृते तद्विजातीयप्रणिधानानुसरणादि- प्रतीत्यन्तरानुप्रवेशविरहादाशुभाविन्यामग्निप्रतीतौ क्रमो न लक्ष्यते तद्वदिहापि । माधुर्यादि लक्षण घटनाएं, रसादि की प्रतीति रूप फल है जिनका ऐसे वे (घटनाएं ), तथा नहीं अन्य (अर्थात् वही) है साध्य जिनका (ऐसी वे घटनाएं), ओज वाली घटना का साध्य करुण आदि की प्रतीति नहीं है । बात यह कही गई—जिस कारण गुणवान् काव्य में असङ्कीर्ण विषय के रूप में सङ्घटनाएं प्रयुक्त होती हैं, उस कारण क्रम लक्षित नहीं होता । इस प्रकार की सङ्घट- नाओं की स्थिति हो, किन्तु क्रम क्यों नहीं लक्षित होता है ? इसलिए कहते हैं— आशुभाविनी—। वाच्य की प्रतीतिकाल की प्रतीक्षा के बिना ही झट से वे रसादि का भावन करने लगती है, अर्थात् उनका आस्वाद कराने लगती हैं । बात यह कही गई— रसादि के सङ्घटना से व्यङ्ग्य होने के कारण अर्थज्ञान के अनुपयुक्त होने पर भी पहले ही उचित सङ्घटना के श्रवण में ही जिस कारण थोड़ा स्फुरित (आसूत्रित) रसास्वाद होता है, (वह) वाच्य की प्रतीति के उत्तरकाल में होने वाले उस कारण से परिस्फुट आस्वाद से युक्त होकर भी पश्चात् उत्पन्न रूप से प्रतीत नहीं होता, क्योंकि अभ्यस्त विषय में अविनाभाव (अर्थात् व्याप्ति) की प्रतीति का क्रम यों ही नहीं लक्षित होता । अभ्यास यही है जो कि प्रविधान आदि के बिना ही संस्कार के प्रबल होने के कारण हमेशा जानने के इच्छुक भाव से अवस्थापन है, इस प्रकार 'जहां धूम है वहां अग्नि है' इस व्याप्ति के हृदय में स्थित होने के कारण केवल (धूम आदि का पक्षधर्मता ज्ञान ही उपयोगी होता है, इस कारण परामर्श का स्थान ग्रहण कर लेता है, क्योंकि उस (वह्नि) की व्याप्ति की स्मृति से उपकृत धूमज्ञान के झटिति उत्पन्न होने पर उन (धूमज्ञान और व्याप्तिस्मृति) से विजातीय प्रणिधान का अनुसरण आदि अन्य प्रतीतियों का अनु- प्रवेश न होने से आशु होने वाली अग्नि की प्रतीति में क्रम लक्षित नहीं होता है, उस

तृतीय उद्योतः ४५१ ध्वन्यालोकः क्वचित्तु लक्ष्यत एव । यथानुरणनरूपव्यङ्ग्यप्रतीतिषु । तत्रापि कथमिति चेदुच्यते—अर्थशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्ये ध्वनौ तावद- भिधेयस्य तत्सामर्थ्याक्षिप्तस्य चार्थस्याभिधेयान्तरविलक्षणतयात्यन्त- विलक्षणे ये प्रतीती तयोरशक्यनिह्नवौ निमित्तनिमित्तिभाव इति स्फुटमेव तत्र पौर्वापर्यम् । यथा प्रथमोद्द्योते प्रतीयमानार्थसिद्धयर्थ- परन्तु कहीं पर प्रतीत होता ही है, जैसे अनुरणन रूप व्यङ्ग्य की प्रतीतियों में । यदि कहो कि वहां पर भी कैसे ? तो कहते हैं—अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में अभिधेय की और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त अर्थ की अन्य अभिधेय से विलक्षण रूप होने के कारण अत्यन्त विलक्षण जो प्रतीतियाँ हैं, उनके निमित्तनिमित्ति- भाव को छिपाया नहीं जा सकता, इसलिए स्पष्ट ही वहां पौर्वापर्य है । जैसे प्रथम उद्योत में प्रतीयमान अर्थ को सिद्ध करने के लिए उदाहृत गाथाओं में । और उस लोचनम् यदि तु वाच्याविरोधी रसो न स्यादुचिता च घटना न भवेत्तल्लक्ष्येतैव क्रम इति । चन्द्रिकाकारस्तु पठितमनुपठतीति न्यायेन गजनिमीलिकया व्याचचक्षे- तस्य शब्दस्य फलं तद्वा फलं वाच्यव्यङ्ग्यप्रतीत्यात्मकं तस्य घटना निष्पादना यतोऽनन्यसाध्या शब्दव्यापारैकजन्येति । न चात्रार्थसतत्त्वं व्याख्याने किञ्चि- दुत्पश्याम इत्यलं पूर्ववंश्यैः सह विवादेन बहुना । यत्र तु सङ्घटनाव्यङ्ग्यत्वं नास्ति तत्र लक्ष्यत एवेत्याह—क्वचिदिति । तुल्ये व्यङ्ग्यत्वे कुतो भेद इत्याशङ्कते—तत्रापीति । स्फुटमेवेति । अविवक्षितवाच्यस्य पदवाक्यप्रकाशता । तदन्यस्यानुरणनरूपव्यङ्ग्यस्य च ध्वनेः ॥ प्रकार यहां भी । किन्तु यदि रस वाच्य का अविरोधी न हो और घटना उचित हो तो क्रम लक्षित होगा ही । परन्तु 'चन्द्रिकाकार' ने 'पढ़े को ही पढ़ते हैं' इस न्याय के अनुसार गजनिमीलिका ( हाथी की भांति ऊंघते हुए ) व्याख्यान किया है—'उस शब्द का फल, अथवा वाच्य- व्यङ्ग्य प्रतीतात्मक वह फल, उसकी घटना अर्थात् निष्पादना जिस कारण अनन्य साध्य है, अर्थात् एकमात्र शब्द के व्यापार से जन्य है ।' इस व्याख्यान में कोई अर्थतत्त्व हम नहीं देखते । पूर्वजों के साथ बहुत विवाद अनावश्यक है ! किन्तु जहां सङ्घटना द्वारा व्यङ्ग्यत्व नहीं है वहां प्रतीत होता ही है, यह कहते हैं—परन्तु कहीं पर—। व्यङ्ग्यत्व के सदृश होने पर कैसे भेद है, यह आशङ्का करते हैं—वहां पर भी—। स्पष्ट ही—। अविवक्षितवाच्य और उससे इतर अनुरणनरूप व्यङ्ग्य ध्वनि पदप्रकाश्य और वाक्यप्रकाश्य होता है ।

४५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
मुदाहृतासु गाथासु । तथाविधे च विषये वाच्यव्यङ्ग्ययोरत्यन्त-
विलक्षणत्वायैव एकस्य प्रतीतिः सैवेतरस्येति न शक्यते वक्तुम् ।
शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्ये तु ध्वनौ—
गावो वः पावनानां परमपरिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु
इत्यादावर्थद्वयप्रतीतौ शाब्द्यामर्थद्वयस्योपमानोपमेयभावप्रतीति-
रूपमावाचकपदविरहे सत्यर्थसामर्थ्यादाक्षिप्येति, तत्रापि सुलक्षमभिधेय-
व्यङ्ग्यालङ्कारप्रतीत्योः पौर्वापर्यम् ।
पदप्रकाशशब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्ग्येऽपि ध्वनौ विशेषणपद-
स्योभयार्थसम्बन्धयोग्यस्य योजकं पदमन्तरेण योजनमशाब्दमप्यर्था-
प्रकार के विषय में वाच्य और व्यङ्ग्य के अत्यन्त विलक्षण होने के कारण जो ही एक
की प्रतीति है वही अन्य की है ऐसा नहीं कह सकते । किन्तु शब्दशक्तिमूल अनुरणन-
रूपव्यङ्ग्य ध्वनि में—
‘पावनों में श्रेष्ठ किरणें ( गायें ) आप लोगों की अपरिमित प्रीति उत्पन्न करें ।’
इत्यादि में, दो अर्थों की शाब्दी प्रतीति में उपमानोपमेयभाव की प्रतीति उपमा-
वाचक पद के अभाव में अर्थ की सामर्थ्य से आक्षिप्त है, इसलिए वहां भी अभिधेय
और व्यङ्ग्य अलङ्कार की प्रतीतियों का पौर्वापर्य स्पष्ट लक्षित हो जाता है ।
पदप्रकाश शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूपव्यङ्ग्य ध्वनि में भी उभय अर्थ के साथ
सम्बन्ध के योग्य विशेषण पद को जोड़ने वाले पद के बिना जोड़ना अशाब्द हो जाता
लोचनम्
इति हि पूर्वं वर्णसङ्घटनादिकं नास्य व्यञ्जकत्वेनोक्तमिति भावः । गाथा-
स्विति । ‘भम धम्मिअ’ इत्यादिकासु । ताश्च तत्रैव व्याख्याताः । शाब्दामिति ।
शाब्दामपीत्यर्थः । उपमावाचकं यथेवादि । अर्थसामर्थ्यादिति । वाक्यार्थसाम-
र्थ्यादिति यावत् ।
एवं वाक्यप्रकाशाशब्दशक्तिमूलं विचार्य पदप्रकाशं विचारयति—पद-
प्रकाशेति । विशेषणपदस्येति । जड इत्यस्य । योजकमिति । कूप इति च
भाव यह कि इसमें पहले इस (ध्वनि) के व्यञ्जक रूप से वर्ण, सङ्घटना आदि
को नहीं कहा है । गाथाओं में—। ‘भम धम्मिअ’ इत्यादि में । वे वहीं पर व्याख्यात
हो चुकी हैं । शाब्दी (प्रतीति) में—। अर्थात् शाब्दी (प्रतीति) में भी । उपमावाचक
यथा, इव आदि । अर्थ की सामर्थ्य से—। वाक्यार्थ की सामर्थ्य से ।
इस प्रकार वाक्यप्रकाश शब्द शक्ति (ध्वनि) का विचार करके पदप्रकाश का
विचार करते हैं—पदप्रकाश—। विशेषण पद को—। ‘जड’ इसको ।—जोड़नेवाले—।

तृतीय उद्योतः ४५३ ध्वन्यालोकः दवस्थितमित्यत्रापि पूर्ववदभिधेयतत्सामर्थ्याक्षिप्तालङ्कारमात्रप्रतीत्योः सुस्थितमेव पौर्वापर्यम् । आर्थ्यपि च प्रतिपत्तिस्तथाविधे विषये उभयार्थसम्बन्धयोग्यशब्दसामर्थ्यप्रसावितेति शब्दशक्तिमूला कल्प्यते । अविवक्षितवाच्यस्य तु ध्वनेः प्रसिद्धस्वविषयवैमुख्यप्रतीतिपूर्वकमेवार्था- न्तरप्रकाशनमिति नियमभावी क्रमः । तत्राविवक्षितवाच्यत्वादेव वाच्येन सह व्यङ्ग्यस्य क्रमप्रतीतिविचारो न कृतः । है तथापि अर्थ से अवस्थित होता है, इसलिए यहां भी पहले की भांति अभिधेय की और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त अलङ्कारमात्र की प्रतीति का पौर्वापर्य सुस्थित ही है । उस प्रकार के विषय में आर्थी भी प्रतीति को उभय अर्थ के साथ सम्बन्ध के के योग्य शब्द से उत्पन्न की जाने के कारण शब्दशक्तिमूल मानी जाती है । अवि- वक्षितवाच्य ध्वनि का तो प्रसिद्ध अपने विषय में वैमुख्य की प्रतीतिपूर्वक ही अर्थान्तर का प्रकाशन है, अतः क्रम नियमतः होगा । वहां अविवक्षितवाच्य होने के कारण ही वाच्य के साथ व्यङ्ग्य के क्रम की प्रतीति का विचार नहीं किया है । लोचनम् अहमिति चोभयसमानाधिकरणतया संवलनम् । अभिधेयं च तत्सामर्थ्याक्षिप्तं च तयोरलङ्कारमात्रयोः । ये प्रतीती तयोः पौर्वापर्यं क्रमः । सुस्थितं सुलक्षित- मित्यर्थः । मात्रग्रहणेन रसप्रतीतिस्तत्राप्यलक्ष्यक्रमैवेति दर्शयति । नन्वेवमार्थत्वं शब्दशक्तिमूलत्वं चेति विरुद्धमित्याशङ्क्याह—आर्थ्यपीति । नात्र विरोधः कश्चिदिति भावः । एतच्च वितत्य पूर्वमेव निर्णीतमिति न पुनरुच्यते । स्वविषयेति । अन्धशब्दादेरुपहतचक्षुष्कादिः स्वो विषयः, तत्र यद्वैमुख्यमनादर इत्यर्थः । विचारो न कृत इति । नामधेयनिरूपणद्वारेणेति शेषः । सहभावस्य शङ्कितुमप्ययुक्तत्वादिति भावः । एवं रसाद्यः कैशिक्यादीनामितिवृत्तभाग- ‘कूप’ और ‘मैं’ इन दोनों को समानाधिकरण रूप से सम्मिश्रण है । अभिधेय और उसकी सामर्थ्य से आक्षिप्त उन दो अलङ्कार मात्रों की । जो प्रतीतियाँ हैं उनका पौर्वापर्य अर्थात् क्रम । सुस्थित है अर्थात् सुलक्षित है । ‘मात्र’ ग्रहण से यह दिखाते हैं कि रस की प्रतीति वहाँ भी सुलक्ष ही है । तब तो इस प्रकार आर्थ होना और शब्दशक्तिमूल होना विरुद्ध है, यह आशङ्का करके कहते हैं—आर्थी भी-। भाव यह कि यहाँ कोई विरोध नहीं । इसे विस्तारपूर्वक पहले ही निर्णय कर चुके हैं, इसलिये फिर नहीं कहते हैं । अपने विषय में-। अर्थात् ‘अन्ध’ आदि शब्द का ‘उपहतचक्षुष्क’ (अंधी आँखों वाला आदमी) अपना विषय है, उसमें वैमुख्य अर्थात् अनादर । विचार नहीं किया है-। शेष यह है—‘नाम के निरुपण द्वारा’ । भाव यह कि यहाँ सहभाव की शङ्का भी ठीक नहीं । इस प्रकार इतिवृत्त के भाग रूप कैशिकी आदि